हिकायते सहाबा पहला बाब, हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के,ताइफ़ के सफर का किस्सा,हदीस नम्बर1 ,पेज 20से22तक, फ़ज़ाइल आमाल हिन्दी,
नुबूवत मिल जाने के बाद नौ वर्ष तक नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का मुकर्रमा में तब्लीग फरमाते रहे,और कौम की हिदायत और इस्लाह की कोशिश फरमाते रहे, लेकिन थोड़ी सी जमाअत के सिवा जो मुसलमान हो गई थी और थोड़े से ऐसे लोगों के अलावा जो बावजूद मुसलमान न होने के आप की मदद करते थे,
अक्सर कुफ्फारे मक्का आपको और आप के सहाबा रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु को हर तरह की तकलीफें पहुंचाते थे, मजाक उड़ाते थे, और जो हो सकता था, उससे दर गुजर ना करते थे,हुज्रूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, के चचा अबूतालिब भी उन्हीं नेक दिल लोगों में से थे,जो बावजूद मुसलमान ना होने के हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम,की हर किस्म की मदद करते थे,
दसवें साल में जब अबूतालिब का भी इन्तिकाल हो गया तो काफिरों को और भी हर तरह खुले मुहार इस्लाम से रोकने और मुसलमानों को तकलीफ पहुंचाने का मौका मिला,हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, इस ख्याल से ताइफ तश्रीफ ले गये,कि वहां कबीला सकीफ की बड़ी जमाअत है। अगर वह कबीला मुसलमान हो जाये तो मुसलमानों को इन तकलीफ से निजात मिले और दीन के फैलने की बुनियाद पड़ जाए
वहां पहुंच कर कबीले के तीन सरदारों से, जो बड़े दरजे के समझे जाते थे, गुफ्तगू फर्माई और अल्लाह के दीन की तरफ बुलाया और अल्लाह के रसूल की यानी अपनी मदद की तरफ मुतवज्जह किया मगर उन लोगों ने बजाय इसके, कि दीन की बात को क़ुबूल करते या कम से कम अरब की मशहूर मेहमान-नवाज़ी के लिहाज़ से एक नौ-वारिद” मेहमान की खातिर-मुदारात करने से साफ जवाब दे दिया
और निहायत बे-रुखी और बद-अख्लाकी से पेश आये उन लोगों ने यह भी गवारा न किया कि आप यहां कियाम फर्मा लेंजिन लोगों को सरदार समझ कर यह बात की थी कि शरीफ होंगे और मुहज्जब गुफ़्तगू करेंगे, उनमें से एक शख्स बोला, कि ओ, हो, आप को ही अल्लाह ने नबी बनाकर भेजा है, दूसरा बोला कि अल्लाह को तुम्हारे सिवा कोई और मिलता ही नहीं था, जिसको रसूल बनाकर भेजते। तीसरे ने कहा, मैं तुझसे बात नहीं करना चाहता, इसलिए कि अगर तू वाकई नबी है जैसा कि दावा है, तो तेरी बात से इन्कार कर देना मुसीबत से खाली नहीं, अगर झूठ है तो मैं ऐसे शख्स से बात नहीं करना चाहता
इसके बाद उन लोगों से ना-उम्मीद होकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम,ने और लोगों से बात करने का इरादा फर्माया कि आप तो हिम्मत और इस्तक़लाल के पहाड़ थे, मगर किसी ने भी क़ुबूल न किया, बल्कि बजाए क़ुबूल करने के हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम,से कहा कि हमारे शहर से फ़ौरन निकल जाओ और जहां तुम्हारी चाहत की जगह हो, वहां चले जाओ,
हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम,जब उनसे बिल्कुल मायूस होकर वापस होने लगे, तो उन लोगों ने शहर के लड़कों को पीछे लगा दिया,कि आप का मजाक ऊंड़ायें, तालियां पीटें, पत्थर मारें, हत्ता कि आप के दोनों जूते,खून के जारी होने से रंगीन हो गये,हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, इसी हालत में वापस हुए। जब रास्ते में एक जगह इन शरीरों से इत्मीनान हुआ, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, ने यह दुआ मांगी-
ऐ अल्लाह, तुझी से शिकायत करता हूं, मैं अपनी कमजोरी और बेकसी की, और लोगों में जिल्लत व रुसवाई की,ऐ अरहमुर राहीमीन,तू ही जोफा का रब है और तू ही मेरा परवरदिगार है,तू मुझे किस के हवाले करता है,किसी अजनबी बेगाने के, जो मुझे देख कर तुर्शरू” होता है, और मुंह चिढ़ाता है,या कि किसी दुश्मन के, जिसको तूने मुझ पर काबू दे दिया,
ऐ अल्लाह,अगर तू मुझ से नाराज नहीं है, तो मुझे किसी की भी परवाह नहीं है। तेरी हिफाज़त मुझे काफी है। मैं तेरे चेहरे के उस नूर के तुफैल, जिससे तमाम अंधेरियां रौशन हो गयीं, और जिससे दुनिया और आखिरत के सारे काम दुरुस्त हो जाते हैं, इस बात से पनाह मांगता हूं,कि मुझ पर तेरा गुस्सा हो या तू मुझसे नाराज़ हो, तेरी नाराजगी का उस वक्त तक दूर करना ज़रूरी है,जब तक तू राजी न हो, न तेरे सिवा कोई ताकत हैं, न कुव वत
मालिकुल मुल्क की शान ए कहारी को इस पर जोश आना ही था,कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने आकर सलाम किया, और अर्ज किया कि अल्लाह तआला ने आपकी कौम की वह गुफ्तगू, जो आप से हुई, सुनी और उनके जवा बात सुने, और एक फरिश्ते को जिस के मुताल्लिक पहाड़ों की खिदमत्त है, आप के पास भेजा है, कि आप जो चाहें उसको हुक्म दें,
इसके बाद उस फरिश्ते ने सलाम किया, और अर्ज किया कि जो इर्शाद हो, मैं उसकी तामील करूं,अगर इर्शाद हो तो दोनों जानिब के पहाड़ों को मिला दूं, जिससे यह सब दर्मियान में कुचल जायें, या औरं जो सजा आप तजवीज फर्मायें। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, की रहीम व करीम जात ने जवाब दिया,कि मैं अल्लाह से इसकी उम्मीद रखता हूं, कि अगर यह मुसलमान नहीं हुए, तो इनकी औलादों में से ऐसे लोग पैदा हों, जो अल्लाह की इबादत करें।
फायदा यह हैं अख्लाक उस करीम जात के, जिस के हम लोग नाम लेवा हैं, कि हम ज़रा सी तकलीफ से,किसी को मामूली गाली दे देने से,ऐसे भड़क जातें हैं, कि फिर उम्र भर उसका बदला नहीं उतरता ,ज़ुल्म पर ज़ुल्म करते रहते हैं, और दावा करते हैं,अपने मुहम्मदी होने का, नबी के पैरू बनने का। नबी करीम सल्लल्लाहु अंलैहि व सललम, इतनी सख्त तकलीफ और मशक्कत उठाने के बावजूद, न बद-दुआ फरमाते हैं, न कोई बदला लेते हैं,
दुवा का तलब गार,आपका खादिम,मुहम्मद इलयास, मेरे और,मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें