Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B7/12

 सातवां बाब पेज नम्बर 128से132तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 12., हज़रत सईद बिन जुबैर और हज्जाज की गुफ्तगू

अफ़ज़लुल जिहादि कलिमतुहक्किन इन्द सुल्तानिन जाइर' (बेहतरीन जिहाद ज़ालिम बादशाह के सामने हक़ बात कहना है।) हज्जाज का ज़ुल्म व सितम दुनिया में मशहूर है, गो उस ज़माने के बादशाह, बावजूद ज़ुल्म व सितम के दीन की इशाअत का काम भी करते रहते थे, लेकिन फिर भी दीनदार और आदिल बादशाहों के लिहाज़ से, वह बद-तरीन शुमार होते थे, और इस वजह से लोग उनसे बेज़ार थे। सईद बिन जुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने भी इब्नुल अशअस के साथ मिलकर, हज्जाज का मुक़ाबला किया। हज्जाज अब्दुल मलिक बिन मर्वान की तरफ से हाकिम था, सईद बिन जबीर मशहूर ताबई हैं, और बड़े उलमा में से हैं, हुकूमत और बिल खुसूस हज्जाज को उनसे बुग्ज़ व अदावत (दुश्मनी) थी, और चूंकि मुक़ाबला किया था, इसलिए अदावत का होना भी ज़रूरी था। मुक़ाबले में हज्जाज उनको गिरफ्तार न कर सका।

वह शिकस्त के बाद छुपकर मक्का मुकर्रमा चले गये। हुकूमत ने अपने एक साक़ित, आदमी को मक्के का हाकिम बनाया, और पहले हाकिम को अपने पास बुला लिया। इस नये हाकिम ने जाकर खुत्बा पढ़ा, जिस के अख़ीर में अब्दुल मलिक बिन मर्वान बादशाह का, यह हुक्म भी सुनाया कि, जो शख़्स सईद बिन जबीर को ठिकाना दे, उसकी खैर नहीं। इसके बाद उस हाकिम ने खुद अपनी तरफ से भी, क़सम खायी कि जिस के घर में वह मिलेगा, उसको क़त्ल किया जायेगा, और उसके घर को नीज़ उसके पड़ोसियों के घर को ढाऊंगा, ग़रज़ बड़ी दिक़्क़त से मक्का के हाकिम ने, उनको गिरफ्तार करके हज्जाज के पास भेज दिया। उसको गुस्सा निकालने और उनको क़त्ल करने का मौका मिल गया। सामने बुलाया और पूछा-

हज्जाज- तेरा क्या नाम है ? सईद- मेरा नाम सईद है। हज्जाज- किसका बेटा है ? सईद- जबीर का बेटा हूं।

सईद का तर्जुमा नेक बख़्त है, और जुबैर का मतलब इस्लाह की हुई चीज़,- अगर्चे नामों में मानी अक्सर मक़्सूद नहीं होते, लेकिन हज्जाज को इनके नाम अच्छे मानी वाला होना पसन्द नहीं आया। इसलिए कहा, नहीं तू शक़ी बिन कुसैर है। शक़ी कहते हैं बद बख़्त को, और कुसैर टूटी हुई चीज़।

सईद- मेरी वालिदा मेरा नाम तुझ से बेहतर जानती थीं। हज्जाज- तू भी बद-बख़्त, तेरी मां भी बद- बख़्त। सईद- ग़ैब को जानने वाला तेरे अलावा और शख़्स है, (यानी अल्लामुल गुयूब)। हज्जाज- देख, मैं अब तुझे मौत के घाट उतारता हूं। सईद- तो मेरी मां ने मेरा नाम दुरुस्त रखा। हज्जाज- अब मैं तुझ को ज़िन्दगी के बदले, कैसा जहन्नम रसीद करता हूं। सईद- अगर मैं जानता कि, यह तेरे इख़्तियार में है, तो तुझको माबूद बना लेता। हज्जाज- हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की निस्बत तेरा क्या अक़ीदा है ? सईद- वह रहमत के नबी है, और अल्लाह के रसूल है , जो बेहतरीन नसीहत के साथ तमाम दुनिया की तरफ भेजे गये। हज्जाज- खुलफा की निस्बत तेरा क्या ख़्याल है ? सईद- मैं उनका मुहाफिज़ नहीं हूं, हर शख़्स अपने किए का ज़िम्मेदार है। हज्जाज- मैं उनको बुरा कहता हूं या अच्छा ? सईद- जिस चीज़ का मुझे इल्म नहीं, मैं उसमें क्या कह सकता हूं? मुझे अपना ही हाल मालूम है। 

हज्जाज- इनमें सबसे ज़्यादा पसंदीदा तेरे नज़दीक कौन है ? सईद- जो सबसे ज़्यादा मेरे मालिक को राज़ी करने वाला था। बाज़ कुतुब में बजाय इसके यह जवाब है, कि इनके हालात बाज़ को बाज़ पर तर्जीह देते हैं। हज्जाज- सबसे ज़्यादा राज़ी रखने वाला कौन था ? सईद- इसको वही जानता है जो दिल के भेदों, और छुपे हुए राज़ों से वाकिफ है। हज्जाज- हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जन्नत में हैं, या दोज़ख़ में ? सईद- अगर मैं जन्नत और जहन्नम में जाऊं, और वहां वालों को देख लूं तो बतला सकता हूं। हज्जाज- मैं क़यामत में कैसा आदमी हूंगा ? सईद- मैं इससे कम हूं,  कि ग़ैब पर मुत्तला किया जाऊं। हज्जाज- तू मुझ से सच बोलने का इरादा नहीं करता ? सईद- मैंने झूठ भी नहीं कहा। 

[3D] हज्जाज- तू कभी हंसता क्यों नहीं ? सईद- कोई बात हंसने की देखता नहीं, और वह शख़्स क्या हंसे जो मिट्टी से बना हो, और क़यामत में उसको जाना हो, और दुनिया के फ़ित्नों में दिन-रात रहता हो ? 

हज्जाज- मैं तो हंसता हूं। सईद- अल्लाह ने ऐसे ही मुख़्तलिफ तरीक़ों में हमको बनाया है। हज्जाज- मैं तुझे क़त्ल करने वाला हूं ? सईद- मेरी मौत का सबब, पैदा करने वाला अपने काम से फ़ारिग हो चुका। हज्जाज- मैं अल्लाह के नज़दीक तुझ से ज़्यादा महबूब हूं ? सईद- अल्लाह पर कोई भी जुरअत नहीं कर सकता, जब तक कि अपना मर्तबा मालूम न कर ले, और ग़ैब की अल्लाह ही को ख़बर है। हज्जाज- मैं क्यों नहीं जुरअत कर सकता ? हालांकि मैं जमाअत के बादशाह के साथ हूं और तू बाग़ियों की जमाअत के साथ है। सईद- मैं जमाअत से अलाहिदा नहीं हूं और फ़ित्ने को खुद ही पसन्द नहीं करता, और जो तक़दीर में है, उसको कोई टाल नहीं सकता। हज्जाज- हम जो कुछ अमीरुल मोमिनीन के लिए जमा करते हैं, उसको तू कैसा समझता है ? सईद- मैं नहीं जानता कि क्या जमा किया ? 

हज्जाज- ने सोना-चांदी कपड़े वगैरह, मंगा कर उन के सामने रख दिये। सईद- यह अच्छी चीजें हैं, अगर अपनी शर्त के मुवाफिक हों। हज्जाज- शर्त क्या है ? सईद- यह कि तू उनसे ऐसी चीजें ख़रीदे, जो बड़े घबराहट के दिन यानी क़यामत के दिन, अमन पैदा करने वाली हों, वरना हर दूध पिलाने वाली, दूध पीते को भूल जाएगी, और हमल गिर जायेंगे, और आदमी को अच्छी चीज़ के सिवा, कुछ भी काम न देगी। हज्जाज- हमने जो जमा किया, वह अच्छी चीज़ नहीं ? सईद- तूने जमा किया, तू ही उसकी अच्छाई को समझ सकता है। हज्जाज- क्या तू इसमें से कोई चीज़ अपने लिए पसन्द करता है ? सईद- मैं सिर्फ उस चीज़ को पसन्द करता हूं, जिसको अल्लाह पसन्द करे। हज्जाज- तेरे लिए हलाकत हो। सईद- हलाकत उस शख़्स के लिए है, जो जन्नत से हटाकर जहन्नम में दाखिल कर दिया जाए।

[3D]हज्जाज- (दिक होकर) बतला कि, मैं तुझे किस तरीके से क़त्ल करूं ? सईद- जिस तरह से क़त्ल होना अपने लिए पसन्द हो। हज्जाज- क्या तुझे माफ कर दूं ? सईद- माफी अल्लाह के यहां की माफी है। तेरा माफ करना कोई चीज़ भी नहीं।

हज्जाज ने जल्लाद को हुक्म दिया, कि इसको क़त्ल कर दो। सईद बाहर लाये गए और हंसे। हज्जाज को इसकी इत्तिला दी गई। फिर बुलाया और पूछा- हज्जाज- तू हंसा क्यों ? सईद- तेरी अल्लाह पर जुरअत और अल्लाह ताआला की तुझ पर हिल्म से। हज्जाज- मैं उसको क़त्ल करता हूं जिसने मुसलमानों की जमाअत में तफरीक़ (फर्क) की। फिर जल्लाद से खिताब करके कहा, मेरे सामने इसकी गर्दन उड़ाओ। सईद- मैं दो रकात नमाज़ पढ़ लूं। नमाज़ पढ़ी फिर क़िब्ला रुख होकर,- वज्जहतु वज्हिय लिल्लज़ी फ़ त रस्समावाति वल् अर्ज़ हनीफंव्व मा अना मिनल मुशिरकीन, पढ़ा, यानी मैंने अपना मुंह उस पाक ज़ात की तरफ किया, जिसने आसमान-ज़मीन बनाये, और मैं सब तरफ से हटकर, उधर मुतवज्जह हुआ और नहीं हूं मुशरिको से।

हज्जाज- इसका मुंह क़िब्ले से फेर दो, और नसारा के क़िब्ले की तरफ कर दो, कि इन्होंने भी अपने दीन में तफरीक़ (फर्क करना) की और इख़्तिलाफ पैदा किया। चुनांचे फौरन फेर दिया गया। सईद- 'फ़ ऐन, मा तुवल्लू फ़ सम्म वज्हुल्लाहि अल-काफी विसररराइर,तर्जुमा 'जिधर तुम मुंह फेरो, उधर भी खुदा है, जो भेदों का जानने वाला है।' हज्जाज- औंधा डाल दो। (यानी ज़मीन की तरफ मुंह कर दो) हम तो ज़ाहिर पर अमल करने के ज़िम्मेदार हैं। सईद- मिन्हा ख़लक़नाकुम व फीहा नुईदुकुम व मिन्हा नुख़्जिुकुम तारतन उख़रा,तर्जुमा हमने ज़मीन ही से तुमको पैदा किया और उसी में तुमको लौटायेंगे, और उसी से फिर दुबारा उठायेंगे। हज्जाज- इसको क़त्ल कर दो। सईद- मैं तुझे इस बात का गवाह बनाता हूं- अशहदु अल्लाइला ह इल्लल्लाहु वहदहू ला शरी क लहू व अशहदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसू लुहू, तो उसको महफूज़ रखना। जब मैं तुझ से क़यामत के दिन मिलूंगा, तो ले लूंगा। इसके बाद वह शहीद कर दिये गये,

इन्नालिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन, इनके इन्तिकाल के बाद बदन से खून बहुत ज़्यादा निकला, जिससे हज्जाज को भी हैरत हुई। अपने तबीब (हकीम, डॉक्टर) से इसकी वजह पूछी। उसने कहा कि उनका दिल निहायत, मुत्तमइन था, और क़त्ल का ज़रा भी ख़ौफ उनके दिल में नहीं था। इसलिए उनका खून अपनी असली मिक्दार पर क़ायम रहा, ब-ख़िलाफ और लोगों के कि ख़ौफ से उनका खून पहले ही खुश्क हो जाता है,

फायदा,- इस क़िस्से के सवाल-जवाब में कुतुब में कमी-ज़्यादती भी है, और भी बाज़ सवाल-जवाब नक़्ल किए गए। हमें तो नमूना ही दिखाना था, इसलिए इसी पर इक्तिफा किया गया। ताबिईन, के इस क़िस्म के क़िस्से बहुत ज़्यादा हैं। हज़रत इमामे आज़म रहमतुल्लाह अलईही,, इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलईही,, इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाह अलईही, वगैरह हज़रात इसी हक़ गोई की वजह से हमेशा मशक्कतें बर्दाश्त फर्माते रहे, लेकिन हक़ को हाथ से नहीं छोड़ा।

इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, सातवां बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें

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