Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B1/2

हिकायते सहाबा पहला बाब,किस्सा हज़रत अनस बिन नज़र, रजि अल्लाहु तआला अन्हु, की शहादत का (हदीस नम्बर 2),पेज 23 से 24,फ़ज़ाइल ए आमाल हिंदी

हजरत अनस बिन नजर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी थे जो बदर की लड़ाई में शरीक नहीं हो सके थे। उनको इस चीज़ का सदमा था, इस पर अपने नफ्स को मलामत करते थे, कि इस्लाम की पहली अजी मुश्शान लड़ाई,और तू उसमें शरीक न हो सका।उनकी तमन्ना थी,कि कोई दूसरी लड़ाई हो तो हौसले पूरे करूँं। इत्तिफाक से उहद की लड़ाई पेश आ गई, जिसमें यह बड़ी बहादुरी और दिलेरी से शरीक हुए। 

उहद की लड़ाई में,अव्वल-अव्वल तो मुसलमानों को फतह हुई, मगर आखिर में एक गलती की वजह से मुसलमानों को शिकस्त हुई, वह गलती यह थी, कि हुज़ूरे अकरम सललल्लाहु अलैहि व सल्‍लम,ने कुछ आदमियों को एक खास जगह मुक़र्रर फर्माया था,कि तुम लोग इतने मैं न कहूं, इस जगह से न हटना, कि वहां से दृश्मन के हमला करने का . अन्देशा था। जब मुसलमानों को शुरू में फतह हुई,तो दुश्मनो को भागता हुआ देखकर यह लोग भी अपनी जगह से यह समझकर हट गए,कि अब जंग खत्म हो चुकी, इसलिए भागते हुए दुश्मनो का पीछा किया जाये, और गनीमत का माल हासिल : : किया जाये। 

इस जमाअत के सरदार ने मना भी किया कि हुजूर सललल्लाहु अलैहि व सल्‍लम, की मुमान अत थी, तुम यहां से न हटो, मगर उन लोगों ने यह समझ कर,कि हुजूर सललल्लाहु अलैहि व सल्‍लम, का इर्शाद सिर्फ लड़ाई के वक्‍त के वास्ते था, वहां से हट कर मैदान में पहुंच गए। भागते हुए दुश्मनो ने उस जगह को खाली देख कर,उस तरफ से आकर हमला कर दिया। मुसलमान बे-फिक्र थे, इस अचानक बे-ख़बरी के हमले से मग्लूब” हो गये, और दोनों तरफ से दुश्मनो  के बीच में आ गए, जिस की वजह से इधर-उधर परेशान भाग रहे थे। 

हज़रत अनस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने देखा कि सामने से एक दूसरे सहाबी हजरत साद बिन म आज़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, आ रहे हैं। उनसे कहा कि ऐ साद ! कहाँ जा रहे हो ? ख़ुदा की कसम! जन्नत की खूश्बू उहद के पहाड़ से आ रही है,यह कह कर तलवार तो हाथ में थी ही, दुश्मनो  के हुजूम में घुस गए, और जब तक शहीद नहीं हो गये, वापस नहीं हुए, शहादत के बाद उनके बदन को देखा गया तो छलनी हो गया था। अस्सी से ज्यादा जख्म, तीर और तलवारों के बदन पर थे। उनकी बहन ने,उंगलियों के पोरों से,उन को पहचाना।


फायदा,- जो लोग इख्लास और सच्ची तलब, के साथ अल्लाह के काम में लगजाते हैं, उनको दुनिया ही में जन्नत का मजा आने लगता है। यह हजरत अनस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,जिंदगी ही में, जन्नत की खुश्बू सूंघ रहे थे। अगर इख्लास आदमी में हो जावे,तो,दुनिया में भी जन्नत का मजा,आने लगता है। मैंने एक मोतबर शख्स से, जो हजरते

अक़्दस मौलाना शाह अब्दुर रहीम साहब, रायपुरी रहमतुल्लाहि अलैहि के मुख्लिस खादिम हैं, हजरत का कोल सुना है, कि जन्नत का मजा आ रहा है।' फजाइले रमजान में इस किस्से को लिख चुका हूं।

दुवा का तलब गार,आपका खादिम,मुहम्मद इलयास, मेरे और,मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें 



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