सातवां बाब पेज नम्बर 120से124तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 7, हज़रत वहब बिन क़ाबूस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ओहद में शहादत
हज़रत वहब बिन क़ाबूस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी हैं, जो किसी वक़्त में मुसलमान हुए थे, और अपने घर किसी गांव में रहते थे, बकरियां चराते थे, अपने भतीजे के साथ एक रस्सी में बकरियां बांधे हुए, मदीना मुनव्वरा पहुंचे, पूछा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, कहां तशरीफ़ ले गये। मालूम हुआ कि ओहद की लड़ाई पर गये हुए हैं। बकरियों को वहीं छोड़कर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पास पहुंच गये। इतने में एक जमाअत कुफ़्फ़ार की हमला करती हुई आयी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया, जो उनको मुंतशिर कर दे, वह जन्नत में मेरा साथी है। हज़रत वहब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ज़ोर से तलवार चलानी शुरू की, और सबको हटा दिया। दूसरी मर्तबा फिर यही सूरत पेश आयी। तीसरी मर्तबा फिर ऐसा ही हुआ। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने उनको जन्नत की ख़ुशख़बरी दी। इसका सुनना था कि तलवार लेकर कुफ़्फ़ार के जमघटे में घुस गये,और शहीद हुए।
हज़रत साअद बिन अबी वक़्क़ास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने वहब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जैसी दिलेरी और बहादुरी, किसी की भी किसी लड़ाई में नहीं देखी, और शहीद होने के बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को मैंने देखा कि वहब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के सिरहाने खड़े थे, और इर्शाद फ़र्माते थे कि अल्लाह तुम से राज़ी हो, मैं तुम से राज़ी हूं। इसके बाद खुद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने अपने दस्त मुबारक से दफ़्न फ़र्माया, बावजूद यह कि उस लड़ाई में हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुद भी ज़ख़्मी थे।
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़र्माते थे कि मुझे किसी के अमल पर भी इतना रश्क नहीं आया, जितना वहब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के अमल पर आया। मेरा दिल चाहता है, कि अल्लाह के यहां उन जैसा आमालनामा लेकर पहुंचू।
फायदा,- उन पर रश्क उस ख़ास कारनामे की वजह से है-कि जान को जान नहीं समझा, वरना खुद हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और दूसरे हज़रात के दूसरे कारनामे इससे कहीं बड़े हुए हैं।
हदीस नम्बर 8, बिअरेमऊना की लड़ाई
बिअरे मऊना की लड़ाई एक मशहूर लड़ाई है, जिसमें सत्तर सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की एक जमाअत पूरी की पूरी शहीद हुई, जिनको क़ुर्रा (क़ुरआन पढ़ने वाले) कहते हैं, इसलिए कि सब हज़रात क़ुरआन मजीद के हाफ़िज़ थे और सिवाए चन्द मुहाजिरीन के अक्सर अंसार थे। हुज़ूरे सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को उनके साथ बड़ी मुहब्बत थी, क्योंकि यह हज़रात रात का अक्सर हिस्सा, ज़िक्र व तिलावत में गुज़ारते थे, और दिन को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की बीवियों के घरों की ज़रूरियात लकड़ी, पानी वगैरह पहुंचाना करते थे। इस मक़्बूल जमाअत को नज्द का रहने वाला, क़ौम बनी आमिर का एक शख़्स जिसका नाम आमिर बिन मालिक और कुन्नियत अबू बरा थी, अपने साथ अपनी पनाह में तब्लीग़ और वाज़ के नाम से ले गया था।
हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद भी फ़र्माया कि मुझे अंदेशा है, कि मेरे असहाब को मज़र्रत (नुक़सान) न पहुंचे, मगर उस शख़्स ने बहुत ज़्यादा इत्मीनान दिलाया। आपने इन सत्तर सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को हमराह कर दिया, और एक ख़तनामा आमिर बिन तुफ़ैल के नाम जो बनी आमिर का रईस था, तहरीर फ़र्माया, जिसमें इस्लाम की दावत थी। यह हज़रात मदीने से रुख़्सत होकर बिअरे मऊना पहुंचे, तो ठहर गये और दो साथी एक हज़रत उमर बिन उमैया रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, दूसरे हज़रत मुंज़िर बिन अम्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, सब के ऊंटों को लेकर चराने के लिए तशरीफ़ ले गये,
और हज़रत हराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अपने साथ दो हज़रात को साथियों में से लेकर, आमिर बिन तुफ़ैल के पास,हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का ख़तनामा देने के लिए तशरीफ़ ले गये। क़रीब पहुंच कर हज़रत हराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अपने दोनों साथियों से फ़र्माया कि तुम यहां ठहर जाओ, मैं आगे जाता हूं। अगर मेरे साथ कोई दग़ा न की गई, तो तुम भी चले आना, वरना यहीं से वापस हो जाना, कि तीन के मारे जाने से एक का मारा जाना बेहतर है।
आमिर बिन तुफ़ैल उस आमिर बिन मालिक का भतीजा था, जो इन सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को अपने साथ लाया था। उसको इस्लाम से और मुसलमानों से सख़्त अदावत थी। हज़रत हराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ख़तनामा दिया, तो उसने ग़ुस्से में पढ़ा भी नहीं, बल्कि हज़रत हराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के एक ऐसा नेज़ा मारा जो पार निकल गया। हज़रत हराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ‘फ़ुज़्तु व रब्बिल कअबति’ (रब्बे काबा की क़सम, मैं तो कामयाब हो गया) कहकर जा-ब-हक़ हुए।(इन्तिकाल फरमा गये)
उसने न इसकी परवाह की कि क़ासिद को मारना किसी क़ौम के नज़दीक भी जायज़ नहीं, और न इसका लिहाज़ किया कि मेरा चचा इन हज़रात को अपनी पनाह में लाया है। उनको शहीद करने के बाद, उसने अपनी क़ौम को जमा किया, और इस पर आमादा किया कि इन मुसलमानों में से एक को भी ज़िन्दा न छोड़ो, लेकिन इन लोगों ने अबू बरा की पनाह की वजह से तरद्दुद किया, तो उसने आस-पास के और लोगों को जमा किया, बहुत बड़ी जमाअत के साथ इन सत्तर सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का मुक़ाबला किया। यह हज़रात आख़िर कहाँ तक मुक़ाबला करते, और चारों तरफ़ से कुफ़्फ़ार में घिरे हुए थे। ब-जुज़ एक काब बिन ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के, जिन में कुछ ज़िन्दगी की रमक (यानि साँस चल रही थी ) बाक़ी थी और कुफ़्फ़ार उनको मुर्दा समझ कर छोड़ गये थे, बाक़ी सब शहीद हो गये।
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और मुंज़िर, जो ऊंट चराने गए हुए थे, उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा तो मुर्दारख़ोर जानवर उड़ रहे थे। दोनों हज़रात यह कहकर लौटे, कि ज़रूर कोई हादिसा पेश आया। यहां आ कर देखा तो अपने साथियों को शहीद पाया,और सवारों को ख़ून की भरी हुई तलवारें लिए हुए उनके गिर्द चक्कर लगाते देखा। यह हालत देख कर दोनों हज़रात ठिठके और बाहम मशवरा किया कि क्या करना चाहिए।
उमर बिन उमैया रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा कि चलो वापस चलकर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को इत्तिला दें। मगर हज़रत मुंज़िर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने जवाब दिया कि ख़बर तो हो ही जायेगी। मेरा तो दिल नहीं मानता कि शहादत को छोडूं, और इस जगह से चला जाऊं, जहां हमारे दोस्त पड़े सो रहे हैं। आगे बढ़ो और साथियों से जा मिलो। चुनांचे दोनों आगे बढ़े, और मैदान में कूद गए। हज़रत मुंज़िर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, शहीद हुए, और हज़रत उमर बिन उमैया रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, गिरफ़्तार हुए, मगर चूंकि आमिर की मां के ज़िम्मे किसी मन्नत के सिलसिले में एक ग़ुलाम का आज़ाद करना था, इसलिए आमिर ने उनको इस मन्नत में आज़ाद कर दिया।
इन हज़रात में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के ग़ुलाम हज़रत आमिर बिन फुहैरा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी थे। उनके क़ातिल जब्बार बिन सल्मा कहते हैं, कि मैंने जब उनके बरछा मारा, और वह शहीद हुए तो उन्होंने कहा, फ़ुज़्तु वल्लाहि (खुदा की क़सम, मैं कामयाब हुआ) इसके बाद मैंने देखा कि उनकी लाश आसमान को उड़ी चली गई। मैं बहुत मुत हय्यर (हैरान व ताज्जुब में) हुआ और मैंने बाद में लोगों से पूछा कि मैंने खुद बरछा मारा, वह मरे, लेकिन फिर भी वह कहते हैं, मैं कामयाब हो गया, तो वह कामयाबी क्या थी? लोगों ने बताया कि, वह कामयाबी जन्नत की थी, इस पर मैं मुसलमान हो गया।
फायदा,- यह ही हैं वह लोग, जिन पर इस्लाम को नाज़ और फ़ख़्र है। बेशक मौत उनके लिए शराब से ज़्यादा महबूब थी, और क्यों न होती, जब दुनिया में काम ही ऐसे किये थे, जिन पर अल्लाह के यहां की सुर्ख़-रूई,कामयाबी यक़ीनी थी, इसलिए जो मरता था, वह कामयाब होता था।
हदीस नम्बर 9, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का क़ौल कि खजूरें खाना तवील ज़िन्दगी है
ग़ज़्वा-ए-बद्र में हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक खेमे में तशरीफ फर्मा थे। आपने सहाबा से इर्शाद फर्माया कि उठो, और बढ़ो ऐसी जन्नत की तरफ जिसकी चौड़ाई, आसमान व ज़मीन से कहीं ज्यादा है,और मुत्तक़ियों के वास्ते बनायी गई है।
हज़रत उमैर बिन अलहम्माम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी हैं। वह भी सुन रहे थे, कहने लगे वाह वाह, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फर्माया, वाह वाह, किस बात पर कहा। अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह, मुझे यह तमन्ना है कि मैं भी उनमें से होता। आपने फर्माया तुम भी उनमें से हो। इसके बाद झोली में से कुछ खजूरें निकाल कर खाने लगे। इसके बाद कहने लगे, कि इन खजूरों के खत्म होने का इन्तज़ार, जो हाथ में हैं, बड़ी लम्बी ज़िन्दगी है, कहां तक इन्तज़ार करूंगा। यह कहकर उनको फेंक दिया, और तलवार लेकर मज्मअ में घुस गए और शहीद होने तक लड़ते रहे।
फायदा,- हकीकत में यही लोग जन्नत के कदर दान थे, और इस पर यक़ीन रखने वाले हम लोगों को भी, अगर यक़ीन नसीब हो जाये तो सारी बातें सहल हो जायें।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें