सातवां बाब पेज नम्बर 113से116तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, बहादुरी, दिलेरी और मौत का शौक़
जिसका लाज़िमी नतीजा बहादुरी है, कि जब आदमी मरने ही के सर हो जाये, तो फिर सब कुछ कर सकता है। सारी बुज़दिली, सोच-फ़िक्र ज़िन्दगी ही के वास्ते है, और जब मरने का इश्तियाक़ पैदा हो जाए तो,न माल की मुहब्बत रहे, और न दुश्मन का ख़ौफ़। काश मुझे भी उन सच्चों के तुफ़ैल यह दौलत नसीब हो जाती।
हदीस नम्बर 1, इब्ने जहश रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और इब्ने साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की दुआएं
हज़रत अब्दुल्लाह बिन जहश रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ग़ज़्वा-ए-ओहद में हज़रत साअद बिन अबी वक़्क़ास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से कहा कि ऐ साअद,आओ मिलकर दुआ करें। हर शख़्स अपनी ज़रूरत के मुवाफ़िक़ दुआ करे। दूसरा आमीन कहे कि यह क़ुबूल होने के ज़्यादा क़रीब है। दोनों हज़रात ने एक कोने में जाकर दुआ फ़र्मायी।
अव्वल हज़रत साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने दुआ की, या अल्लाह, जब कल को लड़ाई हो तो मेरे मुक़ाबले में एक बड़े बहादुर को मुक़र्रर फ़र्मा, जो सख़्त हमले वाला हो, वह मुझ पर सख़्त हमला करे, और मैं उस पर ज़ोरदार हमला करूं। फिर मुझे उस पर फ़तह नसीब फ़र्मा, कि मैं उसको तेरे रास्ते में क़त्ल करूं, और उसकी ग़नीमत हासिल करूं। हज़रत अब्दुल्लाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने आमीन कही, और उस के बाद हज़रत अब्दुल्लाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने दुआ की, ऐ अल्लाह, कल को मैदान में एक बहादुर से मुक़ाबला करा। जो सख़्त हमले वाला हो, मैं उस पर शिद्दत से हमला करूं, वह भी मुझ पर ज़ोर से हमला करे, और फिर वह मुझे क़त्ल कर दे, फिर मेरे नाक-कान काट ले। फिर क़यामत में जब तेरे हुज़ूर में पेशी हो, तो तू कहे कि अब्दुल्लाह, तेरे नाक-कान क्यों काटे गये? हज़रत साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने आमीन कही। दूसरे दिन लड़ाई हुई और दोनों हज़रात की दुआएं, उसी तरह से क़ुबूल हुईं, जिस तरह मांगी थीं।
साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि अब्दुल्लाह बिन जहश की दुआ मेरी दुआ से बेहतर थी। मैंने शाम को देखा, कि उनके नाक-कान एक तागे में पिरोए हुए हैं, ओहद की लड़ाई में उनकी तलवार भी टूट गयी थी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने उनको एक टहनी अता फ़र्मायी, जो उनके हाथ में जाकर तलवार बन गई, और अर्से तक बाद में रही, और दो सौ दीनार को फ़रोख़्त हुई। दीनार सोने के एक सिक्के का नाम है।
फायदा,- इस क़िस्से में जहां एक जानिब कमाले बहादुरी है, कि बहादुर दुश्मन से मुक़ाबले की तमन्ना है, वहां दूसरी जानिब कमाले इश्क़ भी है, कि महबूब के रास्ते में बदन के टुकड़े-टुकड़े होने की तमन्ना करे, और आख़िर में जब वह पूछें, कि यह सब क्यों हुआ, तो मैं अर्ज़ करूं कि तुम्हारे लिए-
हदीस नम्बर 2.,ओहद की लड़ाई में हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की बहादुरी
ग़ज़्वा-ए-ओहद में मुसलमानों को कुछ शिकस्त हुई थी, जिसकी बड़ी वजह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के एक इर्शाद पर अमल न करना था, जिसका ज़िक्र बाब 1 क़िस्सा 2 में गुज़र चुका।उस वक़्त मुसलमान चारों तरफ़ से कुफ़्फ़ार के बीच में आ गये, जिसकी वजह से बहुत से लोग शहीद भी हुए, और कुछ भागे भी। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, भी कुफ़्फ़ार के एक जत्थे के बीच में आ गये, और कुफ़्फ़ार ने यह मशहूर कर दिया था, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, शहीद हो गये।
सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, इस ख़बर से बहुत परेशान हाल थे, और इसी वजह से बहुत से भागे और इधर उधर मुतफ़र्रिक (बिखर) गए। हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू फ़र्माते हैं, कि जब कुफ़्फ़ार ने मुसलमानों को घेर लिया, और हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, मेरी नज़र से ओझल हो गए, तो मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को अव्वल ज़िंदों में तलाश किया, ना पाया, फिर शहीदों में जाकर तलाश किया, वहां भी ना पाया तो मैंने अपने दिल में कहा, कि ऐसा तो हो नहीं सकता कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, लड़ाई से भाग जाएं। ब ज़ाहिर हक़ तआला शानुहु हमारे आमाल की वजह से हम पर नाराज़ हुए, इसलिए अपने पाक रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को आसमान पर उठा लिया, इसलिए अब इससे बेहतर कोई सूरत नहीं, कि मैं भी तलवार लेकर काफ़िरों के जत्थे में घुस जाऊं, यहां तक कि मारा जाऊं।
मैंने तलवार लेकर हमला किया, यहां तक कि कुफ़्फ़ार बीच में से हटते गये, और मेरी निगाह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, पर पड़ गयी, तो बेहद मसर्रत हुई और मैंने समझा कि अल्लाह जल्ला शानुहु ने मलाइका (फ़रिश्ते) के ज़रिए से अपने महबूब की हिफ़ाज़त की। मैं हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पास जाकर खड़ा हुआ, कि एक जमाअत की जमाअत कुफ़्फ़ार की हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, पर हमले के लिए आयी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया कि अली, इनको रोको।
मैंने तन्हा ने उस जमाअत का मुक़ाबला किया, और उनके मुंह फेर दिये, और बाज़ों को क़त्ल कर दिया। इसके बाद फिर एक और जमाअत हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, पर हमले की नीयत से बढ़ी। आपने फिर हज़रत अली की तरफ़ इशारा फ़र्माया। उन्होंने फिर तन्हा उस जमाअत का मुक़ाबला किया। इसके बाद हज़रत जिब्रील अलइ हिससलाम, ने आकर हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की इस जवांमर्दी, और मदद की तारीफ़ की तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया, ‘इन्नहू मिन्नी व अना मिन्हु’ (बेशक अली मुझ से है, और मैं अली से हूं) यानी कमाले इत्तिहाद की तरफ़ इशारा फ़र्माया, तो हज़रत जिब्रील ने अर्ज़ किया, ‘व अनामिन्कुमा’ (मैं तुम दोनों से हूं)।
फायदा,- एक तन्हा आदमी का जमाअत से भिड़ जाना, और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मुक़द्दस ज़ात को न पाकर मर जाने की नीयत से, कुफ़्फ़ार के जमघटे में घुस जाना, जहां एक तरफ़ हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ सच्ची मुहब्बत और इश्क़ का पता देता है, वहां दूसरी जानिब कमाले बहादुरी और दिलेरी, जुरअत का भी नक़्शा है।
हदीस नम्बर 3. हज़रत हंज़ला रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की शहादत
ग़ज़्वा-ए-ओहद में हज़रत हन्ज़ला रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अव्वल से शरीक नहीं थे। कहते हैं कि उनकी नई शादी हुई थी, बीवी से हम-बिस्तर हुए थे। उसके बाद ग़ुस्ल की तैयारी कर रहे थे, और ग़ुस्ल करने के लिए बैठ भी गए, सर को धो रहे थे, कि एकदम मुसलमानों के शिकस्त की आवाज़ कान में पड़ी, जिसकी ताब न ला सके। उसी हालत में तलवार हाथ में ले ली, और लड़ाई के मैदान की तरफ़ बड़े चले गए, और कुफ़्फ़ार पर हमला किया, और बराबर लड़ते चले गए, कि उसी हालत में शहीद हो गए। चूंकि शहीद को अगर जुन्बी (नापाक) न हो तो बग़ैर ग़ुस्ल दिए दफ़्न किया जाता है, इसलिए उनको भी उसी तरह कर दिया। मगर हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने देखा, मलाइका उन्हें ग़ुस्ल दे रहे हैं, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सहाबा से मलाइका के ग़ुस्ल देने का तज़्किरा फ़र्माया।
अबू सईद ख़ुदरी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह इर्शाद सुनकर हन्ज़ला रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को जाकर देखा तो उनके सर से ग़ुस्ल का पानी टपक रहा था। हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने वापसी पर तहक़ीक़ फ़र्माया तो उनके बग़ैर नहाये जाने का क़िस्सा मालूम हुआ।
फायदा,- यह भी कमाले बहादुरी है। बहादुर आदमी को अपने इरादे में, ताख़ीर करना दुश्वार होता है, इसीलिए इतना इंतिज़ार भी नहीं किया कि ग़ुस्ल पूरा कर लेते।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें