सातवां बाब पेज नम्बर 116से120तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 4, अम्र बिन जमूह, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की तमन्ना-ए-शहादत
हज़रत अम्र बिन जमूह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, पांव से लंगड़े थे। उनके चार बेटे थे, जो अक्सर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में भी हाज़िर होते,और लड़ाइयों में शिर्कत भी करते थे। ग़ज़्वा-ए-ओहद में अम्र बिन जमूह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को भी शौक़ पैदा हुआ, कि मैं भी जाऊं। लोगों ने कहा, तुम माज़ूर हो, लंगड़े पन की वजह से चलना दुश्वार है। उन्होंने फ़र्माया, कैसी बुरी बात है कि मेरे बेटे तो जन्नत में जाएं, और मैं रह जाऊं। बीवी ने भी उभारने के लिए ताने के तौर पर कहा, कि मैं तो देख रही हूं कि वह लड़ाई से भाग कर लौट आया। अम्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने यह सुनकर हथियार लिये, और क़िब्ले की तरफ़ मुंह करके दुआ की,अल्लाहुम्मा ला तरुद्दनी इला अहली’ (ऐ अल्लाह, मुझे अपने अहल की तरफ़ न लौटाइयो)।
इसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपनी क़ौम के मना करने का और अपनी ख़्वाहिश का इज़हार किया, और कहा कि मैं उम्मीद करता हूं, कि अपने लंगड़े पैर से जन्नत में चलूं-फिरूं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया कि अल्लाह ने तुम को माज़ूर किया है, तो न जाने में क्या हर्ज है। उन्होंने फिर ख़्वाहिश की, तो आपने इजाज़त दे दी।
अबू तल्हा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने अम्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को लड़ाई में देखा, कि अकड़ते हुए जाते थे और कहते थे, कि खुदा की क़सम मैं जन्नत का मुश्ताक़ (शौक व तमन्ना करने वाला) हूं। उनका एक बेटा भी उनके पीछे दौड़ा हुआ जाता था। दोनों लड़ते रहे हत्ताकि दोनों शहीद हुए, उनकी बीवी अपने ख़ाविन्द और बेटे की लाश को ऊंट पर लादकर दफ़्न के लिए मदीना लाने लगीं, तो वह ऊंट बैठ गया। बड़ी दिक़्क़त से उसको मार कर उठाया, और मदीना लाने की कोशिश की, मगर वह ओहद की तरफ़ मुंह करता था। उनकी बीवी ने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से ज़िक्र किया। आपने फ़र्माया, ऊंट को यही हुक्म है। क्या अम्र चलते हुए कुछ कहकर गये थे, उन्होंने अर्ज़ किया कि क़िब्ले की तरफ़ मुंह करके यह दुआ की थी, ‘अल्लाहुम्मा ला तरुद्दनी इला अहली’ आपने फ़र्माया, इसी वजह से यह ऊंट इस तरफ़ नहीं जाता।
फायदा,- इसी का नाम है,जन्नत का शौक़ और यही है वह सच्चा इश्क़, अल्लाह का और उसके रसूल का, जिसकी वजह से सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहां से कहां पहुंच गये,कि उनके जज़्बे मरने के बाद भी, वैसे ही रहते। बहुतेरी कोशिश की कि ऊंट चले मगर, वह या तो बैठ जाता या, उहद की तरफ़ चलता था।
हदीस नम्बर 5, हज़रत मुसअब बिन उमैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की शहादत
हज़रत मुसअब बिन उमैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, इस्लाम लाने से पहले बड़े नाज़ के पले हुए, और मालदार लड़कों में थे। उनके बाप इनके लिए दो-दो सौ दिरहम का जोड़ा ख़रीद कर पहनाते थे, नव उम्र थे, बहुत ज़्यादा नाज़ व नेमत में परवरिश पाते थे। इस्लाम के शुरू ही ज़माने में घर वालों से छुपकर मुसलमान हो गये, और उसी हालत में रहते। किसी ने उनके घर वालों को भी ख़बर दी। उन्होंने उनको बांधकर क़ैद कर दिया। कुछ रोज़ इसी हालत में गुज़रे, और जब मौक़ा मिला, तो छुपकर भाग गये और जो लोग हब्शा की हिजरत कर रहे थे, उनके साथ हिजरत करके चले गये। वहां से वापस आकर मदीना मुनव्वरा की हिजरत फ़र्मायी, और ज़ुह्द व फ़ाक़ा (तंगी) की ज़िन्दगी बसर करने लगे, और ऐसी तंगी की हालत थी कि एक मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, तशरीफ़ फ़र्मा थे। हज़रत मुसअब सामने से गुज़रे। उनके पास सिर्फ़ एक चादर थी, जो कई जगह से फटी हुई थी, और एक जगह बजाय कपड़े के चमड़े का पेवंद लगा हुआ था। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, उनकी इस हालत और, उस पहली हालत का तज़्किरा फ़र्माते हुए आंखों में आंसू भर लाये।
ग़ज़्वा-ए-ओहद में मुहाजिरीन का झंडा उनके हाथ में था। जब मुसलमान निहायत परेशानी की हालत में मुंतशिर हो रहे थे, तो यह जमे हुए खड़े थे। एक काफ़िर उनके क़रीब आया, और तलवार से हाथ काट दिया कि झंडा गिर जाये, और मुसलमानों को गोया खुली शिकस्त हो जावे। उन्होंने फ़ौरन दूसरे हाथ में ले लिया। उसने दूसरे हाथ को भी काट डाला। उन्होंने दोनों बाज़ुओं को जोड़कर सीने से झंडे को चिमटा लिया कि गिरे नहीं। उसने उनके तीर मारा, जिससे शहीद हो गए, मगर ज़िंदगी में झंडे को गिरने न दिया। इसके बाद झंडा गिरा, जिसको फ़ौरन दूसरे शख़्स ने उठा लिया।
जब उनको दफ़्न करने की नौबत आयी, तो सिर्फ़ एक चादर उनके पास थी, जो पूरे बदन पर नहीं आती थी। अगर सर की तरफ़ से ढांका जाता, तो पांव खुल जाते और पांव की तरफ़ की जाती तो सर खुल जाता। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फ़र्माया कि चादर को सर की जानिब कर दिया जाये, और पांव पर इज़ख़िर के पत्ते डाल दिए जाएं।
फायदा,- यह आखिरी ज़िन्दगी है उस नाज़ुक और नाज़ों में पले हुए की, जो दो सौ दिरहम का जोड़ा पहनता था, कि आज उसको कफ़न की एक चादर भी पूरी नहीं मिलती, और उस पर हिम्मत यह कि ज़िन्दगी में झंडा गिरने न दिया। दोनों हाथ कट गये, मगर फिर भी उसको न छोड़ा। बड़े नाज़ों के पले हुए थे, मगर ईमान उन लोगों के दिलों में, कुछ ऐसी तरह से जमता था, कि फिर वह अपने सिवा किसी चीज़ को भी न छोड़ता था। रुपया-पैसा, राहत-आराम, हर क़िस्म की चीज़ से हटाकर अपने में लगा लेता था।
हदीस नम्बर 6, यर्मूक की लड़ाई में, हज़रत साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का ख़त
इराक़ की लड़ाई के वक़्त हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का इरादा खुद लड़ाई में शिर्कत फ़र्माने का था, अवाम और ख़्वास दोनों क़िस्म के मज्मों में कई रोज़ तक इसमें मशवरा होता रहा, कि हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का खुद शरीक होना ज़्यादा मुनासिब है,या मदीना रह कर लश्करों के रवाना करते रहने का इंतिज़ाम ज़्यादा मुनासिब है। अवाम की राय थी कि खुद शिर्कत मुनासिब है,और ख़्वास की राय थी कि दूसरी सूरत ज़्यादा बेहतर है। मशवरों की गुफ़्तगू में हज़रत साअद बिन अबी वक़्क़ास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का भी तज़्किरा आ गया। उनको सबने पसंद कर लिया,कि उनको अगर भेजा जावे तो बहुत मुनासिब है, फिर हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के जाने की ज़रूरत नहीं।
हज़रत साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बड़े बहादुर और अरब के शेरों में शुमार होते थे, ग़रज़ यह तज्वीज़ हो गई और उनको भेज दिया गया। जब क़ादसिया पर हमला के लिए पहुंचे तो शाह किसरा ने उनके मुक़ाबले के लिए रुस्तम को जो मशहूर पहलवान था, तज्वीज़ किया। रुस्तम ने हर चन्द कोशिश की, और बादशाह से बार-बार इसकी दर्ख़ास्त की कि मुझे अपने पास रहने दें। ख़ौफ़ का ग़ल्बा था, मगर इन्कार इसका करता था कि मैं यहां से लश्करों के भेजने में,और सलाह-मश्वरा में मदद करूंगा। मगर बादशाह ने जिसका नाम यज़्दजुर्द था। क़ुबूल न किया और उसको मजबूरन (आख़िर) जंग में शरीक होना पड़ा।
हज़रत साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जब रवाना होने लगे, तो हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उनको वसीयत फ़र्मायी, जिसके अल्फ़ाज़ का मुख़्तसर तर्जुमा यह है- साअद तुम्हें यह बात धोखे में न डाले, कि तुम हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के मामू कहलाते हो और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के सहाबी हो। अल्लाह तआला बुराई को बुराई से नहीं धोते, बल्कि बुराई को भलाई से धोते हैं, अल्लाह तआला के और बन्दों के दरमियान कोई रिश्ता नहीं है। उसके यहां सिर्फ़ उसकी बन्दगी मक़बूल है। अल्लाह के यहां शरीफ़-रज़ील (अच्छे-बुरे) सब बराबर हैं, सब ही उसके बन्दे हैं और वह सबका रब है। उसके इन्आमात बन्दगी से हासिल होते हैं हर अम्र में इस चीज़ को देखना,
जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का तरीक़ा था, वही अमल की चीज़ है। मेरी इस नसीहत को याद रखना। तुम एक बहुत बड़े काम के लिए भेजे जा रहे हो, उससे छुटकारा सिर्फ़ हक़ के इत्तिबाअ से हो सकता है। अपने आप को और अपने साथियों को ख़ूबी का आदी बनाना, अल्लाह के ख़ौफ़ को इख़्तियार करना, और अल्लाह का ख़ौफ़ दो बातों से जमा होता है- उसकी इताअत में, और गुनाह से परहेज़ करने में, और अल्लाह की इताअत जिसको भी नसीब हुई, दुनिया से बुग़्ज़ और आख़िरत की मुहब्बत से नसीब हुई।
इसके बाद हज़रत साअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, निहायत बशाशत (खुशी-खुशी) से लश्कर लेकर रवाना हुए, जिसका अन्दाज़ा उस ख़त से होता है, जो उन्होंने रुस्तम को लिखा है, जिसमें वह लिखते हैं, फ़ इन्न मज़िय क़ौमंयुहिब्बूनल मौत कंमा युहिब्बूनल अआजिमूल ख़म्र ‘तर्जुमा ,बेशक मेरे साथ ऐसी जमाअत है, जो मौत को ऐसा ही महबूब रखती है, जैसा कि तुम लोग शराब पीने को महबूब रखते हो।’
फायदा,- शराब के दिलदादों से पूछो कि इसमें क्या मज़ा है। जो लोग मौत को ऐसा महबूब रखते हों, कामयाबी क्यों न उनके क़दम चूमे।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें