Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B8/1_3

आठवां बाब पेज नम्बर 133से137तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, इल्मी वलवला और उसका इन्हिमाक

चूंकि असल दीन कलिमा-ए-तौहीद है, और वही सब कमालात की बुनियाद है। जब तक वह न हो कोई कारे ख़ैर भी मक़बूल नहीं, इसलिए सहाबा-ए-किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की हिम्मत बिलखुसूस इब्तिदाई ज़माने में, ज़्यादा तर कलिमा-ए-तौहीद के फैलाने, और कुफ़्फ़ार से जिहाद करने में मशगूल थी, और वह इल्मी इन्हिमाक के लिए फ़ारिग़ व यकसू न थे, लेकिन इसके बावजूद इन मशाग़िल के साथ, इनका इन्हिमाक और शौक व शग़्फ, जिसका समरा आज चौदह सौ वर्ष तक, उलूमे कुरआन व हदीस का बक़ा है, एक खुली हुई चीज़ है।

इब्तिदा-ए-इस्लाम के बाद जब कुछ फ़रागत इन हज़रात को मयस्सर हो सकी, और जमाअत में भी कुछ इज़ाफा हुआ तो आयते कलामुल्लाह-,व मा कानल मुअमिनून लियन्फिरू काफ्फतन फ़ लौला न-फ़-र मिनकुल्लि फिरक़तिम मिन्हुम ताइफतुल्लिय-तफ़क़्क़हू फ़िद्दीनि व लियुन्ज़िरू क़ौम हुम इज़ा र-ज-ऊ इलैहिम ल अल्लहुम यहज़रून, नाज़िल हुई जिसका तर्जुमा यह है-,मुसलमानों को यह न चाहिए कि सब के सब निकल खड़े हों, तो ऐसा क्यों न किया जावे कि उनकी हर-हर बड़ी जमाअत में से, एक छोटी जमाअत जाया करे ताकि, बाक़ी मांदा लोग दीन की समझ-बूझ हासिल करते रहें, और ताकि वह क़ौम को जब वह उनके पास वापस आवे, डरावें ताकि वह एहतियात रखें (बयानुल कुरआन)।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माते हैं- 'इल्ला तन्फ़िरू युअज़्ज़िब्कुम् अज़ाबन् अलीमा,' से जो उमूम मालूम होता है, उसको 'वमा कानल् मोमिनू-न लियन्फिरू काफ्फ़-तन्' ने मंसूख कर दिया।

सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अज्मईन को, हक़ ताआला शानुहू ने जामईयत अता फर्मायी थी, और उस वक़्त के लिए यह चीज़ निहायत ही ज़रूरी थी, कि वही एक मुख़्तसर सी जमात, दीन के सारे काम सँभालने वाली थी, मगर ताबिईन के ज़माने में जब इस्लाम फैल गया, और मुसलमानों की बड़ी जमाअत और जमईयत हो गई। नीज़ सहाबा-ए-किराम जैसी जामईयत भी बाक़ी न रही, तो हर-हर शोबा-ए-दीन के लिए पूरी तवज्जोह से काम करने वाले, अल्लाह तआला ने पैदा फर्माये।

मुहद्दिसीन की मुस्तक़िल जमाअत बननी शुरू हो गयी, जिनका काम अहादीस का ज़ब्त और उनका फैलाना था। फुक़हा की अलाहिदा जमाअत हुई। सूफ़िया, क़ुर्रा, मुजाहिदीन, ग़रज़ दीन के हर-हर शोबे को मुस्तक़िल सँभालने वाले पैदा हुए। उस वक़्त के लिए यह ही चीज़ मुनासिब और ज़रूरी थी। अगर यह सूरत न होती तो, हर शोबे में कमाल और तरक़्क़ी दुश्वार थी, इसलिए कि हर शख़्स तमाम चीज़ों में इंतिहाई कमाल पैदा कर ले, यह बहुत दुश्वार है। यह सिफ़त हक़ ताआला शानुहू ने, अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम बिलखुसूस सय्यिदुल अंबिया सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ही को अता फर्मायी थी, इसलिए इस बाब में सहाबा किराम, रज़ियल्लाहु अन्हुम के अलावा और दीगर, हज़रात के वाक़िआत भी ज़िक्र किए जाएंगे।

हदीस नम्बर 1,फतवे का काम करने वाली जमात की फेहरिस्त

अगर्चे सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अज्मईन जिहाद और ऐला-ए-कलिमतुल्लाह (अल्लाह के कलमे को बुलन्द करने की), की मशगूली के बावजूद सब ही इल्मी मश्ग़ले में हर वक़्त मुन्हमिक (लगे रहना) थे, और हर शख़्स हर वक़्त जो कुछ हासिल कर लेता था, उसको फैलाना-पहुँचाना यही उसका मश्ग़ला था, लेकिन एक जमाअत फतवे के साथ मख़्सूस थी, जो हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के ज़माने में भी फतवे का काम करती थी, वह हज़रात ये हैं- हज़रत अबू बक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत उस्मान रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, उबई बिन कअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद, मुआज़ बिन जबल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, अम्मार बिन यासिर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, सलमान फ़ारसी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, ज़ैद बिन साबित रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, अबूमूसा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, अबूदर्दा रज़ियल्लाहु अन्हुम अज्मईन।

फायदा, यह उन हज़रात के कमाले इल्म की बात है, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मौजूदगी में यह लोग अहले फतवा शुमार किये जाते थे।

हदीस नम्बर 2, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का मज्मूए को जला देना

[3D]हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, फर्माती हैं कि मेरे बाप हज़रत, अबू बक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने पांच सौ अहादीस का एक ज़खीरा जमा किया था। एक रात मैंने देखा कि वह निहायत बेचैन हैं, करवटें बदल रहे हैं। मुझे यह हालत देखकर बे-चैनी हुई। दर्याफ़्त किया कि कोई तकलीफ़ है या कोई फिक्र की बात सुनने में आई है। ग़रज़ तमाम रात इसी बेचैनी में गुज़री,और सुबह को फर्माया कि वह अहादीस, जो मैंने तेरे पास रखवा रखी हैं, उठा ला, मैं लेकर आयी। आपने उनको जला दिया। मैंने पूछा कि क्यों जला दिया ? इर्शाद फर्माया कि मुझे अंदेशा हुआ कहीं ऐसा न हो, कि मैं मर जाऊँ और यह मेरे पास हों, इनमें दूसरों की सुनी हुई रिवायतें भी हैं, कि मैंने मोतबर (एतबार के क़ाबिल) समझा हो,और वह वाक़िआ में मोतबर न हों, और उसकी रिवायत में कोई गड़-बड़ हो, जिसका वबाल मुझ पर हो।

फायदा, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु का यह तो इल्मी कमाल और शग़्फ़ था,  कि उन्होंने पांच सौ अहादीस का एक रिसाला जमा किया, और इसके बाद उसको जला देना यह कमाले एहतियात था।

[3D]अकाबिर सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम का हदीस के बारे में एहतियात का यही हाल था। इसी वजह से अक्सर सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायतें बहुत कम नक़्ल की जाती हैं। हम लोगों को इस वाक़िए से सबक़ लेने की ज़रूरत है, जो मिम्बरों पर बैठकर बे-धड़क अहादीस नक़ल कर देते हैं। हालांकि हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु हर वक़्त के हाज़िर बाश, सफ़र-हज़र के साथी, हिजरत के रफ़ीक थे।

सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हम में बड़े आलिम हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, थे। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माते हैं, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के विसाल के बाद जब बैअत का क़िस्सा पेश आया,और हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने तक़रीर फर्मायी तो, कोई आयत और कोई हदीस ऐसी नहीं छोड़ी जिसमें,अंसार की फज़ीलत आयी हो,और हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अपनी तक़रीर में ना फर्मा दी हो। इससे अन्दाज़ा होता है कि क़ुरआन पाक पर कितना उबूर (महारत हासिल ) थी , और अहादीस किस क़दर याद थीं, मगर फिर भी बहुत कम रिवायतें हदीस की आप से मन्कूल हैं। यही राज़ है कि हज़रत इमामे आज़म रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से भी हदीस की बहुत कम रिवायतें नक़्ल की गई हैं।

हदीस नम्बर 3, तब्लीग़ हज़रत मुसअब बिन उमैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,

मुसअब बिन उमैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिनका एक क़िस्सा सातवें बाब में नम्बर 5 पर भी गुज़र चुका है, उनको हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मदीना मुनव्वरा की उस जमाअत के साथ, जो सबसे पहले मिना की घाटी में मुसलमान हुई थी, तालीम और दीन के सिखाने के लिए भेज दिया था। यह मदीना तैयबा में हर वक़्त तालीम और तब्लीग़ में मश्गूल रहते, लोगों को क़ुरआन शरीफ़ पढ़ाते, और दीन की बातें सिखलाते थे। अस्अद बिन ज़ुरारा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास इनका क़याम था,और मुकरई (पढ़ाने वाला, मुदर्रिस) के नाम से मशहूर हो गये थे।

साअद बिन मुआज़ और उसैद बिन हुज़ैर यह दोनों सरदारों में थे, उनको यह बात ना-गवार हुई। साअद ने उसैद से कहा कि तुम, अस्अद के पास जाओ और उनसे कहो कि हमने यह सुना है, कि तुम किसी परदेसी को अपने साथ ले आये हो, जो हमारे ज़ईफ़ लोगों को बेवक़ूफ़ बनाता है, बहकाता है। वह अस्अद के पास गये, और उनसे सख़्ती से यह गुफ़्तगू की। अस्अद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा, तुम इनकी बात सुन लो, अगर पसन्द आये तो कुबूल कर लो, अगर सुनने के बाद ना-पसन्द हो तो, रोकने का मुज़ाइक़ा नहीं। उसैद ने कहा कि यह इंसाफ़ की बात है। सुनने लगे। हज़रत मुसअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इस्लाम की खूबियाँ सुनायीं,और कलामुल्लाह शरीफ़ की आयतें तिलावत कीं।

हज़रत उसैद ने कहा, क्या ही अच्छी बातें हैं, और क्या ही बेहतर कलाम है। जब तुम अपने दीन में किसी को दाख़िल करते हो, तो किस तरह दाख़िल करते हो, उन्होंने कहा कि तुम नहाओ, पाक कपड़े पहनो, और कलमा शहादत पढ़ो। हज़रत उसैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उसी वक़्त सब काम किए और मुसलमान हो गये। इसके बाद यह साअद के पास गये, और उनको भी अपने हमराह लाये। उनसे भी यही गुफ़्तगू हुई। साअद बिन मुआज़ भी मुसलमान हो गए, और मुसलमान होते ही अपनी क़ौम बनूल अश्हल के पास गये। उनसे जाकर कहा कि मैं तुम लोगों की निगाह में कैसा आदमी हूं। उन्होंने कहा कि हम में सबसे अफ़ज़ल और बेहतर हो। इस पर साअद ने कहा कि मुझे, तुम्हारे मर्दों और औरतों से कलाम हराम है, जब तक तुम मुसलमान न हो जाओ, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, पर ईमान न लाओ।

उनके इस कहने से क़बीला अश्हल के सब मर्द-औरत मुसलमान हो गये, और हज़रत मुसअब उनको तालीम देने में मश्गूल हो गये।

[3D]फायदा, सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम का यह आम दस्तूर था, कि जो शख़्स भी मुसलमान हो जाता, वह मुस्तक़िल एक मुबल्लिग़ होता था, और जो बात इस्लाम की उसको आती थी, उसका फैलाना और दूसरों तक पहुँचाना, उसकी ज़िन्दगी का एक मुस्तक़िल काम था, जिसमें न खेती मानेअ (रुकावट) थी, न तिजारत, न पेशा, न मुलाज़मत।

दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें

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