नवां बाब पेज नम्बर 161से163तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 4, हज़रत वाइल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का जुबाब के लफ़्ज़ से बाल कटवा देना
वाइल बिन हजर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं एक मर्तबा हाज़िरे ख़िदमत हुआ। मेरे सर के बाल बहुत बड़े हुए थे। मैं सामने आया तो, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फर्माया 'जुबाब-जुबाब'। मैं यह समझा कि मेरे बालों को इरशाद फर्माया। मैं वापस गया और उनको कटवा दिया। जब दूसरे दिन ख़िदमत में हाज़िरी हुई, तो इरशाद फर्माया कि मैंने तुम्हें नहीं कहा था, लेकिन यह अच्छा किया।
फायदा,- जुबाब के मानी मनहूस के भी हैं, और बुरी चीज़ के भी। यह इशारों पर मर मिटने की बात है, कि मंशा समझने के बाद, ख़्वाह वह ग़लत ही समझा हो, उसकी तामील में देर न होती थी।
यहां हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद ही फर्मा दिया, कि तुमको नहीं कहा था, मगर यह चूंकि अपने मुताल्लिक समझे, इसलिए क्या मजाल थी कि देर होती। इब्तिदा-ए-इस्लाम में नमाज़ में बोलना जायज़ था, फिर मंसूख़ हो गया, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हाज़िरे ख़िदमत हुए। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, नमाज़ पढ़ रहे थे। उन्होंने हसबे मामूली सलाम किया, चूंकि नमाज़ में बोलना मंसूख़ हो चुका था, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने जवाब न दिया। वह फर्माते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के जवाब न देने से, नई और पुरानी बातें याद आकर मुख़्तलिफ़ ख़यालात ने मुझे आ घेरा। कभी सोचता, फ़लां बात से नाराज़गी हुई, कभी ख़याल करता कि फ़लां बात पेश आयी, आख़िर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने जब सलाम फेरा और इरशाद फर्माया, कि नमाज़ में कलाम करना मंसूख़ हो गया है, इसलिए मैंने सलाम का जवाब नहीं दिया था, तब जान में जान आयी।
हदीस नम्बर 5, हज़रत सुहैल बिन हंजला की आदत और ख़ुरैम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का बाल कटवा देना
दमिश्क़में सुहैल बिन हंजला रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, नामी एक सहाबी रहा करते थे, जो निहायत यक्सू थे, बहुत कम किसी से मिलते-जुलते थे, और कहीं आते-जाते न थे। दिन भर नमाज़ में मश्गूल रहते या तस्बीह,और वज़ाइक में [मस्जिद में आते-जाते रास्तों] में हज़रत अबूदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, पर जो मशहूर सहाबी हैं, गुज़र होता। अबूदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माते, कि कोई कलिमा-ए-खैर सुनाते जाओ, तुम्हें कोई नुक़सान नहीं, हमें नफ़ा हो जायेगा। तो वह कोई वाक़िआ हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के ज़माने का या कोई हदीस सुना देते।
एक मर्तबा इसी तरह जा रहे थे। अबूदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने मामूल के मुवाफ़िक दरख़्वास्त की, कि कोई कलिमा-ए-खैर सुनाते जाएं। कहने लगे कि एक मर्तबा, हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फर्माया कि, ख़ुरैम असदी अच्छा आदमी है, अगर दो बातें न हों, एक सर के बाल बहुत बड़े रखते हैं, दूसरे लुंगी टखनों से नीचे बांधता है। उनको हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह इरशाद पहुंचा, फ़ौरन कैंची लेकर बाल कानों के नीचे से काट दिये, और लुंगी आधी पिंडली तक बांधना शुरू कर दी।
फायदा,- बाज़ रिवायत में आया है, कि खुद हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने उन से इन दोनों बातों को इरशाद फर्माया, और उन्होंने क़सम खाकर कहा कि अब से न होगी। मगर दोनों रिवायतों में कुछ इष्काल एतराज शक नहीं। यह हो सकता है कि खुद उन से भी इरशाद फर्माया हो, और ग़ैबत में भी इरशाद फर्माया हो, जो सुनने वाले ने उनसे जाकर अर्ज़ कर दिया।
हदीस नम्बर 6, हज़रत इब्ने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का अपने बेटे से न बोलना
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने एक मर्तबा इरशाद फर्माया, कि हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फर्माया था कि, औरतों को मस्जिद में जाने की इजाज़त दे दिया करो। इब्ने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के एक साहबज़ादे ने अर्ज़ किया कि, हम तो इजाज़त नहीं दे सकते, क्योंकि वह उसको आइंदा चलकर बहाना बना लेंगी, आज़ादी और फ़साद व आवारगी का। हज़रत इब्ने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बहुत नाराज़ हुए, बुरा-भला कहा और फर्माया कि, मैं तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इरशाद सुनाऊं और तू कहे कि इजाज़त नहीं दे सकते। इसके बाद हमेशा के लिये साहबज़ादे से बोलना छोड़ दिया।
फायदा,- साहबज़ादे का यह कहना कि, किसी फ़साद का हीला बना लेंगी, अपने ज़माने की हालत को देख कर था। इसी वजह से खुद हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा,फर्माती हैं कि अगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, इस ज़माने की औरतों का हाल देखते, तो ज़रूर औरतों को मस्जिद में जाने से मना फर्मा देते। हालांकि हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, का ज़माना हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के कुछ ज़्यादा बाद का नहीं, लेकिन इसके बावजूद हज़रत इब्ने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को इसका तहम्मुल न हो सका कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के इरशाद को सुनकर, उसमें कोई तरद्दुद या ताम्मुल किया जाये
और सिर्फ़ इस बात पर कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के इरशाद पर उन्होंने इनकार किया, उम्र भर नहीं बोले, और हज़रात सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन को भी इसमें दिक़्क़तें उठानी पड़ीं, कि हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पाक इरशाद की अहमियत की वजह से जो उनकी जान थी, मस्जिद से रोकना भी मुश्किल था, और ज़माने के फ़साद की वजह से जिसका अन्देशा उसी वक़्त से शुरू हो गया था, इजाज़त भी मुश्किल थी। चुनांचे हज़रत आतिक़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, जिनके कई निकाह हुए, जिन में से हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से भी हुआ, वह मस्जिद में तशरीफ़ ले जाती थीं, और हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को गरां होता था।
किसी ने उन से कहा कि, उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को गरां होता है। उन्होंने कहा कि अगर उनको गरां है, तो मना कर दें। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के विसाल के बाद हज़रत जुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से निकाह हुआ। उनको भी यह चीज़ गरां थी, मगर रोकने की हिम्मत न हुई तो एक मर्तबा इशा की नमाज़ के लिए, यह जहां को जाती थीं, रास्ते में बैठ गये, और जब वह पास से गुज़रीं तो उनको छेड़ा। ख़ाविन्द थे, इसलिए उनको तो जायज़ था ही, मगर उनको ख़बर न हुई। अंधेरा था कि यह कौन है। इसके बाद से उन्होंने जाना छोड़ दिया। दूसरे वक़्त हज़रत जुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने पूछा कि मस्जिद में क्यों जाना छोड़ दिया, कहने लगीं कि अब ज़माना नहीं रहा।
दुवा का तलब गार,आपका खादिम,मुहम्मद इलयास, मेरे और,मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें