छठा बाब पेज नम्बर 108से113तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 10. हज़रत अबूज़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का अपने खादिम को तंबीह फरमाना
हज़रत अबूज़र ग़िफारी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मशहूर सहाबी हैं, जिनके इस्लाम लाने का किस्सा बाब 1 के नम्बर 5 पर गुज़र चुका है। यह बड़े ज़ाहिद लोगों में थे। माल न अपने पास जमा रखते थे, न यह चाहते थे, कि कोई दूसरा जमा रखे। मालदार लोगों से हमेशा लड़ाई रहती थी। इसलिए हज़रत उस्मान रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हुक्म से रब्ज़ा में रहने लगे थे, जो जंगल में एक मामूली सी आबादी थी।
हज़रत अबूज़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास चन्द ऊंट थे, और एक नातवान ज़ईफ़ (कमज़ोर-बूढ़ा) चरवाहा था, जो उनकी ख़बरगीरी करता था, उसी पर गुज़र था। एक शख़्स क़बीला बनुसुलैम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ, और यह तमन्ना ज़ाहिर की, कि मैं आपकी ख़िदमत में रहना चाहता हूं, ताकि आपके फुयूज़ (फैज़, मेहरबानियों) से इस्तिफ़ादा (फायदा उठाया) करूं। मैं आपके चरवाहे की मदद करता रहूंगा, और आपकी बरकात से फायदा भी हासिल करूंगा।
हज़रत अबूज़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इर्शाद फ़र्माया, कि मेरा दोस्त वह है जो मेरी इताअत करे, अगर तुम भी मेरी इताअत के लिए तैयार हो, शौक़ से रहो, कहना न मानो तो तुम्हारी ज़रूरत नहीं। सुलैमी साहब ने अर्ज़ किया, किस चीज़ में आप अपनी इताअत चाहते हैं। फ़र्माया कि जब मैं अपने माल में से किसी चीज़ के ख़र्च का हुक्म करूं, तो उम्दा से उम्दा माल ख़र्च किया जाये।
वह कहते हैं कि मैंने क़ुबूल किया और रहने लगा। इत्तिफ़ाक़ से एक दिन किसी ने ज़िक्र किया कि पानी पर कुछ लोग रहते हैं, जो ज़रूरतमंद हैं, खाने के मुहताज हैं। मुझ से फ़र्माया, एक ऊंट ले आओ। मैं गया, मैंने देखा कि एक बहुत ही उम्दा ऊंट है, जो निहायत क़ीमती, निहायत कारआमद और सवारी में मुतीअ (इताअत गुज़ार) है। मैंने हस्बे वाअदा उसको ले जाने का इरादा किया, मगर मुझे ख़्याल हुआ कि गुरबा को खिलाना ही तो है, और यह ऊंट बहुत ज़्यादा कारआमद है, हज़रत की और मुताल्लिक़ीन की ज़रूरत का है, उसको छोड़कर उससे ज़रा कम दर्जे की उम्दा ऊंटनी, कि उस ऊंट के अलावा और बाक़ी सबसे बेहतर थी, लेकर हाज़िरे ख़िदमत हुआ।
फ़र्माया कि तुमने ख़ियानत की, मैं समझ गया और वापस आकर वही ऊंट ले गया। पास बैठने वालों से इर्शाद फ़र्माया कि दो आदमी ऐसे हैं, जो अल्लाह के वास्ते एक काम करें? दो आदमी उठे। उन्होंने अपने आपको पेश किया, फ़र्माया कि इसको ज़िब्हा करो और ज़िब्हा के बाद गोश्त काटकर जितने घर पानी पर आबाद हैं, उनको शुमार करके, अबूज़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का यानी अपना घर भी एक अदद उनमें शुमार कर लो, और सबको बराबर तक़्सीम कर दो। मेरे घर भी उतना ही जाये, जितना उनमें से हर घर में जाए। उन्होंने तामीले इर्शाद की और तक़्सीम कर दिया।
[3D}इसके बाद मुझे बुलाया और फ़र्माया, कि तूने मेरी वसीयत उम्दा माल ख़र्च करने की, जान-बूझकर छोड़ी या भूल गया था? अगर भूल गया था तो माज़ूर है। मैंने अर्ज़ किया कि भूला तो नहीं था। मैंने अव्वल उसी ऊंट को लिया था, मगर मुझे ख़्याल हुआ कि, यह बहुत कारआमद है आपको अक्सर इसकी ज़रूरत रहती है, महज़ इस वजह से छोड़ दिया था। फ़र्माया कि महज़ मेरी ज़रूरत से छोड़ा था। अर्ज़ किया कि महज़ आपकी ज़रूरत से छोड़ा था। फ़र्माया अपनी ज़रूरत का दिन बताऊं? मेरी ज़रूरत का दिन वह है जिस दिन मैं क़ब्र के गढ़े में अकेला डाल दिया जाऊंगा, वह दिन मेरी ज़रूरत और एहतियाज (मुहताजगी) का है।
[3D]माल के अन्दर तीन हिस्सेदार हैं- एक तक़दीर, जो माल के ले जाने में किसी चीज़ का इन्तिज़ार नहीं करती। अच्छा-बुरा हर क़िस्म का ले जाती है। दूसरा वारिस जो इसके इन्तिज़ार में है, तू मरे तो वह ले ले और तीसरा हिस्सेदार तू खुद है। अगर हो सकता हो और तेरी ताक़त में हो तो तीनों हिस्सेदारों में सबसे ज़्यादा आजिज़ न बन। अल्लाह तआला का इर्शाद है, लन तनालुलबिर्रहत्ता तुन्फ़िक़ू मिम्मातुहिब्बून।इसलिए जो माल मुझे सबसे ज़्यादा पसन्द है, उसको मैं अपने लिए आगे चलता करूं, ताकि वह मेरे लिए जमा रहे।
[3D]फायदा, - 'तीनों हिस्सेदारों में सबसे ज़्यादा आजिज़ न बन' का मतलब यह है कि जो हो सके, अपने लिए आख़िरत का ज़ख़ीरा जमा कर ले। ऐसा न हो कि मुक़द्दर ग़ालिब आ जाए, और वह माल तुझ से ज़ाया हो जाय, या तू मर जाए, और वह दूसरों के क़ब्ज़े में आ जाए, कि बाद में कोई किसी को नहीं पूछता। आल-औलाद, बीवी-बच्चे, सब थोड़े-बहुत दिनों रोकर चुप हो जायेंगे। ऐसा बहुत कम होता है कि, मरने वाले के लिए भी कुछ सदक़ा खैरात कर दें, और उसको याद रखें।
[3D]एक हदीस में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद वारिद है, आदमी कहता है कि मेरा माल, मेरा माल। हालांकि उसका माल सिर्फ़ वह है, जो खा लिया और ख़त्म कर दिया, या पहन लिया और पुराना कर दिया, या अल्लाह के रास्ते में ख़र्च कर दिया, और अपने लिए अल्लाह के यहाँ, ख़जाने में जमा कर दिया। इसके सिवा जो कुछ है, वह दूसरों का माल है, लोगों के लिए जमा कर रहा है।
[3D]एक हदीस में आया है, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दर्याफ़्त फ़र्माया, तुम में से ऐसा कौन शख़्स है, जिसको अपने वारिस का माल अपने से अच्छा लगे। सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, ऐसा कौन होगा जिसको दूसरे का माल, अपने से ज़्यादा महबूब हो। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया, अपना माल सिर्फ़ वही है, जो आगे भेज दिया जाए, और जो छोड़ दिया, वह वारिस का माल है।
हदीस नम्बर 11, हज़रत जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का क़िस्सा
हज़रत जाफ़र तय्यार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के चचाज़ाद भाई, और हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हक़ीक़ी भाई हैं। अव्वल तो यह सारा ही घराना और ख़ानदान, बल्कि आले-औलाद सख़ावत (दान-पुण्य), करम, शुजाअत (बहादुरी) में मुमताज़ रहे और हैं, लेकिन हज़रत जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मसाकीन के साथ ख़ास तअल्लुक़ रखते थे, और ज़्यादा उठना-बैठना ग़ुरबा ही के साथ होता था। कुफ़्फ़ार की तक़ालीफ़ से तंग होकर, अव्वल हबशा की हिजरत की, और कुफ़्फ़ार ने वहां भी पीछा किया, तो नजाशी के यहां अपनी सफ़ाई पेश करना पड़ी, जिसका क़िस्सा पहले बाब के नम्बर 10 पर गुज़रा। वहां से वापसी पर मदीना तय्यिबा की हिजरत की, और ग़ज़्वा-ए-मौता में शहीद हुए, जिसका क़िस्सा अगले बाब के ख़त्म पर आ रहा है।
इनके इंतिक़ाल की ख़बर पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, उनके घर ताज़ियत (मातमपुर्सी) के तौर पर तशरीफ़ ले गये, और उनके साहबज़ादों अब्दुल्लाह और औन और मुहम्मद को बुलाया, यह सब कम उम्र थे। उनके सर पर हाथ फेरा, और बरकत की दुआ फ़र्मायी। सारी ही औलाद में बाप का रंग था, मगर अब्दुल्लाह में सख़ावत का मज़मून बहुत ज़्यादा था। इसी वजह से उनका लक़ब कुतबुए सखा (सख़ावत का क़ुत्ब) था। सात वर्ष की उम्र में हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से बैअत हुई।इन्ही अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से किसी शख़्स ने हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू के यहां सिफ़ारिश करायी। उनकी सिफ़ारिश पर उसका काम हो गया, तो उसने नज़राने के तौर पर चालीस हज़ार दिरहम भेजे, उन्होंने वापस कर दिये, कि हम लोग अपनी नेकी को फ़रोख़्त नहीं किया करते।
एक मर्तबा कहीं से दो हज़ार दिरहम नज़राने में आये, उसी मजलिस में तक़्सीम फरमा दिये। एक ताजिर बहुत सी शकर लेकर आया, मगर बाज़ार में फ़रोख़्त न हुई। उसको फ़िक्र पैदा हुआ। अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अपने कारिंदों से कहा कि सारी शकर ख़रीद लो, और लोगों में मुफ़्त लुटा दो। रात को क़बीले में जो मेहमान आ जाता था, वह उनके यहां से खाना-पीना, हर क़िस्म की ज़रूरियात (ज़रूरते) पूरी करता।
हज़रत ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक लड़ाई में शरीक थे। एक दिन अपने बेटे अब्दुल्लाह को वसीयत फ़र्मायी, कि मेरा ख़्याल यह है कि, आज मैं शहीद हो जाऊंगा, तुम मेरा क़र्ज़ा अदा कर देना, और फ़लां-फ़लां काम करना। यह वसीयतें करके उसी दिन शहीद हो गए। साहबज़ादे ने जब क़र्ज़े को जोड़ा तो बाईस लाख दिरहम थे, और यह क़र्ज़ा भी इसी तरह हुआ था, कि अमानतदार बहुत मशहूर थे, लोग अपनी-अपनी अमानतें बहुत कसरत से लाते। यह फरमा देते कि रखने की जगह तो मेरे पास नहीं, यह रक़म क़र्ज़ है, जब तुम्हें ज़रूरत हो तो ले लेना, यह कहकर उसको सदक़ा कर देते, और यह भी वसीयत की कि जब कोई मुश्किल पेश आये तो मेरे मौला से कह देना।
अब्दुल्लाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं मौला को न समझा। मैंने पूछा आपके मौला कौन? फ़र्माया कि अल्लाह तआला। चुनांचे हज़रत अब्दुल्लाह ने तमाम क़र्ज़ा अदा किया। कहते हैं कि जब कोई दिक़्क़त पेश आती तो मैं कहता, ऐ ज़ुबैर के मौला! फ़लां काम नहीं होता, वह फ़ौरन हो जाता।
अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने एक बार इन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से कहा कि मेरे वालिद के क़र्ज़े की फ़िहरिस्त में तुम्हारे ज़िम्मे दस लाख दिरहम लिखे हैं। कहने लगे कि जब चाहो ले लो। इसके बाद मालूम हुआ कि मुझ से ग़लती हुई। मैं दोबारा गया। मैंने कहा कि वह तो तुम्हारे उनके ज़िम्मे हैं। कहने लगे मैंने मुआफ़ कर दिए। मैंने कहा कि मैं मुआफ़ नहीं कराता। कहने लगे जब तुम्हें सहूलत हो, दे देना। मैंने कहा उसके बदले ज़मीन ले लो। ग़नीमत के माल में ज़मीन बहुत सी आयी हुई थी, अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा अच्छा। मैंने एक ज़मीन उनको दे दी जो मामूली हैसियत की थी। कि पानी वगैरह भी उसमें नहीं था। उन्होंने फ़ौरन क़ुबूल कर ली, और ग़ुलाम से कहा उस ज़मीन में मुसल्ला बिछा दे। उसने मुसल्ला बिछा दिया, दो रक़अत नमाज़ वहां पढ़ी, और बहुत देर तक सज्दे में पड़े रहे। नमाज़ से फ़ारिग़ होकर ग़ुलाम से कहा कि इस जगह को खोदो। उसने खोदना शुरू किया एक पानी का चश्मा वहां से उबलने लगा।
फायदा, - इन हज़रात सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के यहां यह और इसी क़िस्म की चीज़ें जो इस बाब में लिखी गयीं, कोई बड़ी बात न थी, इन हज़रात की आम आदतें ऐसी ही थीं।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, छठा बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें