Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B10/1_3

दसवां बाब पेज नम्बर 168से172तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,औरतों का दीनी जज़्बा

[3D]हक़ीक़त यह है कि अगर औरतों में दीन का शौक़, और नेक आमाल का जज़्बा पैदा हो जाये तो,औलाद पर उसका असर ज़रूरी है। इसके बर-ख़िलाफ़ हमारे ज़माने में औलाद को शुरू ही से, ऐसे माहौल में रखा जाता है, जिस में उस पर दीन के ख़िलाफ़ असर पड़े, या कम अज़ कम यह कि दीन की तरफ, बे-तवज्जोही पैदा हो जाए। जब ऐसे माहौल में इब्तिदाई ज़िन्दगी गुज़रेगी, तो इससे जो नताइज पैदा होंगे वह ज़ाहिर हैं।

हदीस नम्बर 1, तस्बीहात हज़रत फ़ातिमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,

[3D]हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अपने एक शागिर्द से फ़र्माया, कि मैं तुम्हें अपना और फ़ातिमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, का, जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की सब से ज़्यादा लाडली बेटी थीं, क़िस्सा सुनाऊं। शागिर्द ने कहा, ज़रूर, फ़र्माया कि वह अपने हाथ से चक्की पीसती थीं, जिस की वजह से हाथ में निशान पड़ गये थे, और खुद पानी की मश्क भर कर लाती थीं, जिसकी वजह से सीने पर मश्क की रस्सी के निशान पड़ गये थे, और घर की झाड़ू वग़ैरह भी खुद ही देती थीं, जिसकी वजह से तमाम कपड़े मैले-कुचैले रहते थे।

एक मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पास कुछ गुलाम-बांदियां आयीं। मैंने फ़ातिमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से कहा कि तुम भी जाकर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से एक ख़िदमदगार मांग लो, ताकि तुमको कुछ मदद मिल जाए। वह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में हाज़िर हुई। वहां मजमा था,और शर्म, मिज़ाज में बहुत ज्यादा थी, इसलिए शर्म की वजह से, सब के सामने बाप से भी मांगते हुए शर्म आयी। वापस आ गयीं। 

दूसरे दिन हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुद तशरीफ़ लाये। इर्शाद फ़र्माया कि फ़ातिमा कल तुम किस काम के लिए गयी थीं, वह शर्म की वजह से चुप हो गयीं। मैंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, इनकी यह हालत है, कि चक्की की वजह से हाथों में गट्टे पड़ गये, और मश्क की वजह से सीने पर रस्सी के निशान हो गये, हर वक़्त के कारोबार की वजह से कपड़े मैले रहते हैं। मैंने उनसे कल कहा था,कि आपके पास ख़ादिम आये हुए हैं, एक यह भी मांग लें, इसलिए गई थीं।

बाज़ रिवायत में आया है कि हज़रत फ़ातिमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह, मेरे और अली के पास एक ही बिस्तरा है, और वह भी मेंढे की एक खाल है। रात को उसको बिछाकर सो जाते हैं, सुबह को उसी पर घास - दाना डाल कर ऊंट को खिलाते हैं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फ़र्माया कि बेटी सब्र करो। हज़रत मूसा और उनकी बीवी के पास दस वर्ष तक, एक ही बिछौना (बिस्तरा) था। वह भी हज़रत मूसा का चोग़ा था। रात को उसी को बिछाकर सो जाते थे, 

तू तक़्वा हासिल कर, और अल्लाह से डर, और अपने परवरदिगार का फ़रीज़ा अदा करती रह, और घर के कारोबार को अंजाम देती रह, और जब सोने के वास्ते लेटा करे तो, सुब्हानअल्लाह 33 मर्तबा, अल्हम्दु लिल्लाह 33 मर्तबा, और अल्लाहु अक्बर 34 मर्तबा पढ़ लिया कर। यह ख़ादिम से ज़्यादा अच्छी चीज़ है। हज़रत फ़ातिमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने अर्ज़ किया, मैं अल्लाह से और उसके रसूल से राज़ी हूं।

फायदा,- यानी जो अल्लाह की और उसके रसूल की, रज़ा मेरे बारे में हो, मुझे बा-खुशी मंज़ूर है। यह थी ज़िन्दगी दो जहान के बादशाह की बेटी की। आज हम लोगों में से किसी के पास दो पैसे हो जायें, तो उसके घर वाले घर का काम-काज दर किनार, अपना काम भी न कर सकें। पाख़ाने में लोटा भी मामा ही रख कर आये। इस वाक़िआ में जो ऊपर ज़िक्र किया गया, सिर्फ सोने के वक़्त का ज़िक्र है। दूसरी हदीसों में हर नमाज़ के बाद 33 मर्तबा यह तीनों कलिमे और एक मर्तबा- لَا إِلٰهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ, ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहू ला शरी-क लहू लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर, भी आया है।

हदीस नम्बर 2, हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, का सदक़ा

हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, की ख़िदमत में दो गोनेन दिरहमों की, भर कर पेश की गयीं जिनमें एक लाख से ज्यादा दिरहम थे। हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने तबाक़ मंगाया और उनको भर-भर कर, तक़्सीम फ़र्माना शुरू कर दिया, और शाम तक सब ख़त्म कर दिए। एक दिरहम भी बाक़ी न छोड़ा, खुद रोज़ेदार थीं। इफ़्तार के वक़्त बांदी से कहा, कि इफ़्तार के लिए कुछ ले आओ, वह एक रोटी और ज़ैतून का तेल लाई, और अर्ज़ करने लगी, क्या अच्छा होता कि एक दिरहम का गोश्त ही मंगा लेतीं, आज हम रोज़ा गोश्त से इफ़्तार कर लेते। फ़र्माने लगीं, अब ताना देने से क्या हो, उस वक़्त याद दिलाती तो मैं मंगा लेतीं।

फायदा,- हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, की ख़िदमत में इस नौअ के नज़राने, अमीर मुआविया रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, वग़ैरह हज़रात की तरफ से पेश किये जाते थे, क्योंकि वह ज़माना फुतूहात की कसरत का था। मकानों में ग़ल्ला की तरह से अशर्फ़ियों के अंबार पड़े रहते थे, और इसके बावजूद अपनी ज़िन्दगी निहायत सादा, और निहायत मामूली गुज़ारी जाती थी, हत्ताकि इफ़्तार के वास्ते भी, मामा के याद दिलाने की ज़रूरत थी। पच्चीस हज़ार रुपये के क़रीब तक़्सीम कर दिया, और यह भी ख़्याल न आया कि मेरा रोज़ा है, और गोश्त भी मंगाना है।

आजकल इस क़िस्म के वाक़िआत इतने दूर हो गये हैं, कि खुद वाक़िआ के सच्चा होने में तरद्दुद होने लगा, लेकिन उस ज़माने की आम ज़िन्दगी जिन लोगों की नज़र में है, उनके नज़दीक यह और इस क़िस्म के सैकड़ों वाक़िआत, कुछ भी ताज्जुब की चीज़ नहीं। खुद हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, के बहुत से वाक़िआत इसके क़रीब -क़रीब हैं।

एक दफ़ा रोज़ेदार थीं, और घर में एक रोटी के सिवा कुछ न था। एक फ़क़ीर ने आकर सवाल किया। ख़ादिमा से फ़र्माया कि यह एक रोटी इसको दे दो। उसने अर्ज़ किया कि, इफ़्तार के लिए घर में कुछ भी नहीं। फ़र्माया क्या मुज़ाइक़ा है, वह रोटी इस को दे दो, उसने दे दी।

एक मर्तबा एक सांप मार दिया। ख़्वाब में देखा, कोई कहता है, कि तुम ने एक मुसलमान को क़त्ल कर दिया, फ़र्माया, अगर वह मुसलमान होता तो, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की बीवियों के यहां न आता। उसने कहा, मगर पर्दे की हालत में आया था, इस पर घबरा कर आंख खुल गई, और बारह हज़ार दिरहम, जो एक आदमी का खूंबहा होते हैं, सदक़ा किये। उरवा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने एक दफ़ा देखा, कि सत्तर हज़ार दिरहम सदक़ा किये,और अपने कुर्ते में पैबंद लग रहा था।

हदीस नम्बर 3, हज़रत इब्ने ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को सदक़े से रोकना

हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, के भांजे थे, और वह उनसे बहुत मुहब्बत फ़र्माती थीं। उन्होंने ही गोया भांजे को पाला था। हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, की इस फ़य्याज़ी से परेशान होकर, कि खुद तकलीफ़ें उठायें और जो आये वह फौरन ख़र्च कर दें, एक दफ़ा कह दिया कि,ख़ाला का हाथ किसी तरह रोकना चाहिए।

हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को भी यह फ़िक़रा (वाक्य) पहुंच गया, इस पर नाराज़ हो गईं, कि मेरा हाथ रोकना चाहता है,और उनसे न बोलने की नज़्र के तौर पर क़सम खाई। हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को ख़ाला की नाराज़ी का बहुत सदमा हुआ। बहुत से लोगों से सिफ़ारिश करायी, मगर उन्होंने अपनी क़सम का उज़्र फ़र्मा दिया। आख़िर जब अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बहुत ही परेशान हुए तो, हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की नन्हाल के दो हज़रात को सिफ़ारशी बनाकर साथ ले गए। 

यह दोनों हज़रात इजाज़त लेकर अन्दर गये। यह भी छुप कर साथ हो लिये। जब वह दोनों पर्दे के पीछे बैठे, और हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, पर्दे के अन्दर बैठकर बात-चीत फ़र्माने लगीं, तो यह जल्दी से पर्दे में चले गये, और जाकर ख़ाला रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से लिपट गये।

और बहुत रोये, और खुशामद की। वह दोनों हज़रात भी सिफ़ारिश करते रहे, और मुसलमान से बोलना छोड़ने के, मुताल्लिक़ हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के इर्शादात याद दिलाते रहे और अहादीस में जो मुमानअत (मनाही) इसकी आयी है, वह सुनाते रहे, जिसकी वजह से हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, उन अहादीस में, जो मुमानअत और मुसलमान से बोलना छोड़ने पर, जो इताब (गुस्सा) वारिद हुआ है, उसकी ताब न ला सकीं रोने लगीं। आख़िर माफ़ फ़र्मा दिया,और बोलने लगीं। 

लेकिन अपनी इस क़सम के कफ़्फ़ारे में बार-बार गुलाम आज़ाद करती थीं, हत्ताकि चालीस गुलाम आज़ाद किये और जब भी इस क़सम के तोड़ने का ख़्याल आ जाता, इतना रोतीं कि दुपट्टा तक आंसुओं से भीग जाता।

फायदा,- हम लोग सुबह से शाम तक, कितनी क़समें एक सांस में खा लेते हैं, और फिर उसकी कितनी परवाह करते हैं, इसका जवाब अपने ही सोचने का है। दूसरा शख़्स कौन हर वक़्त पास रहता है,जो बता दे, लेकिन जिन लोगों के यहां,अल्लाह के नाम की वक़अत है,और अल्लाह से अहद कर लेने के बाद पूरा करना ज़रूरी है, उनसे पूछो कि,अहद के पूरा न होने से दिल पर क्या गुज़रती है। इसी वजह से हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को जब यह वाक़िआ याद आता था, तो बहुत ज्यादा रोती थीं।

दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें

Previous Next

हलाल कमाई इन्सान खाता है

और हराम कमाई इन्सान को खा जाती है

Have A Nice Day Sir/Mam

Good Health Good Future For You and Me

نموذج الاتصال