Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B8/10

आठवां बाब पेज नम्बर 148से157तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 10. हज़रत इबने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का अंसारी के पास जाना

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के विसाल के बाद मैंने, एक अंसारी से कहा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का तो विसाल हो गया, अभी तक सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की बड़ी जमाअत मौजूद है। आओ, उन से पूछ-पूछ कर मसाइल याद करें। इन अंसारी ने कहा, क्या इन सहाबा किराम की जमाअत के होते हुए भी, लोग तुम से मस्अला पूछने आयेंगे। सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की बहुत बड़ी जमाअत मौजूद है। ग़रज़ उन साहब ने तो हिम्मत नहीं की। मैं मसाइल के पीछे पड़ गया, 

और जिन साहब के मुताल्लिक भी मुझे इल्म होता, कि फलां हदीस उन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से सुनी है, उनके पास जाता, और तहकीक करता। मुझे मसाइल का बहुत बड़ा ज़खीरा अंसार से मिला। बाज़ लोगों के पास जाता, और मालूम होता कि वह सो रहे हैं, तो अपनी चादर वहीं चौखट पर रख कर, इन्तिज़ार में बैठ जाते, गो हवा से मुंह पर,और बदन पर मिट्टी भी पड़ती रहती, मगर मैं वहीं बैठा रहता। जब वह उठते तो जिस बात को मालूम करना था, वह दर्याफ्त करता।

वह हज़रात कहते भी कि, तुमने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के चचाज़ाद भाई होकर क्यों तकलीफ की, मुझे बुला लेते, मगर मैं कहता कि मैं इल्म हासिल करने वाला हूं, इसलिए मैं ही हाज़िर होने का ज़्यादा मुस्तहिक था। बाज़ हज़रात पूछते कि तुम कब से बैठे हो, मैं कहता बहुत देर से। वह कहते कि तुमने बुरा किया, मुझे इत्तिला कर देते। मैं कहता, मेरा दिल न चाहा, कि तुम मेरी वजह से अपनी ज़रूरियात से फारिग होने से पहले आओ, हत्ताकि एक वक़्त में यह नौबत भी आई, कि लोग इल्म हासिल करने के वास्ते मेरे पास जमा होने लगे। तब उन अंसारी साहब को भी कलक हुआ, कहने लगे कि यह लड़का हम से ज़्यादा होशियार था।

फायदा,- यही चीज़ थी, जिसने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को अपने वक़्त में हिब्रुल उम्मत,और बहरूल इल्म का लक़ब दिलवाया, जब उनका विसाल हुआ तो तायफ में थे। हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के साहबज़ादे मुहम्मद ने जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई, और फर्माया कि इस उम्मत का इमाम रब्बानी आज रुखसत हुआ।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि इब्ने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, आयतों के शाने नुज़ूल जानने में सब से मुम्ताज़ हैं। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उनको उलमा की मुम्ताज़ सफ में जगह देते थे। यह सब इसी जाफशानी, का समरा [फल] था, वरना अगर यह साहबज़ादगी के ज़ोओम [घमंड] में रहते तो, यह मरातिब [रुत्बे] कैसे हासिल होते, खुद आका-ए-नामदार नबी करीम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि जिन से इल्म हासिल करो, उनके साथ तवाज़ो से पेश आओ।

[3D]बुखारी में मुजाहिद रहमतुल्लाह अलईही, से नक़्ल किया है, कि जो शख़्स पढ़ने में हया करे, या तकब्बुर करे, वह इल्म हासिल नहीं कर सकता।

हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू का इर्शाद है, कि जिस शख़्स ने मुझको एक हर्फ भी पढ़ा दिया, मैं उसका गुलाम हूं, ख़्वाह वह मुझे आज़ाद कर दे या बेच दे। यह्या बिन कसीर रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं, कि इल्म तन परवरी सुख सुविधा के साथ हासिल नहीं होता। इमाम शाफई रहमतुल्लाह अलईही, का इर्शाद है कि जो शख़्स इल्म को बेदिली, और इस्तगना बे नियाज़ी के साथ हासिल करे, वह कामयाब नहीं हो सकता। हां, जो शख़्स खाकसारी और तंगदस्ती के साथ हासिल करना चाहे, वह कामयाब हो सकता है।

मुगीरह रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं कि हम लोग अपने, उस्ताद इब्राहीम रहमतुल्लाह अलईही, से ऐसे डरते थे, जैसा कि बादशाह से डरा करते हैं। यह्या बिन मुईन रहमतुल्लाह अलईही, बहुत बड़े मुहद्दिस हैं। इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलईही, उनके मुताल्लिक कहते हैं, कि मुहद्दिसीन का जितना एहतिराम वह करते थे, उतना किसी दूसरे को करते मैंने नहीं देखा।

[3D]इमाम अबूयूसुफ रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं कि मैंने बुजुर्गों से सुना है, कि जो उस्ताद की कद्र नहीं करता, वह कामयाब नहीं होता।

इस किस्से में जहां हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के असातज़ा उस्तादों के साथ, तवाज़ो और इंकिसारी मालूम होती है, उसके साथ ही इल्म का शगफ़, और एहतमाम भी मालूम होता है, कि जिस शख़्स के पास किसी हदीस का होना मालूम होता, फ़ौरन जाते, उसको हासिल फर्माते, ख़्वाह उसमें कितनी ही मशक्कत, मेहनत और तकलीफ उठानी पड़ती, और हक़ यह है कि बे-मेहनत और मशक्कत के इल्म तो दर किनार [दूर रहा] मामूली सी चीज़ भी हासिल नहीं होती, और यह तो ज़र्बल मसल [कहावत] है, मन तल बल उला सहरल्लयाली (जो शख़्स बुलन्द मर्तबा का तालिब होगा, रातों को जागेगा)

हारिस बिन यज़ीद, इब्ने शबरमा, कअकाअ, मुगीरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, चारों हज़रात इशा की नमाज़ के बाद इल्मी बहस शुरू करते थे। सुब्ह की अज़ान तक एक भी जुदा न होता। लैस बिन सअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि इमाम ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलईही, इशा के बाद बा वज़ू बैठ कर, हदीस का सिलसिला शुरू फर्माते तो सुब्ह कर देते, दरावरदी रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं,  कि इमाम अबूहनीफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और इमाम मालिक रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को मैंने देखा कि मस्जिदे नबवी में, इशा के बाद से एक मस्अले में बहस शुरू फर्माते, और वह भी इस तरह कि न कोई तान तश्नीअ होती, न तग़्लीत [ग़लत करना] और इसी हालत में सुब्ह हो जाती, और इसी जगह सुब्ह की नमाज़ पढ़ते।

इब्ने फुरात बगदादी रहमतुल्लाह अलईही, एक मुहद्दिस हैं। जब इन्तिकाल हुआ तो, अठारह सन्दूक किताबों के छोड़े, जिनमें से अक्सर खुद अपने क़लम की लिखी हुई थीं, और कमाल यह है कि मुहद्दिसीन के नज़दीक, सेहते नक़्ल और उम्दगी-ए-ज़ब्त के ऐतबार से उनका लिखा हुआ हुज्जत भी है।

इब्ने जौज़ी रहमतुल्लाह अलईही, मशहूर मुहद्दिस हैं। तीन साल की उम्र में बाप ने मुफारकत वफ़ात हो गई की। यतीमी की हालत में पर्वरिश पाई, लेकिन मेहनत की हालत यह थी कि जुमा की नमाज़ के अलावा घर से दूर नहीं जाते थे। एक मर्तबा मेम्बर पर कहा कि मैंने अपनी इन उंगलियों से दो हज़ार जिल्दें लिखी हैं। ढाई सौ से ज़्यादा खुद इनकी अपनी [किताबें] हैं। कहते हैं कि कोई वक़्त ज़ाया नहीं जाता था। चार जुज़ रोज़ाना लिखने का मामूल था। दर्स का यह आलम था, कि मजलिस में बाज़ मर्तबा एक लाख से ज़्यादा शागिर्दों का अन्दाज़ा किया गया। उमरा, वुज़रा, सलातीन [सरदार, वज़ीर, बादशाह] तक मजलिसे दर्स में हाज़िर होते थे।

इब्ने जौज़ी रहमतुल्लाह अलईही, खुद फर्माते हैं, कि एक लाख आदमी मुझ से बैअत हुए, और बीस हज़ार मेरे हाथ पर मुसलमान हुए हैं। इस सबके बावजूद शीओं का ज़ोर था। इस वजह से तकलीफें भी उठानी पड़ीं। अहादीस लिखने के वक़्त में क़लमों का तराशा जमा करते रहे थे। मरते वक़्त वसीयत की थी कि मेरे नहाने का पानी इसी से गर्म किया जाए। कहते हैं कि सिर्फ गुस्ले मय्यत का पानी गर्म करने ही के लिए काफ़ी न था, बल्कि गर्म करने के बाद बच भी गया था। यह्या बिन मुईन रहमतुल्लाह अलईही, हदीस के मशहूर उस्ताद हैं। कहते हैं कि मैंने अपने इन हाथों से दस लाख हदीसें लिखी हैं।

इब्ने जरीर तबरी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मशहूर मुवर्रिख [तारीख़ लिखने वाले] हैं। सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और ताबईन् रहमतुल्लाह अलईही, के अहवाल के माहिर, चालीस साल तक हमेशा चालीस वर्क़ रोज़ाना लिखने का मामूल था। उनके इन्तिकाल पर शागिर्दों ने रोज़ाना की लिखाई का हिसाब लगाया तो बुलूग़ के बाद से मरने तक चौदह वरक़ रोज़ाना का औसत निकला। उनकी तारीख़ मशहूर है, आमतौर से मिलती है। जब इस की तस्नीफ का इरादा ज़ाहिर किया, तो लोगों से पूछा कि तमाम आलम की तारीख़ से तो तुम लोग बहुत खुश होगे।

लोगों ने पूछा कि अन्दाज़न कितनी बड़ी होगी, कहने लगे कि तक़रीबन तीस हज़ार वरक़ (पन्ना) पर आयेगी। लोगों ने कहा कि उसके पूरा करने से पहले उम्रें फना हो जायेंगी। कहने लगे कि इन्नालिल्लाहि हिम्मतें पस्त हो गईं। उसके बद मुख्तसर किया और, तक़रीबन तीन हज़ार वरक़ पर लिखी। इसी तरह उनकी तफ़्सीर का भी किस्सा हुआ, वह भी मशहूर है, और आम तौर से मिलती है।

दार कुत्नी हदीस के मशहूर मुसन्निफ़ हैं। हदीस हासिल करने के लिए बग़दाद, बसरा, कूफा, वासित, मिस्र और शाम का सफर किया। एक बार उस्ताद की मजलिस में बैठे थे। उस्ताद पढ़ रहे थे, और यह कोई किताब नक़्ल कर रहे थे। एक साथी ने एतराज़ किया, कि तुम दूसरी तरफ मुतवज्जह हो, कहने लगे कि मेरी और तुम्हारी तवज्जुह में फ़र्क है। बताओ उस्ताद ने अब तक कितनी हदीसें सुनाईं। वह सोचने लगे। दार कुत्नी रहमतुल्लाह अलईही, ने कहा कि शेख ने अठारह हदीसें सुनाई हैं, पहली यह थी, दूसरी यह थी, इसी तरह तर्तीबवार सब की सब मय सनद के सुना दीं।

हाफ़िज़ असरम एक मुहद्दिस हैं। अहादीस के याद करने में बड़े मश्शाक [मश्कों वाले। एक मर्तबा हज को तशरीफ़ ले गये। वहां खुरासान के दो बड़े उस्तादे हदीस आये हुए थे,और हरम शरीफ में दोनों अलाहिदा-अलाहिदा दर्स दे रहे थे। हर एक के पास पढ़ने वालों का एक बड़ा मजमा मौजूद था। यह दोनों के दर्मियान में बैठ गये, और दोनों की हदीसें एक ही वक़्त में लिख डालीं। अब्दुल्लाह बिन मुबारक रहमतुल्लाह अलईही, मशहूर मुहद्दिस हैं। हदीस हासिल करने में उनकी मेहनतें मशहूर हैं। खुद कहते हैं कि मैंने चार हज़ार उस्तादों से हदीस हासिल की हैं।

अली बिन हसन रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं कि एक रात सख़्त सर्दी थी। मैं और इब्ने मुबारक रहमतुल्लाह अलईही, मस्जिद से इशा के बाद निकले। दरवाज़े पर एक हदीस में गुफ्तगू शुरू हो गयी, मैं कुछ कहता रहा, यह भी फर्माते रहे। वहीं खड़े-खड़े सुब्ह की अज़ान हो गई।

हुमैदी रहमतुल्लाह अलईही, एक मशहूर मुहद्दिस हैं, जिन्होंने बुखारी और मुस्लिम की अहादीस को एक जगह जमा भी किया है। रात भर लिखते थे, और गर्मी के मौसम में जब गर्मी बहुत सताती तो एक लगन में पानी भर लेते, और उसमें बैठ कर लिखते, सब से अलग रहते थे। शाइर भी हैं, उनके शेर हैं :- तर्जुमा- लोगों की मुलाक़ात कुछ फायदा नहीं देती, बजुज़ क़ील व क़ाल के, बकवास के, इसलिए लोगों की मुलाक़ात कम कर, ब-जुज़ इसके कि इल्म हासिल करने के वास्ते, उस्ताद से या इस्लाहे नफ़्स के वास्ते किसी शैख़ से मुलाक़ात हो।

इमाम तिबरानी रहमतुल्लाह अलईही, मशहूर मुहद्दिस हैं। बहुत सी तसानीफ़ फर्मायी हैं। किसी ने उनकी कसरते तसानीफ़ को देख कर पूछा, कि किस तरह लिखीं, कहने लगे कि तीस वर्ष बोरिए पर गुज़ार दिए यानी रात-दिन बोरिए पर पड़े रहते थे।अबुल अब्बास शीराजी रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं, कि मैंने तिबरानी रहमतुल्लाह अलईही, से तीन लाख हदीसें लिखी हैं।

इमाम अबूहनीफा रहमतुल्लाह अलईही, बड़ी शिद्दत के साथ नासिख और मंसूख [वह आयत या हदीस जो अपने से पहले को निरस्त कर दे, नासिख है और जो निरस्त हो, मसूख है] अहादीस की तहकीक फर्माते थे। कूफा जो उस ज़माने में इल्म का घर कहलाता था, उसमें जितने मुहद्दिसीन थे, सबकी अहादीस को जमा फर्माया था, और जब कोई बाहर से मुहद्दिस आते तो, शागिर्दों को हुक्म फर्माते कि इनके पास कोई ऐसी हदीस हो, जो अपने पास न हो तो उसकी तहकीक करो।

एक इल्मी मजलिस इमाम साहब रहमतुल्लाह अलईही, के यहां थीं, जिसमें मुहद्दिस, फकीह, अहले लुगत का मजमा था। जब कोई मस्अला दर पेश होता, तो इस मजलिस में उस पर बहस होती और बाज़ मर्तबा एक-एक महीने बहस रहती। इसके बाद जब कोई बात ते होती, तो वह मजहब करार दी जाती और लिख ली जाती। इमाम तिर्मिज़ी रहमतुल्लाह अलईही, के नाम से कौन ना-वाकिफ होगा। अहादीस की कसरत से याद करना और याद रखना उनकी खुसूसी शान थी, और कुववते हाफिजा में जर्बत मसल थे, बाज़ मुहद्दिसीन, ने उन का इम्तिहान लिया और चालीस हदीसें ऐसी सुनाई, जो गैर मारूफ थीं। इमाम तिर्मिज़ी रहमतुल्लाह अलईही, ने फौरन सुना दी]।

खुद इमाम तिर्मिज़ी रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं, कि मैंने मक्का मुकर्रमा के रास्ते में एक शेख की अहादीस के दो जुज्व नक्ल किये थे। इत्तिफाक से खुद उस शेख से मुलाकात हो गई। मैंने दर्याफ्त की कि इन दोनों जुज्व अहादीस के उस्ताद से सुन भी लूं। उन्होंने कबूल कर लिया। मैं समझ रहा था कि वह जुज्व मेरे पास है। मगर उस्ताद की ख़िदमत में गया तो बजाए उन के दो सादे जुज्व हाथ में थे। उस्ताद ने सुनाना शुरू कर दिया। [इत्तिफाक उनकी नज़र पड़ी तो मेरे हाथ में सादे जुज्व थे। नाराज़ होकर फर्माया, तुम्हे शर्म नहीं आती। मैंने किस्सा बयान किया और अर्ज़ किया कि आप जो सुनाते हैं, वह मुझे याद हो जाता है। उस्ताद को यकीन न आया, फर्माया अच्छा सुनाओ। मैंने सब हदीसें सुना दीं। फर्माया कि यह तुम को पहले से याद होगी। मैंने अर्ज़ किया कि और नयी हदीसें सुना दीजिए। उन्होंने चालीस हदीसें और सुना दीं। मैंने उनको भी फौरन सुना दिया और एक भी गलती नहीं की।

मुहर्रिसीन ने जो-जो मेहनतें अहादीस के याद करने में, उनको फैलाने में की हैं, उनका इत्तिबाअ तो दर किनार, उनका शुमार भी मुश्किल है। करतमा रहमतुल्लाह अलईही, एक मुहद्दिस हैं, ज़्यादा मशहूर भी नहीं हैं। उनके एक शागिर्द दाऊद रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं, कि लोग अबुहातिम रहमतुल्लाह अलईही, वगैरह के हाफ़िज़ों का ज़िक्र करते हैं। मैंने करतमा रहमतुल्लाह अलईही, से ज़्यादा हाफ़िज़ नहीं देखा। एक मर्तबा मैं उनके पास गया। कहने लगे कि इन कुतुब में से जो भी चाहो, उठा लो, मैं सुना दूंगा। मैंने किताबुल अशरबा उठाई। वह हर बाब के अब्बल से अखीर की तरफ़ पढ़ते चले गये, और पूरी किताब सुना दी।

अबूज़र्रा रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं, कि इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाह अलईही, को दस लाख हदीसें याद थीं। इसहाक़ बिन राहविया रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं कि एक लाख हदीसें मैंने जमा की हैं, तीस हज़ार मुझे अजबर जबानी याद हैं। खफ़ाफ़ रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं कि इस्हाक़ रहमतुल्लाह अलईही, ने ग्यारह हदीसें अपनी याद से हमें लिखवाईं और फिर उनको नम्बरवार सुनाया, न कोई हर्फ कम हुआ, न ज़्यादा।

अबूसअद अस्बहानी बग़दादी रहमतुल्लाह अलईही, सोलह साल की उम्र में, अबूनस्र रहमतुल्लाह अलईही, की अहादीस सुनने के लिए बग़दाद पहुंचे। रास्ते में उनके इन्तिकाल की ख़बर सुनी, बे-साख़्ता रो पड़े, चीखें निकल गईं,  कि उनकी सनद कहां मिलेगी, इतना रंज कि रोने में चीखें निकल जाएं, जब ही हो सकता है, जब किसी चीज़ का इश्क़ हो जाये। उनको मुस्लिम शरीफ़ पूरी हिफ़्ज़ याद थी, और हिफ़्ज़ ही तलबा तालिब इल्म, छात्र को लिखवाया करते थे, ग्यारह हज किये। जब खाना खाने बैठते तो आंखों में आंसू भर आते। अबूउमर ज़रीर रहमतुल्लाह अलईही, पैदाइशी ना-बीना थे, मगर हुफ़्ज़ाजे हदीस में शुमार हैं। इल्मे फ़िक़्ह, तारीख़, फ़राइज़, हिसाब में कामिल महारत रखते थे।

अबुल हुसैन अस्फ़हानी रहमतुल्लाह अलईही, को बुखारी शरीफ़ और मुस्लिम शरीफ़ दोनों याद थीं, बिलुसूस बुखारी शरीफ़ का तो यह हाल था, कि जो कोई सनद पढ़ता, उसका मतन यानी हदीस पढ़ देते, और जो मतन पढ़ता उसकी सनद पढ़ देते थे। शेख़ तक़ीयुद्दीन बाल बकी रहमतुल्लाह अलईही, ने चार महीने में मुस्लिम शरीफ़ तमाम हिफ़्ज़ कर ली थी, और जमा बैनस सहीहेन के भी हाफ़िज़ थे। साहिबे करामात बुजुर्ग थे। कुरान पाक के भी हाफ़िज़ थे। कहते हैं कि सूरः अन्आम सारी एक दिन में हिफ़्ज़ कर ली थी।

इब्नुस सुनी रहमतुल्लाह अलईही, इमाम नसाई रहमतुल्लाह अलईही, के मशहूर शागिर्द हैं। हदीस लिखने में अखीर तक मश्गूल रहे। उनके साहबज़ादे कहते हैं कि मेरे वालिद रहमतुल्लाह अलईही, ने लिखते-लिखते दवात में कलम रखा, और दोनों हाथ दुआ के वास्ते उठाये, और इसी हालत में इन्तिकाल हो गया।

अल्लामा साजी रहमतुल्लाह अलईही, ने बचपन में फ़िक़्ह हासिल किया। इसके बाद इल्मे हदीस का शुग्ल रहा, हिरात में दस वर्ष क्याम किया, जिसमें छः मर्तबा तिर्मिज़ी शरीफ़ अपने हाथ से लिखी। इंदे मुंदा रहमतुल्लाह अलईही, से गराइबे शोभा पढ़ रहे थे, इसी हाल में इबने मुंद रहमतुल्लाह अलईही, का इशा की नमाज़ के बाद इन्तिकाल हुआ। पढ़ने वाले से पढ़ाने वाले का वलवला इल्मी है, कि आख़िर वक़्त तक पढ़ाते रहे। अबूअम्र खिफ़ाफ़ रहमतुल्लाह अलईही, को एक लाख हदीसें अजबर जबानी थीं।

इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलईही, के उस्ताद आसिम बिन अली रहमतुल्लाह अलईही, जब बग़दाद पहुंचे, तो शागिर्दों का इस क़दर हुजूम भीड़ थी , कि अक्सर एक लाख से ज़ायद हो जाते थे। एक मर्तबा अंदाज़ा लगाया गया, तो एक लाख बीस हज़ार हुए। इसी वजह से बाज़ अल्फाज़ को कई-कई मर्तबा कहना पड़ता। उनके एक शागिर्द कहते हैं, कि एक मर्तबा 'हद्दनल्लैस' को चौदह मर्तबा कहना पड़ा। ज़ाहिर बात है कि सवा लाख, आदमियों को आवाज़ पहुंचाने के वास्ते बाज़ लफ़्ज़ों को कई-कई मर्तबा कहना ही पड़ेगा।

अबूमुस्लिम बसरी रहमतुल्लाह अलईही, जब बग़दाद पहुंचे तो एक बड़े मैदान में, हदीस का दर्स शुरू हुआ, सात आदमी खड़े होकर लिखवाते थे, जिस तरह ईद की तकबीरें कही जाती हैं। सबक़ के बाद दवातें शुमार की गयीं, तो चालीस हज़ार से ज़्यादा थी, और जो लोग सिर्फ़ सुनने वाले थे, वह उनसे अलाहिदा। फ़रयाबी रहमतुल्लाह अलईही, की मजलिस में इसी तरह, लिखवाने वाले तीन सौ सोलह थे, इससे मजमे का अंदाज़ा अपने आप हो जाता है। इस मेहनत और मशक्कत से यह पाक इल्म आज तक ज़िंदा है।

[3D]इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलईही, फर्माते हैं कि मैंने छः लाख हदीसों में से, इन्तिखाब करके बुखारी शरीफ़ लिखी है, जिसमें सात हज़ार दो सौ पछत्तर हदीसें हैं, और हर हदीस लिखते वक़्त, दो रकअत नफ़्ल नमाज़ पढ़ कर हदीस लिखी है। 

जब यह बग़दाद पहुंचे तो वहां के मुहद्दिसीन ने इनका इम्तिहान लिया, इस तरह कि दस आदमी मुतअय्यन तैनात हुए। इनमें से हर शख़्स ने दस-दस हदीसें छांटी, उनको बदल-बदल कर उनसे पूछा। यह हर सवाल के जवाब में मुझे मालूम नहीं कहते रहे, जब दस के दस पूछ चुके तो उन्होंने सबसे पहले पूछने वाले को मुखातिब, करके फर्माया कि तुमने न सब से पहली हदीस यह पूछी थी, तुमने इस तरह बयान की, यह ग़लत है और सही इस तरह है। दूसरी हदीस यह पूछी थी, वह इस तरह तुमने बयान की, यह ग़लत है, और सही इस तरह है, ग़रज़ इसी तरह सौ की सौ हदीसें तरतीब वार, बयान फर्मा दी कि हर हदीस को अब्बल इस तरह पढ़ते, जिस तरह इम्तिहान लेने वाले ने पढ़ा था, फिर कहते कि यह ग़लत है और सही इस तरह है।

[3D]इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाह अलईही, ने चौदह वर्ष की उम्र में हदीस पढ़ना शुरू की थी, उसी में अलोर तक मश्गूल रहे। खुद कहते हैं कि मैंने तीन लाख हदीस में से छांट कर मुस्लिम शरीफ़ तस्नीफ़ की है, जिसमें बारह हज़ार हदीसें हैं।

[3D]इमाम अबूदाऊद रहमतुल्लाह अलईही, कहते हैं कि मैंने पांच लाख अहादीस सुनी हैं, जिनमें से इन्तिखाब करके 'सुनन अबूदाऊद' शरीफ़ तस्नीफ़ की है, जिसमें चार हज़ार आठ सौ हदीसें हैं।

युसुफ़ मज़ी मशहूर मुहद्दिस हैं, अस्मा-ए-रिजाल के इमाम हैं। अव्वल अपने शहर में फ़िक़्ह और हदीस हासिल किया। इसके बाद मक्का मुकर्रमा, मदीना मुनव्वरा, हल्ब, हिमात, बालबक वग़ैरह का सफ़र किया। बहुत सी किताबें अपने क़लम से लिखीं, तह्ज़ीबुल, कमान दो सौ जिल्दों में तस्नीफ़ की और किताबुल अतराफ़ अस्सी जिल्दों से ज़्यादा। उनकी आदते शरीफ़ा थी, कि अक्सर चुप रहते, बात किसी से बहुत ही कम करते थे, अक्सर औकात किताब के देखने में मश्गूल रहते थे। हासिदों की अदावत का शिकार भी बने, मगर इन्तिकाम नहीं लिया।

इन हज़रात के हालात का अहाता दुश्वार है। बड़ी-बड़ी किताबें इनके हालात, और जांफ़शानियों का अहाता नहीं कर सकीं। यहां नमूने के तौर पर चन्द हज़रात के दो चार वाकिआत का ज़िक्र इसलिए किया, ताकि यह मालूम हो, कि इल्मे हदीस, जो आज चौदह सौ वर्ष तक निहायत आब व ताब से बाक़ी है, वह किस मेहनत और जांफ़शानी से बाक़ी रखा गया है, और जो लोग इल्म हासिल करने का दावा करते हैं, अपने आप को तालिबे इल्म कहते हैं, वह कितनी मेहनत व मशक्कत इसके लिए गवारा करते हैं। अगर हम लोग यह चाहें, कि हम अपनी ऐश व इशरत, राहत व आराम, सैर व तफ़रीह और दुनिया के दूसरे मशागिले में लगे रहें, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पाक कलाम का, यह शयूअ फैलाना इसी तरह बाक़ी रहे, तो 'ई खयालस्त व महालेस्त व जुनू , [यह ख़्याल जो मुश्कील भी है,और पागलपन का भी] के सिवा और क्या हो सकता है।

इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, आठवां बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें

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हलाल कमाई इन्सान खाता है

और हराम कमाई इन्सान को खा जाती है

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