दसवां बाब पेज नम्बर 172से175तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 4. हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, की हालत अल्लाह के ख़ौफ़ से
हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को जितनी मुहब्बत थी, वह किसी से मख़्फ़ी (छुपी हुई) नहीं, हत्ताकि जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से किसी ने पूछा कि, आप को सबसे ज़्यादा मुहब्बत किससे है, तो आपने फ़र्माया कि आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से।
इसके साथ ही मनाज़िल से इतनी ज़्यादा वाक़िफ़ थीं, कि बड़े-बड़े सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मसाइल की तहक़ीक़ के लिए आपकी ख़िदमत में हाज़िर होते थे। हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम, उनको सलाम करते थे। जन्नत में भी हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की बीवी होने की बशारत दी गई है। मुनाफ़िक़ों ने आप पर तोहमत लगाई, तो कुरआन शरीफ़ में आप की बर आत नाज़िल हुई।
खुद हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, फ़र्माती हैं कि दस खुसूसियात मुझमें ऐसी हैं, कि कोई दूसरी बीवी उनमें शरीक नहीं। इब्ने सअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उन को मुफ़स्सल नक़्ल किया है। सदक़े की कैफ़ियत पहले क़िस्सों से, मालूम हो ही चुकी, लेकिन इन सब बातों के बावजूद अल्लाह के ख़ौफ़ का हाल यह था, फ़र्माया करती कि काश, मैं दरख़्त ही हो जाती, कि तस्बीह करती रहती, और कोई आख़िरत का मुतालबा मुझ से न होता। काश, मैं पत्थर होती, काश, मैं मिट्टी का ढेला होती, काश, मैं पैदा ही न होती, काश, मैं दरख़्त का पत्ता होती, काश, मैं कोई घास होती।
फायदा,- अल्लाह के ख़ौफ़ का यह मंज़र, दूसरे बाब के पांचवें-छठे क़िस्से में भी गुज़र चुका है। इन हज़रात की यह आम हालत थी, अल्लाह से डरना उन्हीं का हिस्सा था।
हदीस नम्बर 5, हज़रत उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के ख़ाविन्द की दुआ, और हिजरत
उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से पहले हज़रत अबू सलमा सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के निकाह में थीं, दोनों में बहुत ही ज़्यादा मुहब्बत, और ताल्कुक था, जिसका अन्दाज़ा इस क़िस्से से होता है, कि एक मर्तबा उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा , ने अबू सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से कहा कि मैंने यह सुना है, कि अगर मर्द और औरत दोनों जन्नती हों, और (अगर औरत दूसरे ख़ाविन्द से निकाह कर ले तो, इसमें दो हदीसें वारिद हुई। एक हदीस में आया है, कि वह दूसरो को मिलेगी,
और दूसरी हदीस में आया है, कि उसको इख़्तियार दे दिया जायेगा कि, जिस ख़ाविन्द के पास रहना चाहे, उसको ख़ाविन्द इख़्तियार कर ले। यह दूसरी हदीस ज़्यादा मशहूर है, और यह भी हो सकता है कि, जिन औरतों को दोनों ख़ाविन्द बराबर हो, उनके हक़ में पहली हदीस हो। इस बारे में रिवायत मुख़्तलिफ़ हैं, कि हर शख़्स को कितनी बीवियां मिलेंगी।) औरत मर्द के बाद किसी से निकाह न करे, तो वह औरत जन्नत में उसी मर्द को मिलेगी, इसी तरह अगर मर्द दूसरी औरत से निकाह न करे, तो वही औरत उसको मिलेगी, इसलिए लाओ, हम और तुम दोनों अहद कर लें कि, हम में से जो पहले मर जाए, दूसरा निकाह न करे।
अबूसलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा, तुम मेरा कहना मान लोगी, उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने कहा कि मैं तो इसी वास्ते मश्वरा कर रही हूं, कि तुम्हारा कहना मानूं।अबूसलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा कि मेरे बाद तुम निकाह कर लेना फिर दुआ की कि या अल्लाह, मेरे बाद उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को मुझसे बेहतर खाविन्द अता फ़र्मा, जो न इसको रंज पहुंचाये, न तकलीफ़ दे।
इब्तिदा-ए-इस्लाम में दोनों मियाँ-बीवी ने हबशा की हिजरत साथ ही की। इसके बाद वहां से वापसी पर मदीना तय्यबा की हिजरत, जिसका मुफ़स्सिल क़िस्सा खुद उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, बयान करती हैं कि जब अबू सलमा ने हिजरत का इरादा किया तो, अपने सामान ऊंट पर लादा, और मुझे और मेरे बेटे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को सवार कराया, और खुद ऊंट की नकेल हाथ में लेकर चले। मेरे मैके के लोगों बनू मुग़ीरा ने देख लिया। उन्होंने अबू सलमा से कहा कि तुम अपनी जात के बारे में तो आज़ाद हो सकते हो, मगर हम अपनी लड़की को तुम्हारे साथ क्यों जाने दें, कि वह शहर दर शहर फिरे। (एक शहर से दूसरे शहर को)
यह कह कर ऊंट की नकेल अबू सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हाथ से छीन ली, और मुझे ज़बर्दस्ती वापस ले आये। मेरी सुसरात के लोग बनू अब्दुल असद को, जो अबू सलमा के रिश्तेदार थे, जब इस किस्से की ख़बर मिली तो, वह मेरे मैके वालों बनू मुग़ीरा से झड़गने लगे कि, तुमने अपनी लड़की को तो इख़्तियार है, मगर हम अपने लड़के सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को तुम्हारे पास क्यों छोड़ दें। जबकि तुमने अपनी लड़की को उसके खाविन्द के पास नहीं छोड़ा, और वह कह कर मेरे लड़के सलमा को भी मुझसे छीन लिया।
अब मैं और मेरा लड़का और शौहर तीनों जुदा-जुदा हो गए, खाविन्द तो मदीना चले गये। मैं अपने मैके में रह गई, और बेटा अपनी ददिहाल में पहुंच गया। मैं रोज़ मैदान में निकल आती, और शाम तक रोया करती। इसी तरह पूरा एक साल मुझे रोते गुज़र गया, न मैं खाविन्द के पास जा सकी, न बच्चा मुझसे मिल सका।
एक दिन मेरे एक चचाज़ाद भाई ने, मेरे हाल पर तरस खाकर अपने लोगों से कहा कि, तुम्हे इस मिस्कीना पर तरस नहीं आता, कि उसको बच्चा और शौहर से तुमने जुदा कर रखा है, उसको क्यों नहीं छोड़ देते। ग़र्ज मेरे चचाज़ाद भाई ने, कह सुन कर इस बात पर सबको राज़ी कर लिया। उन्होंने मुझे इजाजत दे दी कि तू अपने खाविन्द के पास जाना चाहती है, तो चली जा। यह देखकर बनू अब्दुल असद ने भी लड़का दे दिया। मैंने एक ऊंट तैयार किया, और बच्चा गोद में लेकर ऊंट पर तन्हा सवार होकर मदीना को चल दी। तीन-चार मील चली थी, कि तनइम, में उस्मान बिन तल्हा मुझे मिले।
मुझे पूछा, कि अकेली कहां जा रही हो, मैंने कहा अपने खाविन्द के पास मदीना जा रही हूं। उन्होंने कहा, कोई तुम्हारे साथ नहीं। मैंने कहा अल्लाह की जात के सिवा कोई नहीं है। उन्होंने मेरे ऊंट की नकेल पकड़ी, और आगे-आगे चल दिए। खुदा पाक की कसम, मुझे उस्मान से ज़्यादा शरीफ़ आदमी कोई नहीं मिला। जब उतरने का वक़्त होता, तो वह मेरे ऊंट को बिठा कर खुद अलाहिदा दरख़्त की आड़ में हो जाते, मैं उत्तर जाती और जब सवार होने का वक़्त होता, ऊंट को सामान वग़ैरह लाद कर मेरे क़रीब बिठा देते। मैं उस पर सवार हो जाती, और वह आकर उसकी नकेल पकड़ कर आगे-आगे चलने लगते,
इसी तरह हम मदीना मुनव्वरा पहुंचे। जब कुबा में पहुंचे तो, उन्होंने कहा कि तुम्हारा खाविन्द यही है। उस वक़्त तक अबू सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कुबा ही में मुक़ीम थे। उस्मान मुझे वहां पहुंचा कर खुद मक्का मुकर्रमा वापस हो गए। फिर कहा कि खुदा की कसम, उस्मान बिन तल्हा से ज़्यादा करीम, और शरीफ आदमी मैंने नहीं देखा और इस साल में जितनी मशक़्क़त और तकलीफ़ मैंने बर्दाश्त की, शायद ही किसी ने की हो।
फायदा,- अल्लाह पर भरोसे की बात थी, कि तन्हा हिजरत के इरादे से चल दी। अल्लाह जल्ला शानुहू ने अपने फ़ज्ल से, उनकी मदद का सामान मुहय्या कर दिया। जो अल्लाह पर भरोसा कर लेता है, अल्लाह जल्ला शानुहू उसकी मदद फ़र्माता है। बन्दों के दिल उसी के कब्ज़े में हैं। हिजरत का सफ़र अगर कोई महरम, न हो तो तनहा भी जायज़ है, बशर्ते कि हिजरत फ़र्ज़ हो, इसलिए उनके तन्हा सफ़र पर शरॶी इष्काल परेशानी दिक्कत नहीं।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें