छठा बाब पेज नम्बर 99से102तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, ईसार व हमदर्दी और अल्लाह की राह में ख़र्च करना
ईसार कहते हैं अपनी ज़रूरत के वक़्त दूसरे को तरजीह देना (बढ़ावा देना), अव्वल तो सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की हर अदा, हर आदत ऐसी ही है, जिसकी बराबरी तो दूर रही, उसका कुछ भी किसी ख़ुश क़िस्मत को नसीब हो जाए, तो ऐन सआदत (बड़ी खुश क़िस्मती है), लेकिन बाज़ आदतें उन में से ऐसी मुम्ताज़ (मशहूर, नुमाया) हैं, कि उन्हीं का हिस्सा थी। इनके मिन-जुमला (उन्हीं में से एक) ईसार है, कि हक़ तआला शानुहू ने कलामुल्लाह शरीफ़ में, इसकी तारीफ़ फरमाई और- 'युउ सिरू न अला अनफ़ुसिहिम व लौ का न बिहिम ख़सासतः, में इस सिफ़त को ज़िक्र फ़र्माया कि वह लोग अपने ऊपर दूसरों को तरजीह देते हैं, गो उन पर फ़ाक़ा ही हो।
हदीस नम्बर 1, सहाबी का मेहमान की खातिर चिराग बुझा देना
एक सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हुज़ूरे अकदस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर हुए और भूख और परेशानी की हालत की इत्तिला दी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने अपने घरों में आदमी भेजा, कहीं कुछ न मिला तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से फरमाया कि कोई शख्स है, जो इनकी एक रात की मेहमानी कुबूल करे। एक अंसरी सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, मैं मेहमानी करूंगा। उनको घर ले गये और बीवी से फरमाया, कि यह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के मेहमान हैं,
[3D]जो इकराम इज़्ज़त कर सके, इसमें कसर कमी न करना, और कोई चीज़ छुपा कर न रखना। बीवी ने कहा, खुदा की कसम, बच्चों के काबिल कुछ थोड़ा सा रखा है, और कुछ भी घर में नहीं। सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फरमाया कि बच्चों को बहलाकर सुला दीजियो, और जब वह सो जाएं तो खाना लेकर मेहमान के साथ बैठ जावेंगे, और तू चिराग दुरुस्त करने के बहाने से, उठ कर उसको बुझा देना। चुनांचे बीवी ने ऐसा ही किया। दोनों मियां-बीवी और बच्चों ने फाके से रात गुज़ारी, जिस पर यह आयत, 'यू सि रू-न अला अन्फुसिहिम' नाज़िल हुई। तर्जुमा- और तरजीह देते हैं अपनी जानों पर,अगरचे उन पर फाका ही हो।
फायदा, इस किस्म के मुआअद्दद वाकिआत हैं जो सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के यहां पेश आये। चुनांचे एक दूसरा वाकिआ इसी किस्म का लिखा है।
हदीस नम्बर 2, रोज़ेदार के लिए चिराग बुझा देना
[3D}एक सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, रोज़े पर रोज़ा रखते थे। इफ्तार के लिए कोई चीज़ खाने की मयस्सर न आती थी। एक अंसारी सहाबी हज़रत साबित रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ताड़ लिया। बीवी से कहा कि मैं रात को एक मेहमान को लाऊंगा। जब खाना शुरू करें तो तुम चिराग को ठीक करने के हीले से बुझा देना, और इतने मेहमान का पेट न भर जाए खुद न खाना। चुनांचे उन्होंने ऐसा ही किया साथ में सब शरीक रहे जैसे खा रहे हों। सुबह को हज़रत साबित रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मजलिस में हाज़िर हुए, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फरमाया कि रात का तुम्हारा, अपने मेहमान के साथ बर्ताव हक तआला शानुहू को बहुत ही पसन्द आया।
हदीस नम्बर 3, एक सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का ज़कात में ऊंट देना
हज़रत उबई बिन काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फरमाते हैं, कि मुझे एक मर्तबा हुज़ूरे अकदस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने ज़कात का माल वसूल करने के लिये भेजा। मैं एक साहब के पास गया। और उनसे उनके माल की तफ्सील मालूम की, तो उन पर एक ऊंट का बच्चा एक साला वाजिब था। मैंने उनसे उसका मुतालबा किया। वह फरमाने लगे कि एक साल का बच्चा न दूध के काम का, न सवारी के काम का। उन्होंने एक नौजवान उम्दा जवान ऊंटनी सामने की, कि यह ले जाओ। मैंने कहा कि मैं तो इसको नहीं ले सकता, कि मुझे उम्दा माल लेने का हुक्म नहीं। अलबत्ता अगर तुम यही देना चाहते हो तो हुज़ूरे अकदस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, सफर में हैं और आज का पड़ाव फलां जगह तुम्हारे करीब ही है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर होकर पेश कर दो।
अगर मंज़ूर फरमा लिया तो मुझे इंकार नहीं, वरना मैं माज़ूर (मजबूर हूं)। वह इस ऊंटनी को लेकर मेरे साथ हो लिए और हुज़ूर अकदस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह, मेरे पास आपका कासिद ज़कात का माल लेने आये थे, और खुदा की क़सम मुझे आज तक यह सआदत नसीब न हुई थी, कि रसूलुल्लाह या उनके कासिद ने मेरे माल में कभी तसर्रुफ़ (मनमानी इस्तेमाल) फरमाया हो, इसलिए मैंने अपना सारा माल सामने कर दिया। उन्होंने फरमाया इसमें एक साला ऊंट का बच्चा ज़कात का वाजिब है। हुज़ूर एक साल के बच्चे से न तो दूध ही का नफ़ा है, न सवारी का। इस लिए मैंने एक उम्दा जवान ऊंटनी पेश की थी, जिसको उन्होंने कुबूल नहीं फरमाया, इसलिए मैं खुद लेकर हाज़िर हुआ हूं।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फरमाया कि तुम पर वाजिब तो वही है, जो उन्होंने बतलाई मगर तुम अपनी तरफ से उससे ज़्यादा और उम्दा माल दो तो कुबूल है। अल्लाह तुम्हें इसका अज्र मरहमत फरमाये (बदला दे)। उन्होंने अर्ज़ किया कि यह हाज़िर है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने कुबूल फरमा लिया और बरकत की दुआ फरमाई।
फायदा, यह ज़कात के माल का मंज़र है। आज भी इस्लाम के बहुत से दावेदार हैं और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मुहब्बत का दम भी भरते हैं, लेकिन ज़कात के अदा करने में ज़्यादती का तो क्या ज़िक्र है, पूरी मिकदार भी अदा करना मौत है। जो ऊंचे तबके वाले ज़्यादा माल वाले कहलाते हैं, उनके यहां तो अक्सर बेशतर इसका ज़िक्र ही नहीं है, लेकिन जो मुतवस्सित (दर्मियानी) हैसियत के लोग हैं, और अपने को दीनदार भी समझते हैं। वह भी इसकी कोशिश करते हैं, कि जो खर्च अपने अज़ीज़ रिश्तेदारों में या किसी दूसरी जगह मजबूरी से पेश आ जाये, उसमें ज़कात ही की नीयत कर लें।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें