Fazail e Amaal (Zikr) Pehli Fasal 16/30

 फ़ज़ाइले ज़िक्र 

फसल अव्वल आयाते ज़िक्र में

पेज 11 से 14  कुल हदीसे 15

हदीस नम्बर 16

(सूरह रअद, रुकूअ 4)

और जो शख़्स अल्लाह की तरफ मुतवज्जह होता है, उसको हिदायत फ़रमाते हैं, वह ऐसे लोग होते हैं, जो अल्लाह पर ईमान लाये, और अल्लाह के ज़िक्र से, उनके दिलों को इत्मीनान होता है। ख़ूब समझ लो कि, अल्लाह के ज़िक्र, (में ऐसी ख़ासियत है, कि उस) से दिलों को, इत्मीनान हो जाता है।

हदीस नम्बर 17

(सूरह इसरा, रुकूअ 12)

आप फ़रमा दीजिए कि ख़्वाह अल्लाह कहकर पुकारो या रहमान कहकर पुकारो, जिस नाम से भी पुकारोगे (वही बेहतर है) क्योंकि उसके लिए बहुत से अच्छे-अच्छे नाम हैं।

हदीस नम्बर 18

(सूरह कहफ़, रुकूअ 4)

और जब आप भूल जायें, तो अपने रब का ज़िक्र कर लिया कीजिए।

हदीस नम्बर 19

सूरह कहफ़, रुकूअ 4)

आप अपने को उन लोगों के साथ (बैठने का) पाबंद रखा कीजिए, जो सुबह-शाम अपने रब को पुकारते रहते हैं, महज़ उसकी रज़ा जोई (खुशी हासिल करना) के लिए और महज़ दुनिया की रौनक़ के ख़्याल से आपकी नज़र (यानी तवज्जोह) उनसे हटने न पाये (रौनक़ से यह मुराद है कि रईस मुसलमान हो जायें, तो इस्लाम को फ़रोग़ हो) और ऐसे शख़्स का कहना न मानें, जिसका दिल हमने अपनी याद से ग़ाफ़िल कर रखा है और वह अपनी ख़्वाहिशात का ताबेअ है और उसका हाल हद से बढ़ गया है (यह कुछ काफ़िरों की तरफ इशारा है)

हदीस नम्बर 20

(सूरह कहफ़, रुकूअ 14)

और हम दोज़ख को उस रोज़, (यानी क़यामत के दिन), काफ़िरों के सामने पेश कर देंगे, जिनकी आंखों पर हमारी याद से परदा पड़ा हुआ था।

हदीस नम्बर 21

सूरह मरयम, रुकूअ 1)

यह तज़किरा है, आपके परवरदिगार की, मेहरबानी फ़रमाने का, अपने बंदे ज़करीया (अलैहिस्सलाम) पर, जब कि उन्होंने अपने परवरदिगार को चुपके से पुकारा।

हदीस नम्बर 22

(सूरह मरयम, रुकूअ 3)

और पुकारता हूं, मैं अपने रब को, (क़तई) उम्मीद है कि मैं, अपने रब को पुकार कर, महरूम न रहूंगा।

हदीस नम्बर 23

(सूरह ताहा, रुकूअ 1)

बेशक मैं ही अल्लाह हूं, मेरे सिवा कोई माबूद नहीं। पस तुम (ऐ मूसा!) मेरी ही इबादत किया करो, और मेरी ही याद के लिए, नमाज़ पढ़ा करो। बिला शुबह क़यामत आने वाली है। मैं उसको पोशीदा रखना चाहता हूं, ताकि हर शख़्स को, उसके किये का बदला मिल जाये।

हदीस नम्बर 24

(सूरह ताहा, रुकूअ 2)

(हज़रत मूसा, और हज़रत हारून, अलइ हिस सलाम  को इर्शाद है), और मेरी याद में सुस्ती न करो।

हदीस नम्बर 25

(सूरह अंबिया, रुकूअ 6)

और नूह, (अलइ हिस सलाम,  का तज़किरा उनसे कीजिए), जब कि पुकारा उन्होंने अपने रब को, (हज़रत इब्राहीम अलइ हिस सलाम,  के क़िस्से से) पहले।

हदीस नम्बर 26

(सूरह अंबिया, रुकूअ 6)

और अय्यूब, (अलइ हिस सलाम का ज़िक्र कीजिए), जबकि उन्होंने अपने रब को पुकारा, कि मुझको बड़ी तकलीफ़ पहुंची, और आप सब मेहरबानों से ज़्यादा मेहरबान हैं।

हदीस नम्बर 27

(सूरह अंबिया, रुकूअ 6)

और मछली वाले, (पैग़म्बर यानी हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम का ज़िक्र कीजिए), जब (वह अपनी क़ौम से), ख़फ़ा होकर चले गये, और यह समझे कि हम उन पर दार-व-गीर (पकड़) न करेंगे, पस उन्होंने, अंधेरों में पुकारा, कि आपके सिवा कोई माबूद नहीं, आप हर ऐब से पाक हैं, बेशक मैं क़ुसूरवार हूं।

हदीस नम्बर 28

सूरह अंबिया, रुकूअ 6)

और ज़करीया, (अलैहिस्सलाम का ज़िक्र कीजिए), जब उन्होंने अपने रब को पुकारा, कि ऐ मेरे रब ! मुझे ला-वारिस न छोड़ो, और (यों तो) सब वारिसों से बेहतर, (और हक़ीक़ी वारिस) आप ही हैं।

हदीस नम्बर 29

(अरबी आयत)

बेशक यह सब,  (अंबिया, जिनका पहले से ज़िक्र हो रहा है), नेक कामों में दौड़ते थे, और पुकारते थे हमको (सवाब की) रग़बत, और (अज़ाब का) ख़ौफ़ करते हुए, और ये सब के सब हमारे लिए आजिज़ी करने वाले।

हदीस नम्बर 30

(सूरह हज, रुकूअ 4)

और आप (जन्नत वग़ैरह की), ख़ुशख़बरी सुना दीजिए, ऐसे ख़ुशूअ करने वालों को, जिनका यह हाल है कि, जब अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल डर जाते हैं।

इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी,  इन्शा अल्लाह 


दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, 

मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें

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