Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B1/3

हिकायते सहाबा पहला बाब,सुलह हुदैबिया, और अबू जंदल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, और अबू बसीर रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु,का किस्सा,पेज 24से26 तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी

सन 6 हिजरी में, हुज़ूर अक़दस सल्लललाहु अलईही वसल्लम, उमराह के इरादे से मक्का तशरीफ़ ले जा रहे थे। कुफ्फार-ए-मक्का (मक्का के काफिरों) को इस की ख़बर हुई और उन्होंने इस ख़बर को अपनी ज़िल्लत (अपमान) समझा, इसलिए मुज़ाहमत (रुकावट / विरोध) की और हुदैबिया में आपको रुकना पड़ा।जाँ-निसार (जान न्योछावर करने वाले) सहाबा रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, साथ थे, जो हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, पर जान कुर्बान करना फखर समझते थे, और लड़ने को तैयार हो गए। मगर हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने मक्का वालों की खातिर से लड़ने का इरादा नहीं फ़रमाया और सुलह की कोशिश की।

बावजूद सहाबा रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, की लड़ाई पर मुस्तैदी (तत्परता / चुस्ती) और बहादुरी के, हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने कुफ्फार की इस कदर रिआयत (छूट / लिहाज़) फ़रमाई कि उन की हर शर्त को क़ुबूल कर लिया। सहाबा रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, को इस तरह दब कर सुलह करना बहुत ही नागवार (बुरा लगने वाला / अप्रिय) था, मगर हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के इरशाद (आदेश) के सामने क्या हो सकता था, क्योंकि वो जाँ-निसार थे और फरमाबरदार (आज्ञाकारी)।

इस लिए हज़रत उमर रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, जैसे बहादुरों को दबना पड़ा। सुलह में जो शर्तें तय हुईं, उन में एक शर्त यह थी कि काफिरों में जो शख्स इस्लाम लाए और हिजरत करे, मुसलमान उस को मक्का वापस कर दें। और मुसलमानों में से खुदा ना ख़्वास्ता अगर कोई शख्स मुर्तद (अपने धर्म से फिर जाने वाला) हो कर चला आए तो वो वापस ना किया जाए।यह सुलहनामा अभी तक पूरा लिखा भी नहीं गया था, कि हज़रत अबू जंदल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी थे, जो इस्लाम लाने की वजह से तरह-तरह की तकलीफें बर्दाश्त कर रहे थे, और ज़ंजीरों में बंधे हुए थे। इसी हालत में गिरते-पड़ते मुसलमानों के, लश्कर में इस उम्मीद पर पहुंचे कि, इन लोगों की हिमायत में जाकर इस मुसीबत से छुटकारा पाऊंगा।

उनके बाप सुहैल ने जो इस सुलहनामा में, कुफ्फार की तरफ से वकील थे, (और उस वक्त तक मुसलमान नहीं हुए थे, फतह मक्का में मुसलमान हुए), उन्होंने साहबज़ादे के तमाचे मारे, और वापस ले जाने पर इसरार (ज़िद / आग्रह) किया। हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने इरशाद फ़रमाया, कि अभी सुलहनामा मुरत्तब (तैयार / लिखा जाना) भी नहीं हुआ, इसलिए अभी पाबंदी किस बात की, मगर उन्होंने इसरार किया।

फिर हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने फ़रमाया, एक आदमी मुझे मांगा ही दे दो, मगर वो लोग ज़िद पर थे, ना माने। अबू जंदल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने मुसलमानों को पुकार कर फरियाद भी की कि, मैं मुसलमान होकर आया, और कितनी मुसीबतें उठा चुका, अब वापस किया जा रहा हूँ। उस वक्त मुसलमानों के दिलों पर जो गुज़र रही होगी, अल्लाह ही को मालूम है मगर हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के इरशाद से वापस हुए। हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने तसल्ली फ़रमाई और सब्र करने का हुक्म दिया और फ़रमाया अनक़रीब (जल्द ही) हक़ ताआला शानुहू, तुम्हारे लिए रास्ता निकालेंगे।

सुलहनामा के मुकम्मल हो जाने के बाद एक दूसरे सहाबी अबू बसीर रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी मुसलमान हो कर मदीना मुनव्वरा पहुंचे। कुफ्फार ने उन को वापस बुलाने के लिए दो आदमी भेजे। हुज़ूर अक़दस सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने हस्ब-ए-वादा (वादे के अनुसार) वापस फरमा दिया। अबू बसीर रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ भी किया कि या रसूलअल्लाह! मैं मुसलमान होकर आया, आप मुझे कुफ्फार के पंजे में फिर भेजते हैं।

आपने उनसे भी सब्र करने को इरशाद फ़रमाया कि इंशा अल्लाह अनक़रीब (जल्द ही) तुम्हारे लिए रास्ता खुलेगा। यह सहाबी इन दोनों काफिरों के साथ वापस हुए। रास्ते में इन में से एक से कहने लगे, यार! तेरी यह तलवार तो बड़ी नफीस (उम्दा / बेहतरीन) मालूम होती है। शेखी बाज़ आदमी ज़रा सी बात में फूल ही जाता है, वो म्यान से निकाल कर कहने लगा कि हाँ, मैंने बहुत से लोगों पर इसका तजुर्बा किया। यह कह कर तलवार उनके हवाले कर दी, उन्होंने उसी पर उसका तजुर्बा किया (यानी उसको क़त्ल कर दिया)।

दूसरा साथी यह देख कर कि एक को निमटा दिया, अब मेरा नंबर है, भागा हुआ मदीना आया और हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की खिदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि मेरा साथी मर चुका है, अब मेरा नंबर है। उसके बाद अबू बसीर रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, पहुंचे और अर्ज़ किया कि या रसूलअल्लाह! आप अपना वादा पूरा फरमा चुके कि मुझे वापस कर दिया और मुझ से कोई अहद इन लोगों का नहीं है, जिस की ज़िम्मेदारी हो। वो मुझे मेरे दीन से हटाते हैं, इसलिए मैंने यह किया।

हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने फ़रमाया कि लड़ाई भड़काने वाला है, काश! कोई इसका मुईन-ओ-मददगार (सहायक और मदद करने वाला) होता। वो इस कलाम (बात) से समझ गए कि अब भी अगर कोई मेरी तलब (तलाश / खोज) में आएगा, तो मैं वापस कर दिया जाऊंगा, इसलिए वो वहां से चल कर समुद्र के किनारे एक जगह आ पड़े। मक्का वालों को इस किस्से का हाल मालूम हुआ तो अबू जंदल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी, जिनका किस्सा पहले गुज़रा, छुप कर वहीं पहुँच गए।

इस तरह जो शख्स मुसलमान होता, वो उन के साथ जा मिलता। चंद रोज़ में यह एक मुख़्तसर (छोटी सी) जमाअत हो गई। जंगल में जहाँ ना खाने का इंतज़ाम, ना वहां बाग़ात और आबादियाँ, इस लिए उन लोगों पर जो गुज़री होगी, वो तो अल्लाह ही को मालूम है। मगर जिन ज़ालिमों के ज़ुल्म से परेशान हो कर यह लोग भागते थे, उनका नातका (रास्ता) बंद कर दिया। जो क़ाफ़िला उधर को जाता, उससे मुक़ाबला करते और लड़ते, हत्ता कि कुफ्फार-ए-मक्का ने परेशान होकर हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की खिदमत में आजिज़ी और मन्नत करके अल्लाह का और रिश्तेदारी का वास्ता देकर आदमी भेजा कि इस बेसिरी,  जमाअत को आप अपने पास बुला लें, कि यह मुआहदा (समझौते) में तो दाखिल हो जाएं और हमारे लिए आने-जाने का रास्ता खुले।

लिखा है कि हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, का इजाज़त नामा, जब इन हज़रात के पास पहुंचा तो अबू बसीर रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, मरज़-उल-मौत (मौत की बीमारी) में गिरफ्तार थे। हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, का वाला नामा हाथ में था, कि इसी हालत में इंतकाल फ़रमाया (रज़ियल्लाहु अन्हु व अरदहु)।,आदमी अगर अपने दीन पर पक्का हो, बशर्ते कि दीन भी सच्चा हो, तो बड़ी से बड़ी ताक़त उसको नहीं हटा सकती, और मुसलमान की मदद का तो, अल्लाह का वादा है, बशर्ते कि वो मुसलमान हो।

दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें



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