नवां बाब पेज नम्बर 166से168तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 10, हज़रत हुज़ैफ़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का जासूसी के लिए जाना
हज़रत हुज़ैफ़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़रमाते हैं, कि गुज़्वा-ए-ख़न्दक़ में हमारी एक तरफ तो मक्का के कुफ़्फ़ार, और उनके साथ दूसरे काफ़िरों के बहुत से गिरोह थे, जो हम पर चढ़ाई करके आये थे, और हमले के लिए तैयार थे,और दूसरी तरफ खुद मदीना मुनव्वरा में बनू कुरैज़ा के यहूद, हमारी दुश्मनी पर तुले हुए थे, जिन से हर वक़्त अंदेशा था, कि कहीं मदीना मुनव्वरा को खाली देखकर वह हमारे अहल व अयाल,बाल-बच्चे को बिल्कुल ख़त्म न कर दें।
हम लोग मदीना मुनव्वरा से बाहर लड़ाई के सिलसिले में पड़े हुए थे। मुनाफ़िक़ों की जमाअत घर के खाली, और तन्हा होने का बहाना करके इजाज़त लेकर अपने घरों को वापस जा रही थी,और हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, हर इजाज़त मांगने वाले को इजाज़त मरहमत फ़रमा देते थे।
इसी दौरान में एक रात आंधी इस क़दर शिद्दत से आयी, कि न इस से पहले कभी आयी, न इसके बाद, अंधेरा इस क़दर ज़्यादा कि आदमी के पास वाला आदमी तो क्या अपना हाथ भी नज़र नहीं आता था, और हवा इतनी सख़्त कि, इसका शोर बिजली की तरह गरज रहा था। मुनाफ़िक़ीन अपने घरों को लौट रहे थे, हम तीन सौ का मजमा उसी जगह था। हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक-एक का हाल दर्याफ़्त फ़रमा रहे थे, और इस अंधेरी में हर तरफ़ तहकीकात फ़रमा रहे थे। इतने में मेरे पास को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का गुज़र हुआ।
मेरे पास न तो दुश्मन से बचाव के वास्ते कोई हथियार, न सर्दी से बचाव के लिए कोई कपड़ा, सिर्फ एक छोटी सी चादर थी, जो ओढ़ने में घुटनों तक आती थी, और वह भी मेरी नहीं बीवी की थी। मैं उसको ओढ़े हुए घुटनों के बल ज़मीन से चिमटा हुआ बैठा था।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दर्याफ़्त फ़रमाया, कौन है, मैंने अर्ज़ किया, हुज़ैफ़ा मगर मुझ से सर्दी के मारे उठा भी न गया, और शर्म के मारे ज़मीन से चिमट गया। हुज़ूर ने इर्शाद फ़रमाया कि उठ खड़ा हो, और दुश्मनों के जल्से में जाकर उनकी ख़बर ला कि क्या हो रहा है। मैं उस वक़्त घबराहट और ख़ौफ़ और सर्दी की वजह से सबसे ज़्यादा खस्ता हाल था। मगर तामीले इर्शाद में उठकर फ़ौरन चल दिया। जब मैं जाने लगा तो हुज़ूर ने दुआ दी,अल्लाहुम्मह्फ़ज़हु मिम बैनि यदैहि व मिन ख़ल्फ़िही व अन यमीनिही व अन शिमालिही व मिन फ़ौक़िही व मिन तहतिही।या अल्लाह ,आप इसकी हिफ़ाज़त फ़रमाएं, सामने से और पीछे से, दाएं से और बाएं से, ऊपर से और नीचे से।
हुज़ैफ़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह इर्शाद फ़रमाना था, गोया मुझ से ख़ौफ़ और सर्दी बिल्कुल ही जाती रही। और हर-हर क़दम पर यह मालूम होता था, गोया गर्मी में चल रहा हूं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने चलते वक़्त यह भी इर्शाद फ़रमाया था, कि कोई हरकत न कर के आइयो। चुप-चाप देख कर आओ कि क्या हो रहा है। मैं वहां पहुंचा तो देखा कि आग जल रही है, और लोग सेक रहे हैं। एक शख़्स आग पर हाथ सेकता है, और कोख पर फेरता है, और हर तरफ से वापस चल दो, वापस चल दो की आवाज़ें आ रही हैं।
हर शख़्स अपने क़बीला वालों को आवाज़ देकर कहता है, कि वापस चलो और हवा की तेज़ी की वजह से चारों तरफ से पत्थर, उनके ख़ेमों पर बरस रहे थे। ख़ेमों की रस्सियां टूटती जाती थीं, और घोड़े वगैरह जानवर हलाक हो रहे थे।
अबू सुफ़ियान जो सारी जमाअतों का उस वक़्त गोया सरदार बन रहा था, आग पर सेक रहा था। मेरे दिल में आया कि अच्छा मौका है, उसको निमटाता चलू। तरकश में से तीर निकाल कर कमान में भी रख लिया, मगर फिर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद याद आया, कि कोई हरकत न कीजियो, देख कर चले आना। इसलिए मैंने तीर को तरकश में रख दिया। उनको शुबहा हो गया, कहने लगे तुम में कोई जासूस है। हर शख़्स अपने बराबर वाले का हाथ पकड़ ले, मैंने जल्दी से एक आदमी का हाथ पकड़ कर पूछा, तू कौन है ?
वह कहने लगा सुब्हानल्लाह, तू मुझे नहीं जानता, मैं फ़ुलां हूं। मैं वहां से वापस आया। आधे रास्ते पर था, तो क़रीब बीस सवार अमामा बांधे हुए मुझे मिले। उन्होंने कहा, अपने आक़ा से कह देना कि, अल्लाह ने दुश्मनों का इंतिज़ाम कर दिया, बेफ़िक्र रहें। मैं वापस पहुंचा तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक छोटी सी चादर ओढ़े नमाज़ पढ़ रहे थे। यह हमेशा की आदत शरीफ़ा थी कि जब कोई घबराहट की बात पेश आती तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, नमाज़ की तरफ मुतवज्जह हो जाया करते थे। नमाज़ से फ़राग़त पर, मैंने वहां का जो मन्ज़र देखा था अर्ज़ कर दिया,
जासूस का किस्सा सुन कर दन्दाने मुबारक (मुबारक दांत) चमकने लगे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मुझे अपने पांव मुबारक के क़रीब लिटा लिया, और अपनी चादर का ज़रा-सा हिस्सा मुझ पर डाल दिया। मैंने अपने सीने को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के तलवों से चिमटा लिया।
फायदा,- इन्हीं हज़रात का यह हिस्सा था, और इन्हीं को यह ज़ेबा था कि इस क़दर सख़्तियों और दिक़्क़तों की हालत में भी, तामील इर्शाद तन मन जान-माल, सब से ज़्यादा अज़ीज़ थी। अल्लाह जल्ला शानुहू बिला इस्तिहक़ाक और बिला अहलियत मुझ, नापाक को भी उनके इत्तिबाअ का कोई हिस्सा नसीब फ़र्मा दें तो ज़हे क़िस्मत।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, नवां बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें