आठवां बाब पेज नम्बर 142से147तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 7, क़त्ले मुसैलिमा,व क़ुरआन का जमा करना
हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के विसाल के बाद, मुसैलिमा कज़्ज़ाब (झूठा), जिसने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के सामने ही नुबुव्वत का दावा कर दिया था, असर बढ़ने लगा, चूँकि अरब में इर्तिदाद (दीन से फिर जाना) भी ज़ोर-शोर से शुरू हो गया था, इससे उसको और भी तक़्वियत पहुँची। हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उससे लड़ाई की। हक़ ताआला शानुहू ने इस्लाम को कुव्वत (ताक़त) अता फर्मायी, मुसैलिमा क़त्ल हुआ। लेकिन इस लड़ाई में सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अलैहिम अज्मईन की भी एक बड़ी जमाअत शहीद हुई,
बिलखुसूस क़ुरआने पाक के हाफ़िज़ों की एक बड़ी जमाअत शहीद हुई। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अमीरुल मोमिनीन हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ख़िदमत में हाज़िर हुए अर्ज़ किया कि इस लड़ाई में क़ारी (क़िराअत (क़ुरआन पढ़नें) बहुत शहीद हो गये। अगर इसी तरह एक दो लड़ाई में और शहीद हो गए, तो क़ुरआन पाक का बहुत सा हिस्सा ज़ाया हो जाने का अंदेशा है, इसलिए उसको एक जगह लिखवा कर महफ़ूज़ कर लिया जाए।
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फर्माया, ऐसे काम की कैसे जुर्रत करते हो, जिसको कि हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने नहीं किया, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, इस पर इस्रार फर्माते रहे, और ज़रूरत का इज़हार करते रहे, बिल आख़िर हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की राय भी मुवाफिक हो गई, तो हजरत ज़ैद बिन साबित रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को, जिन का किस्सा बाब 11 किस्सा 18 पर आ रहा है, बुलाया।
ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं हजरत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ख़िदमत में हाज़िर हुआ, तो हजरत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी तशरीफ रखते थे। हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अव्वल अपनी और हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की सारी गुफ्तगू नक़ल फरमायी। इसके बाद इर्शाद फरमाया, कि तुम जवान हो और दानिशमन्द, तुम पर किसी किस्म की बद-गुमानी भी नहीं, और इन सब बातों के अलावा यह कि खुद हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के ज़माने में भी तुम वही के लिखने पर मामूर रह चुके हो। इसलिए इस काम को तुम करो, लोगों के पास से कुरआन पाक जमा करो, और उसको एक जगह नक़ल कर दो।
ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि खुदा की कसम,अगर मुझे यह हुक्म फरमाते कि फलां पहाड़ को तोड़कर, इधर से उधर मुंतकिल कर दो यह हुक्म भी मेरे लिए, कुरआन पाक जमा करने के हुक्म से सहल था। मैंने अर्ज़ किया कि आप हज़रात ऐसा काम किस तरह कर रहे हैं, जिसको हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने नहीं किया। वह हज़रात मुझे समझाते रहे।
एक हदीस में आया है, कि हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से कहा कि अगर तुम उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की मुवाफिकत करो, तो मैं इसका हुक्म दूं, और नहीं तो फिर मैं भी इरादा न करूं।
ज़ैद बिन साबित रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि तवील गुफ्तगू के बाद, हक तआला शानुहु ने मेरा भी उसी जानिब शरहे सद्र (सीना खोल दिया), कि कुरआन पाक को यकजा जमा किया जाए। चुनांचे मैंने तामील इर्शाद में लोगों के पास जो कुरआन शरीफ मुतफर्रिक तौर पर लिखा हुआ था, और जो इन हज़रात सहाबा किराम के सीनों में भी महफूज़ था, सब को तलाश करके जमा किया।
फायदा,- इस किस्से में अव्वल तो इन हज़रात के इत्तिबाअ का एहतिमाम मालूम होता है, कि पहाड़ का मुंतकिल करना उनके लिए इससे सहल था, कि कोई ऐसा काम किया जाए जिसको हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने नहीं किया। इसके बाद कलाम पाक का जमा करना जो दीन की अस्ल है, अल्लाह ने इन हज़रात के आमालनामे में रखा था।
फिर हजरत ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इतना एहतिमाम इसके जमा फरमाने में किया, कि कोई आयत बगैर लिखी हुई नहीं लेते थे, जो हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के ज़माने की लिखी हुई थी, उन्हीं से जमा करते थे, और हुफ्फाज़ के सीनों से उसका मुकाबला करते थे, और चूंकि तमाम कुरआन शरीफ मुतफर्रिक जगहों में लिखा हुआ था, इसलिए उसकी तलाश में गो मेहनत जरूर करनी पड़ी, मगर सब मिल गया।
उबई बिन कअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिनको खुद हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने कुरआन पाक का सबसे ज्यादा माहिर बताया, उनकी इआनत (मदद) करते थे, इस मेहनत से कलामुल्लाह शरीफ, को इन हज़रात ने सबसे पहले जमा फरमाया।
हदीस नम्बर 8, हज़रत इब्ने मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की एहतियात रिवायते हदीस में
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बड़े मशहूर सहाबा में हैं, और उन सहाबा में शुमार हैं जो फत्वे के मालिक थे। इब्तिदा-ए-इस्लाम ही में मुसलमान हो गए थे, और हब्शा की हिजरत भी की थी। तमाम गज़वात (लड़ाइयों) में हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ शरीक रहे हैं, और मख्सूस खादिम होने की वजह से, साहिबुन्नअल, साहिबुल विसादः, साहिबुल मुतहहरः (जूते वाले, तकिए वाले, वुजू के पानी वाले) अल्काब भी उनके हैं, इसलिए कि हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की यह खिदमतें अक्सर इनके सुपुर्द रहती थीं,
हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का उनके बारे में यह भी इर्शाद है, कि अगर मैं किसी को बगैर मशवरा अमीर बनाऊं, तो अब्दुल्लाह बिन मसऊद को बनाऊं । हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह भी इर्शाद था, कि तुम्हें हर वक्त हाज़िरी (आना-जाना) की इजाज़त है। हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह भी इर्शाद है, कि जिस शख्स को कुरआन शरीफ बिल्कुल ऐसी तरह पढ़ना हो, जिस तरीके से उतरा है, तो अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के तरीके के मुवाफिक पढ़े।हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह भी इर्शाद है, कि इब्ने मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जो हदीस तुम से बयान करें, उस को सच समझो।
अबू मूसा अशअरी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हम लोग जब यमन से आये, तो एक ज़माने तक इब्ने मसऊद को अहलेबैत में से समझते रहे, इसलिए कि इतनी कसरत से उनकी और उनकी वालिदा की आमद व रफ्त, हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के घर में थी जैसी घर के आदमियों की होती है। लेकिन इन सब बातों के बावजूद अबू अम्र शैबानी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं एक साल तक इब्ने मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास रहा। मैंने कभी उनको हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की तरफ मंसूब कर के बात करते नहीं सुना, लेकिन कभी अगर हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की तरफ कोई बात मंसूब कर देते थे तो बदन पर कपकपी आ जाती थी।
अम्र बिन मैमून रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं हर जुमेरात को एक साल तक, इब्ने मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास आता रहा। मैंने कभी हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की तरफ निस्बत करके बात करते नहीं सुना, एक मर्तबा हदीस बयान फरमाते हुए, ज़बान पर यह जारी हो गया कि, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने यह इर्शाद फरमाया तो बदन कांप गया, आंखों में आंसू भर आये, पेशानी पर पसीना आ गया, रगें फूल गयीं और फरमाया, इन्शा अल्लाह, यही फरमाया या या इसके करीब-करीब था, या इससे कुछ ज्यादा या इससे कुछ कम।
फायदा,- यह थी उन हज़रात सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की एहतियात हदीस शरीफ के बारे में, इसलिए कि हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है कि जो मेरी तरफ से झूठ नक्ल करे, अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले, इस खौफ की वजह से यह हज़रात बावजूद कि मसाइल हुजूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के इर्शादात और हालात ही से बताते थे, मगर यह नहीं कहते थे, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह इर्शाद है, कि खुदा न ख्वास्ता झूठ न निकल जाए। इसके बिल मुकाबिल हम अपनी हालतें देखते हैं, कि बे धड़क, बे-तहकीक हदीस नकल कर देते हैं, ज़रा भी नहीं झिझकते, हालांकि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की तरफ मंसूब करके बात का नक्ल करना बड़ी सख्त ज़िम्मेदारी है। फिक्हे हन्फी, इन्ही अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से ज़्यादातर लिया गया है।
हदीस नम्बर 9, हज़रत अबुदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास हदीस के लिए जाना
कसीर बिन कैस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं हज़रत अबुदर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु के पास दमिश्क की मस्जिद में बैठा हुआ था। एक शख्स उनके खिदमत में आये, और कहा कि मैं मदीना मुनव्वरा से सिर्फ एक हदीस की वजह से आया हूं। मैंने सुना है कि, वह आपने हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से सुनी है।अबुदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने पूछा, कोई और तिजारती काम नहीं था, उन्होंने कहा नहीं।अबुदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फिर पूछा, ऐसी कोई दूसरी ग़रज़ तो न थी, कहा नहीं, सिर्फ हदीस ही मालूम करने के लिए आया हूं।
[3D]अबुदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फरमाया कि मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से सुना है कि जो शख्स कोई रास्ता इल्म हासिल करने के लिए चलता है, हक तआला शानुहु उसके लिए जन्नत का रास्ता सहल फर्मा देते हैं, और फरिश्ते अपने पर, तालिबे इल्म की खुशनूदी के वास्ते बिछा देते हैं, और तालिबे इल्म के लिए आसमान-ज़मीन के रहने वाले इस्तिगफार करते हैं, हताकि मछलियां जो पानी में रहती हैं, वह भी इस्तिगफार करती हैं, और आलिम की फज़ीलत आबिद पर ऐसी है, जैसा कि चांद की फज़ीलत तमाम सितारों पर है, और उलमा अंबिया के वारिस हैं। अंबिया अलैहिस्सातु वस्सलाम किसी को दीनार, व दिरहम का वारिस नहीं बनाते, बल्कि इल्म का वारिस बनाते हैं। जो शख्स इल्म को हासिल करता है, वह एक बड़ी दौलत को हासिल करता है।
फायदा,- हज़रत अबुदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फुकहा-ए-सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, में हैं, हकीमुल उम्मत कहलाते हैं। फरमाते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की नुबुवत के वक्त मैं तिजारत किया करता था। मैंने मुसलमान होने के बाद चाहा, कि तिजारत और इबादत दोनों को जमा करूं, मगर दोनों इकट्ठी न रह सकीं, तो मुझे तिजारत छोड़ना पड़ी। अब मेरा दिल यह भी गवारा नहीं करता कि, बिल्कुल दरवाज़े ही पर दुकान हो, जिसकी वजह से एक भी नमाज़ फौत न हो, और रोज़ाना चालीस दीनार का नफा हो, और मैं इन सबको सदका कर दूं। किसी ने पूछा ऐसी तिजारत से क्यों खफा हुए, कि नमाज़ भी न जाए, और इतना नफा रोज़ाना का अल्लाह के रास्ते में खर्च हो, फिर भी पसन्द नहीं करते। फरमाया हिसाब तो देना ही पड़ेगा।
अबुदर्दा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, यह भी फरमाते हैं, कि मुझे मौत से मुहब्बत है। अपने मौला से मुलाकात के शौक में, और फक्र से मुहब्बत है, तवाज़ो (आजिज़ी और नर्मी) के वास्ते और बीमारी से मुहब्बत है गुनाह धुलने के वास्ते। ऊपर के किस्से में एक हदीस की खातिर इतना तवील सफर किया है। इन हज़रात के यहां हदीस हासिल करने के लिए सफर करना कुछ अहम नहीं था, एक-एक हदीस सुनने और मालूम करने के लिए, दूर-दूर का सफर कर लेना, इन हज़रात को बहुत सहल था।
शअबी रहमतुल्लाह अलईही, एक मशहूर मुद्ददिस हैं। कूफा के रहने वाले हैं। अपने किसी शागिर्द को एक मर्तबा हदीस सुनाई, और फरमाया कि ले घर बैठे मुफ्त मिल गई, वरना इससे कम के लिए भी मदीना मुनव्वरा का सफर करना पड़ता था, कि इब्तिदा में हदीस का मख्रज़न (जहां खज़ाना मिले) मदीना तैयबा ही था। इल्मी शगफ रखने वाले हज़रात ने बड़े-बड़े, तवील सफर इल्म की खातिर इख्तियार फरमाये हैं। सईद बिनुल मुसय्यिब रहमतुल्लाह अलईही, जो एक मशहूर ताबई हैं, कहते हैं कि मैं, एक-एक हदीस की खातिर रातों और दिनों पैदल चला हूं।
इमामुल आइम्मा इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलईही, शव्वाल सन् 194 हिजरी में पैदा हुए। सन् 205 हिजरी में यानी ग्यारह साल की उम्र में, हदीस पढ़ना शुरू की थी, अब्दुल्लाह बिन मुबारक रहमतुल्लाह अलईही, की सब तसानीफ (किताबें) बचपन ही में हिफ्ज़ कर ली थीं। अपने शहर में जितनी अहादीस मिल सकीं, उनको हासिल कर लेने के बाद 216 हिजरी, में सफर शुरू किया। वालिद का इंतिकाल हो चुका था, इस वजह से यतीम थे। वालिदा सफर में साथ थीं, इसके बाद बल्ख, बगदाद, मक्का मुकर्रमा, बसरा, कूफा, शाम, अस्कलान, हिम्स, दमिश्क, इन शहरों में गये, और हर जगह जो ज़खीरा हदीस का मिल सका, हासिल फरमाया
और ऐसी नव उमरी में उस्तादे हदीस बन गये थे, कि मुंह पर दाढ़ी का एक बाल भी नहीं निकला था। कहते हैं कि मेरी अठारह वर्ष की उम्र थी, जब मैंने सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और ताबईन् के फैसले तसनीफ किये।
हाशिद रहमतुल्लाह अलईही, और उनके एक साथी कहते हैं, कि इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलईही, हम लोगों के साथ, उस्ताद के पास जाया करते। हम लोग लिखते और बुखारी रहमतुल्लाह अलईही, वैसे ही वापस आ जाते। हमने कई रोज़ गुज़र जाने पर उन से कहा, कि तुम वक़्त ज़ाया करते हो, वह चुप हो गये। जब कई मर्तबा कहा, तो कहने लगे तुमने दिक ही कर दिया। लाओ तुमने क्या लिखा। हमने अपना मजमूआ-ए-अहादीस निकाला, जो पन्द्रह हज़ार हदीसों से ज़्यादा मिकदार में था। उन्होंने इन सब को हिफ्ज़ सुना दिया, हम दंग रह गये।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें