फ़ज़ाइले ज़िक्र
फसल अव्वल आयाते ज़िक्र में
पेज 7 से 16 कुल हदीसे 15
[3D]अल्लाह तआला शानुहू के, पाक ज़िक्र में अगर कोई आयत, या हदीसे नबवी न भी वारिद होती, तब भी उस मुन्इमे हकीक़ी, (असल इनआम करने वाला यानी अल्लाह), का ज़िक्र ऐसा था, कि बन्दे को किसी आन भी, उससे ग़ाफ़िल न होना चाहिए था। कि उस ज़ाते पाक के इनाम व एहसान, हर आन इतने कसीर (ज़्यादा) हैं, जिनकी न कोई इन्तिहा है, न मिसाल। ऐसे मुन्इम का ज़िक्र, उसकी याद, उसका शुक्र, उसकी एहसानमंदी फ़ित्री चीज़ है-
ख़ुदावंदे आलम के क़ुर्बान मैं। करम जिसके लाखों हैं हर आन में।
लेकिन इस के साथ, जब क़ुरआन व हदीस, और बुज़ुर्गों के अक़वाल व अहवाल, उस पाक ज़िक्र की तर्ग़ीब व तहरीस (उकसाना और लालच बढ़ाना), से भरे हुए हैं, तो फिर क्या पूछना है। उस पाक ज़िक्र की बरकात का, और क्या ठिकाना है, उसके अन्वार का, ताहम अव्वल चंद आयात, फिर चंद अहादीस, इस मुबारक ज़िक्र के मुताल्लिक पेश करता हूं।
हदीस नम्बर 1
(अरबी आयत) (सूरह बक़रह, रुकूअ 18)
पस तुम मेरी याद करो, (मेरा ज़िक्र करो), मैं तुम्हें याद रखूंगा, और मेरा शुक्र अदा करते रहो, और ना-शुक्री न करो।
हदीस नम्बर 2
(सूरह बक़रह, रुकूअ 25)
फिर जब तुम, (हज के मौक़े में), अरफात से वापस आ जाओ, तो मुज़दल फ़ा में (ठहर कर), अल्लाह को याद करो, और इस तरह याद करो, जिस तरह तुमको बतला रखा है। दर हक़ीक़त तुम इससे पहले, महज़ ना-वाक़िफ़ थे।
हदीस नम्बर 3
(सूरह बक़रह, रुकूअ 25)
[3D]फिर जब तुम हज के आमाल पूरे कर चुको, तो अल्लाह का ज़िक्र किया करो। जिस तरह तुम अपने आबा (व-अज्दाद), (बाप-दादों), का ज़िक्र किया करते हो। (कि उनकी तारीफ़ों में रत बुलिल्सान (बढ़-चढ़ कर, बहुत ज़्यादा तारीफ़ें करते हो । बल्कि अल्लाह का ज़िक्र, इससे भी बढ़कर होना चाहिए। फिर (जो लोग अल्लाह को याद भी कर लेते हैं), उनमें से बाज़ तो ऐसे हैं ,जो अपनी दुआओं में, यों कहते हैं, ऐ परवरदिगार हमें तो दुनिया ही में दे दे, (सो उनको तो जो मिलना होगा, दुनिया ही में मिल जायेगा) और उनके लिए आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। और बाज़ आदमी यों कहते हैं, कि ऐ हमारे परवरदिगार, हमको दुनिया में भी बेहतरी अता फ़र्मा, और आख़िरत में भी बेहतरी अता कर,और हमको दोज़ख के अज़ाब से बचा। सो यही हैं, जिनको उनके अमल की वजह से (दोनों जहान में) हिस्सा मिलेगा,और अल्लाह जल्दी ही हिसाब लेने वाले हैं।
फायदा - हदीस में आया है, कि तीन शख़्सों की दुआ रद्द नहीं की जाती, (बल्कि ज़रूर क़ुबूल होती है)-एक वह जो कसरत से, अल्लाह का ज़िक्र करता हो। दूसरे मज़्लूम,। तीसरे वह बादशाह, जो ज़ुल्म न करता हो।
हदीस नम्बर 4
(सूरह बक़रह, रुकूअ 25)
और (हज के ज़माने में मिना, में भी ठहर कर) कई रोज़ तक अल्लाह को, याद किया करो, (उसका ज़िक्र किया करो)।
हदीस नम्बर 5
(सूरह आले इमरान, रुकूअ 4)
और कसरत से अपने रब को याद किया कीजिए और सुबह शाम तस्बीह किया कीजिए।
हदीस नम्बर 6
(सूरह आले इमरान, रुकूअ 20)
पहले से अक़्लमंदों का ज़िक्र है), वह ऐसे लोग हैं, जो अल्लाह तआला को, याद करते हैं, खड़े भी, बैठे भी, और लेटे हुए भी, और आसमानों और ज़मीनों के पैदा, होने में ग़ौर करते हैं । (और ग़ौर के बाद यह कहते हैं, कि) ऐ हमारे रब, आपने यह सब बेकार तो पैदा किया नहीं, हम आपकी तस्बीह करते हैं, आप हमको अज़ाबे जहन्नम से बचा लीजिए।
हदीस नम्बर 7
(सूरह निसा, रुकूअ 15)
जब तुम नमाज़ (खौफ़ जिसका पहले से ज़िक्र है), पूरी कर चुको तो, अल्लाह की याद में मश्गूल हो जाओ, खड़े भी, बैठे भी, और लेटे भी, किसी हाल में भी उसकी याद और उसके ज़िक्र से ग़ाफ़िल न हो।
हदीस नम्बर 8
(सूरह निसा, रुकूअ 21)
(मुनाफ़िक़ों की हालत का बयान है) और जब नमाज़ को खड़े होते हैं, तो बहुत ही काहिली से खड़े होते हैं, सिर्फ लोगों को अपना नमाज़ी होना दिखाते हैं और अल्लाह तआला का ज़िक्र भी नहीं करते, मगर यों ही थोड़ा सा।
हदीस नम्बर 9
(सूरह माइदा, रुकूअ 12)
शैतान तो यही चाहता है, कि शराब और जुए के ज़रिए से, तुम में आपस में अदावत, और बुग्ज़ पैदा कर दे, और तुमको अल्लाह के ज़िक्र और, नमाज़ से रोक दे। बताओ अब भी (इन बुरी चीज़ों से), बाज़ आ जाओगे?
हदीस नम्बर 10
(सूरह अन्आम, रुकूअ 6)
और उन लोगों को अपनी मजलिस से अलाहिदा न कीजिए, जो सुबह-शाम अपने परवरदिगार को पुकारते रहते हैं, जिससे ख़ास उसकी रज़ा का इरादा करते हैं।
हदीस नम्बर 11
(सूरह आराफ़, रुकूअ 7)
और पुकारा करो, उसको (यानी अल्लाह को), ख़ालिस करते हुए, उसके लिए दीन को।
हदीस नम्बर 12
(सूरह आराफ़, रुकूअ 7)
तुम लोग पुकारते रहो, अपने रब को, आजिज़ी करते हुए, और चुपके-चुपके (भी), बेशक हक़ तआला शानुहू हद से बढ़ने वालों को, ना पसंद करते हैं। और दुनिया में बाद इसके कि, उसकी इस्लाह कर दी गयी, फ़साद न फैलाओ, और अल्लाह जल्ले शानुहू को पुकारा करो, ख़ौफ़ के साथ, (अज़ाब से) और तमअ (लालच) के साथ, बेशक (रहमत में) अल्लाह की रहमत, अच्छे काम करने वालों के बहुत क़रीब है।
हदीस नम्बर 13
(सूरह आराफ़, रुकूअ 22)
अल्लाह ही के वास्ते हैं, अच्छे-अच्छे नाम, पस उनके साथ, अल्लाह को पुकारा करो।
हदीस नम्बर 14
(सूरह आराफ़, रुकूअ 24)
और अपने रब को याद किया कर, अपने दिल में, और ज़रा धीमी आवाज़ से भी, इस हालत में कि, आजिज़ी भी हो, और अल्लाह का ख़ौफ़ भी हो, (हमेशा) सुबह को भी और शाम को भी, और ग़ाफ़िलीन (ग़फ़लत करने वालों) में से न हो।
हदीस नम्बर 15
(सूरह अंफ़ाल, रुकूअ 1)
ईमान वाले तो वही लोग हैं, कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र, किया जाता है, तो (उसकी बड़ाई के तसव्वुर से), उनके दिल डर जाते हैं, और जब उन पर अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं, तो उनके ईमान को बढ़ा देती हैं, और वह अपने अल्लाह पर तवक्कुल करते हैं। (आगे उनकी नमाज़ वग़ैरह के ज़िक्र के बाद इर्शाद है,), यही लोग सच्चे ईमान वाले हैं, इनके लिए बड़े-बड़े दर्जे हैं, इनके रब के पास, और मग़्फ़िरत है, और इज़्ज़त की रोज़ी है।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह
दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,
मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें
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