Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B8/4_6

आठवां बाब पेज नम्बर 137से142तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 4, हज़रत उबई बिन कअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की तालीम

हज़रत उबई बिन कअब मशहूर सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और मशहूर क़ारियों में हैं। इस्लाम लाने से पहले से लिखना-पढ़ना जानते थे। अरब में लिखने का आम दस्तूर नहीं था, इस्लाम के बाद से इसका चर्चा हुआ, लेकिन यह पहले से वाकिफ़ थे। हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में हाज़िर रह कर, वही भी लिखा करते थे। क़ुरआन शरीफ़ के बड़े माहिर थे, और उन लोगों में थे, जिन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ज़िन्दगी में ही तमाम क़ुरआन शरीफ़ हिफ्ज़ कर लिया था। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि मेरी उम्मत के बड़े क़ारी उबई बिन कअब हैं। तहज्जुद में आठ रातों में क़ुरआन पाक के ख़त्म करने का एहतिमाम था। एक मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फर्माया कि, अल्लाह जल्ला शानुहू ने मुझे इर्शाद फर्माया है, कि तुम्हें क़ुरआन शरीफ़ सुनाऊँ। अर्ज़ किया या रसूलल्लाह,अल्लाह तआला ने मेरा नाम लेकर कहा। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, हां तुम्हारा नाम लेकर कहा। यह सुनकर फर्तै खुशी (बहुत ज़्यादा खुशी) से रोने लगे।

ज़िक्र मेरा मुझ से बेहतर है कि उस महफ़िल में है।

जुन्दुब बिन अब्दुल्लाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि मैं मदीना तैयबा इल्म हासिल करने के लिए हाज़िर हुआ तो, मस्जिदे नबवी में हदीस पढ़ाने वाले, मुताअद्दद हज़रात थे और शागिर्दों के हल्क़े मुतफ़र्रिक़ तौर पर, अलाहिदा-अलाहिदा हर उस्ताद के पास मौजूद थे। मैं इन हल्क़ों पर गुज़रता हुआ एक हल्क़े पर पहुँचा, जिसमें एक साहब मुसाफ़िराना हैयत के साथ, सिर्फ दो कपड़े बदन पर डाले हुए, बैठे हदीस पढ़ा रहे थे,मैंने लोगों से दर्याफ़्त किया कि यह कौन बुजुर्ग हैं। बताया कि मुसलमानों के सरदार उबई बिन कअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हैं। मैं उनके हल्का-ए-दर्स में बैठ गया। जब हदीस से फ़ारिग़ हुए तो घर जाने लगे। मैं भी पीछे हो लिया। वहाँ जाकर देखा, एक पुराना-सा-घर, खस्ता हालत, निहायत मामूली सामान, ज़ाहिदाना ज़िन्दगी।

हज़रत उबई रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि एक मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने (मेरा इम्तिहान लिया) इर्शाद फर्माया, कि क़ुरआन शरीफ़ में सबसे बड़ी आयत (बरकत और फज़ल के एतबार से) कौन सी है। मैंने अर्ज़ किया अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ही बेहतर जानते हैं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दोबारा सवाल फर्माया, मुझे अब अदब मानेअ हुआ। मैंने फिर वही जवाब दिया। तीसरी मर्तबा फिर इर्शाद फर्माया। मैंने अर्ज़ किया, आयतल कुर्सी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुश हुए और फर्माया, अल्लाह तुझे तेरा इल्म मुबारक करे।

एक मर्तबा हुज़ूर अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, नमाज़ पढ़ा रहे थे। एक आयत छूट गयी। हज़रत उबई रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने नमाज़ में लुक़्मा दिया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने नमाज़ के बाद इर्शाद फर्माया कि किसने बताया। हज़रत उबई रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया, मैंने बताया था, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फर्माया, मेरा भी यह गुमान था, कि तुमने ही बताया होगा।

फायदा, यह हज़रत उबई रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बावजूद इस इल्मी शग़्फ़ और क़ुरआन पाक की मख़्सूस ख़िदमात के, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ हर ग़ज़्वा में शरीक हुए हैं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का कोई जिहाद ऐसा नहीं, जिसमें उनकी शिर्कत न हुई हो।

हदीस नम्बर 5, हज़रत हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का एहतिमामे फितन

हज़रत हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मशहूर सहाबा में हैं। साहिबुस्सिर (भेदी) उनका लक़ब है। हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मुनाफ़िक़ीन और फित्नों का इल्म इनको बताया था। कहते हैं कि एक मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने क़यामत तक जितने फित्ने आने वाले हैं, सबको नम्बरवार बताया था। कोई ऐसा फित्ना जिसमें तीन सौ आदमियों के बक़द्र लोग शरीक हों, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने नहीं छोड़ा, बल्कि इन फित्ने का हाल और इसके मुक़्तदा (जिसकी पैरवी की जाए) का हाल मय उसके नाम के नीज़ उसकी माँ का नाम, उसके बाप का नाम, उसके क़बीले का नाम, साफ-साफ बता दिया था। 

हज़रत हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माते हैं, कि लोग हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से खैर की बातें दर्याफ़्त किया करते थे, और मैं बुराई की बातें दर्याफ़्त किया करता था, ताकि उससे बचा जाए। एक मर्तबा मैंने दर्याफ़्त किया, या रसूलल्लाह, यह खैर व खुशी, जिस पर आजकल आपकी बरकत से हम लोग हैं, इसके बाद भी कोई बुराई आने वाली है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, हां बुराई आने वाली है। मैंने अर्ज़ किया कि इस बुराई के बाद फिर भलाई लौटकर आयेगी, या नहीं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया कि हुज़ैफा, अल्लाह का कलाम पढ़, और उसके मायने पर ग़ौर कर, उसके अहकाम की इत्तिबाअ (पैरवी) कर,

[3D](मुझे फिक्र सवार था) मैंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, इस बुराई के बाद भलाई होगी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, हां, फिर भलाई होगी, लेकिन दिल ऐसे नहीं होंगे, जैसे पहले थे, मैंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, इस भलाई के बाद फिर बुराई होगी? हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, हां ऐसे लोग पैदा हो जाएंगे, जो आदमियों को गुमराह करेंगे,और जहन्नम की तरफ ले जाएंगे। मैंने अर्ज़ किया अगर मैं उस ज़माने को पाऊं तो क्या करूं,  हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, अगर मुसलमानों की कोई मुत तहिदा जमाअत हो, और उनका कोई बादशाह हो तो उसके साथ हो जाना, वरना इन सब फ़िर्कों को छोड़कर एक कोने में अलाहिदा बैठ जाना या, किसी दरख़्त की जड़ में जाकर बैठ जाना, और मरने तक वहीं बैठे रहना। 

चूँकि उनको मुनाफ़िक़ों का हाल,हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सबका बतला दिया था, इसलिए हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उनसे दर्याफ़्त फर्माया करते थे, कि मेरे हुक्काम में कोई मुनाफ़िक़ तो नहीं। एक मर्तबा उन्होंने अर्ज़ किया कि एक मुनाफ़िक़ है, मगर मैं नाम नहीं बताऊंगा। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उनको माज़ूल (निकाल दिया) कर दिया। ग़ालिबन अपनी फिरासत (ज़ेहन, अक़्ल) से पहचान लिया होगा। जब कोई शख़्स मर जाता,तो हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, तहक़ीक़ फर्माते, कि हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उनके जनाज़े में शरीक हैं या नहीं। अगर हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, शरीक होते, तो हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी नमाज़ पढ़ते, वरना वह भी न पढ़ते। 

हज़रत हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का जब इन्तिक़ाल होने लगा, तो निहायत घबराहट और बेचैनी से रो रहे थे। लोगों ने दर्याफ़्त किया, फर्माया, दुनिया के छूटने पर नहीं रो रहा हूं, बल्कि मौत तो मुझे महबूब है, अल-बत्ता इस पर रो रहा हूं कि, मुझे इसकी ख़बर नहीं कि, मैं अल्लाह की नाराज़ी पर जा रहा हूं या खुशनूदी पर। इसके बाद कहा कि यह मेरी दुनिया की आख़िरी घड़ी है, या अल्लाह, तुझे मालूम है कि मुझे तुझ से मुहब्बत है, इसलिए अपनी मुलाक़ात में बर्कत अता फर्मा।

हदीस नम्बर 6, हज़रत अबू हुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का अहादीस को हिफ़्ज़ करना

[3D]हज़रत अबू हुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, निहायत मशहूर और जलीलुल क़द्र सहाबी हैं, और इतनी कसरत से उनसे हदीसें नक़्ल हैं, कि किसी दूसरे सहाबी से इतनी ज़्यादा नक़्ल की हुई मौजूद नहीं हैं, इस पर लोगों को तअज्जुब होता था, कि सन् 7 हिजरी में यह मुसलमान होकर तशरीफ़ लाए, और सन् 11 हिजरी में हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का विसाल हो गया। इतनी क़लील मुद्दत में तक़रीबन चार वर्ष होती है, इतनी ज़्यादा हदीसें कैसे याद हुईं, खुद हज़रत अबूहुरैरा इसकी वजह बताते हैं। फर्माते हैं कि लोग कहते हैं, कि अबूहुरैरा (रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,) बहुत रिवायतें नक़्ल करते हैं,

[ED]मेरे मुहाजिर भाई तिजारते पेशा थे, बाज़ार में आना जाना रहता था, और मेरे अन्सारी भाई खेती का काम करते थे। इसकी मशगूली उनको दरपेश रहती थी, और अबू हुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अस्हाबे सुफ़्फ़ा के मसाकीन में से, एक मिस्कीन था जो हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमते अक़्दस में जो कुछ खाने को मिल जाता था, उस पर क़नाअत किये पड़ा रहता था, ऐसे औक़ात में मौजूद होता था, जिसमें वह नहीं होते थे, और ऐसी चीजें याद कर लेता था, जिनको वह याद नहीं कर सकते थे। एक मर्तबा मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से हाफ़िज़े की शिकायत की। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, चादर बिछा, मैंने चादर बिछायी। हुज़ूर ने दोनों हाथों से उसमें कुछ इशारा फर्माया। इसके बाद फर्माया, इस चादर को मिला ले। मैंने अपने सीने से मिला लिया। इसके बाद से कोई चीज़ नहीं भूला।

फायदा, अस्हाबे सुफ़्फ़ा वह लोग कहलाते हैं जो हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की गोया ख़ानक़ाह के रहने वाले थे। इन हज़रात के इख़राजात (ख़र्चे) का कोई ख़ास नज़्म नहीं था, गोया हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के मेहमान थे, जो कहीं से कुछ हदिया या सदक़े के तौर पर आता, इस पर उनका गुज़ारा था। हज़रत अबूहुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी उन्हीं लोगों में थे। बाज़ औक़ात (कभी-कभी) कई-कई वक़्त के फाक़े भी उन पर गुज़र जाते थे। बाज़ औक़ात भूख की वजह से जुनून की-सी हालत हो जाती थी, जैसा कि तीसरे बाब के क़िस्से नम्बर 3 व नम्बर 7 में गुज़रा, लेकिन इसके बावजूद अहादीस का कसरत से याद करना उनका मश्ग़ला था, जिसकी बदौलत आज सब से ज़्यादा अहादीस उन्हीं की बतलाई जाती हैं।

इब्ने जौज़ी रहमतुल्लाह अलईही, ने 'तल्कीह' में लिखा है कि पांच हज़ार तीन सौ चौहत्तर (5374) हदीसें उन से मर्वी हैं। एक मर्तबा हज़रत अबूहुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने जनाज़े के मुताल्लिक़ एक हदीस बयान की, कि हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है कि जो शख़्स जनाज़े की नमाज़ पढ़ कर वापस आ जाए, उसको एक क़ीरात सवाब मिलता है, और जो दफ़्न तक शरीक रहे, उसको दो क़ीरात सवाब मिलता है, और क़ीरात की मिक्दार ओहद के पहाड़ से भी ज़्यादा है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को इस हदीस में कुछ तरद्दुद हुआ। उन्होंने फर्माया, अबूहुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, सोच कर कहो। उनको गुस्सा आ गया। सीधे हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, के पास गए और जाकर अर्ज़ किया कि, मैं आपको क़सम देकर पूछता हूं, यह क़ीरात वाली हदीस आपने, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से सुनी है, उन्होंने फर्माया, हां सुनी है।

अबूहुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माने लगे, कि मुझे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के ज़माने में न तो बाग़ में कोई दरख़्त लगाना था, न बाज़ार में माल बेचना था। मैं तो हुज़ूर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के दरबार में पड़ा रहता था, और सिर्फ यह काम था, कि कोई बात याद करने को मिल जाए, या कुछ खाने को मिल जाए। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फर्माया, बेशक तुम हम लोगों से ज़्यादा हाज़िर बाश थे, और अहादीस को ज़्यादा जानने वाले थे।

इसके साथ ही अबूहुरैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैं बारह हज़ार मर्तबा रोज़ाना, इस्तिग़्फ़ार पढ़ता हूं और एक तागा उनके पास था, जिसमें एक हज़ार गिरह लगी हुई थीं। रात को उस वक़्त तक नहीं सोते थे, जब तक उसको ,सुब्हानअल्लाह, के साथ पूरा न कर लेते थे।

दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें


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