नवां बाब पेज नम्बर 157से160तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की फ़रमां बरदारी और इम्तिसाले हुक्म, और यह देखना कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का, मनशा-ए-मुबारक क्या है,
वैैसे तो सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का हर फ़ज़्ल फ़रमां बरदारी का था, और गुजिश्ता, पिछले किस्सों से भी यह बात खूब रौशन है, लेकिन ख़ास तौर से चन्द किस्से इस बाब में इसलिए, ज़िक्र किये जाते हैं, कि हम लोग अपनी हालतों का, इस बाब से ख़ास तौर पर मुक़ाबला करके देखें, कि हम अल्लाह की, और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के अहकाम की फ़रमांबरदारी, कहां तक करते हैं, जिस पर हम लोग हर वक़्त, इसके भी मुंतज़िर रहते हैं कि, वह बरकात, तरक़्क़ियात और समरात, जो सहाबा किराम को हासिल होते थे, हमें भी हासिल हों। अगर वाकई हम लोग, इस चीज़ के मुतमन्नी तमन्ना करने वाले हैं, तो हमें भी वह करना चाहिए, जो हज़रात करके दिखा गये हैं,
हदीस नम्बर 1, हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का चादर को जला देना
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि एक मर्तबा सफर में हम लोग हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ थे। मैं हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर हुआ। मेरे ऊपर एक चादर थी, जो कुलसुम के रंग में हल्की सी रंगी हुई थी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने देख कर फर्माया, यह क्या ओढ़ रखा है, मुझे इस सवाल से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की नागवारी के आसार मालूम हुए। घरवालों के पास वापस हुआ, तो उन्होंने चूल्हा जला रखा था। मैंने वह चादर उसमें डाल दी। दूसरे रोज़ जब हाजिरी हुई, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, वह चादर क्या हुई, मैंने किस्सा सुना दिया। आपने इरशाद फर्माया, औरतों में से किसी को क्यों न पहना दी। औरतों के पहनने में तो कोई मुजाइक़ा न था,
फायदा,- अगरचे चादर के जला देने की ज़रूरत ना थी,मगर जिस के दिल में किसी की, नागवारी और नाराजगी की चोट लगी हुई हो, वह इतनी सोच का मुतहम्मिल बर्दाश्त करने वाला ही नहीं होता, कि उसकी कोई और सूरत भी हो सकती है। हां मुझ जैसा नालायक होता तो, न मालूम कितने एहतमालात पैदा कर लेता, कि यह न-गवारी किस दर्जे की है, और दर्याफ्त तो कर लूं, और कोई सूरत इजाजत की भी हो सकती है, या नहीं और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने पूछा ही तो है, मना तो नहीं किया, वगैरेट-वगैरह।
हदीस नम्बर 2,अंसारी का मकान को ढाह देना
हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक मर्तबा दौलत कदा मकान से बाहर तशरीफ ले जा रहे थे। रास्ते में एक कुब्बा गुंबद दार हुजरा देखा, जो ऊंचा बना हुआ था। साथियों से दर्याफ्त फर्माया कि यह किसका है, उन्होंने अर्ज़ किया फलां अंसारी ने कुब्बा बनाया है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, सुनकर खामोश हो रहे। किसी दूसरे वक़्त वह अंसारी हाजिरे खिदमत हुए, और सलाम किया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने एराज़ मुंह फेर लिया, सलाम का जवाब भी न दिया। उन्होंने इस ख्याल से कि शायद ख्याल न हुआ हो, दोबारा सलाम किया। हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फिर भी एराज़ फर्माया और जवाब नहीं दिया। वह इसके कैसे मुतहम्मिल हो सकते थे।
सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से जो वहां मौजूद थे, दर्याफ्त किया, पूछा तहक़ीक़ किया कि मैं आज हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की नज़रों को फिरा हुआ पाता हूं, खैर तो है, उन्होंने कहा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, बाहर तशरीफ ले गये थे, रास्ते में तुम्हारा कुब्बा देखा था, और दर्याफ्त फर्माया था कि यह किस का है। यह सुनकर वह अंसारी फ़ौरन गये, और उसको तोड़ कर ऐसा ज़मीन के बराबर कर दिया, कि नाम व निशान भी न रहा, और फिर आकर अर्ज़ भी नहीं किया। इत्तिफ़ाकन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ही का उस जगह किसी दूसरे मौके पर गुज़र हुआ, तो देखा कि वह कुब्बा वहां नहीं है।
दर्याफ्त फर्माया। सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया कि अंसारी हज़रत के एराज़ का कई रोज़ हुए ज़िक्र किया था। हमने कह दिया था। कि तुम्हारा कुब्बा देखा है। उन्होंने आकर उसको बिल्कुल तोड़ दिया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फर्माया कि हर तामीर [निर्माण] आदमी पर वबाल है, मगर वह तामीर तो सख्त ज़रूरत और मजबूरी की हो।
फायदा,- यह कमाले इश्क़ की बातें हैं, इन हज़रात को इसका तहम्मुल ही नहीं था, कि चेहरा-ए-अन्वर को रंजीदा देखें, या कोई शख्स अपने से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की गिरानी को महसूस करे। इन सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कुब्बे को गिराया, और फिर यह भी नहीं कि गिराने के बाद जताने के तौर पर आकर कहते, कि आप की खुशी के वास्ते गिरा दिया, बल्कि जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का खुद ही इत्तिफ़ाक से, उधर को तशरीफ़ ले जाना हुआ तो मुलाहिज़ा फर्माया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को तामीर में रुपये का ज़ाया करना, ख़ास तौर से ना-गवार था। बहुत सी अहादीस में इसका ज़िक्र आया है। खुद अज़वाजे मुतहहरात के मकानात खजूर की टहनियों के टट्टे थे, जिन पर टाट के पर्दे पड़े रहते थे, ताकि अजनबी निगाह अन्दर न जा सके।
एक मर्तबा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, कहीं सफ़र में तशरीफ़ ले गये। हज़रत उम्मे सलमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को कुछ सर्वत [खुशहाली] हासिल थी। उन्होंने अपने मकान पर बजाए टट्टों के कच्ची ईंट लगा ली। वापसी पर जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मुलाहिज़ा फर्माया तो दर्याफ्त किया कि यह क्या किया। उन्होंने अर्ज़ किया कि, इसमें बे-पर्दगी का एहतमाल रहता है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया कि बद-तरीन चीज़, जिसमें आदमी का रुपया ख़र्च हो, तामीर है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि एक मर्तबा मैं, और मेरी वालिदा अपने मकान की एक दीवार को जो ख़राब हो गई थी, दुरुस्त कर रहे थे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मुलाहिज़ा फर्माया, और इरशाद फर्माया कि मौत इस दीवार के गिरने से ज़्यादा क़रीब है।
हदीस नम्बर 3,सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का सुर्ख़ चादरों को उतारना
हज़रत राफ़ेअ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हम लोग, एक मर्तबा सफ़र में हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के हम-रिकाब साथ थे,और हमारे ऊंटों पर चादरें पड़ी हुई थीं, जिनमें सुर्ख़ डोरे थे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फर्माया, मैं देखता हूं कि यह सुर्ख़ी तुम पर ग़ालिब होती जाती है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह इरशाद फर्माना था, कि हम लोग एक दम ऐसे घबरा के उठे, कि हमारे भागने से ऊंट भी इधर-उधर भागने लगे, और हमने फ़ौरन सब चादरें ऊंटों से उतार लीं।
फायदा,- सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन, की ज़िन्दगी में इस क़िस्म के वाक़िआत कोई अहमियत नहीं रखते, हां, हमारी ज़िन्दगी के एतबार से, इन पर ताज्जुब होता है। इन हज़रात की आम ज़िन्दगी ऐसी ही थी।
उर्वः बिन मसूद जब सुलह हुदैबिया में जिसका क़िस्सा बाब 1 नम्बर 3 पर गुज़रा, कुफ़्फ़ार की तरफ़ से क़ासिद की हैसियत से आये थे, तो मुसलमानों की हालत का बड़ी गौर से मुताला किया था, और मक्का वापस जाकर कुफ़्फ़ार से कहा था, कि मैं बड़े-बड़े बादशाहों के यहां क़ासिद बन कर गया हूं, फ़ारस व रोम, और हब्शा के बादशाहों से मिला हूं। मैंने किसी बादशाह के यहां, यह बात नहीं देखी कि उसके दरबारी, उसकी इस क़दर ताज़ीम इज़्ज़त करते हों, जितनी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की जमाअत उनकी ताज़ीम करती है।
कभी उनका बलग़म ज़मीन पर नहीं गिरने देती। वह किसी न किसी के हाथ पर पड़ता है, और वह उसको मुंह पर और बदन पर मलता है। जब वह कोई हुक्म करते हैं, तो हर शख्स दौड़ता है कि, तामील करे। जब वह वुज़ू करते हैं, तो वुज़ू का पानी बदन पर मलने, और लेने के वास्ते दौड़ते हैं, गोया आपस में जंग व जदल [लड़ाई-झगड़ा] हो जावेगा, और जब वह बात करते हैं, तो सब चुप हो जाते हैं। कोई शख्स उनकी तरफ़ अज़मत की वजह से निगाह उठा कर नहीं देख सकता।
दुवा का तलब गार,आपका खादिम,मुहम्मद इलयास, मेरे और,मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें