Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B7/10_11

सातवां बाब पेज नम्बर 124से128तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 10, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की हिजरत

हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का तो ज़िक्र ही क्या है, बच्चा-बच्चा उनकी बहादुरी से वाकिफ और शुजाअत का मोतरिफ (एतराफ (स्वीकार) करने वाला) है। इस्लाम के शुरू में जब मुसलमान सभी ज़ोफ की हालत में थे, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने खुद इस्लाम की कुव्वत के वास्ते, उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के मुसलमान होने की दुआ की, और दुआ कुबूल हुई। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माते हैं, कि हम लोग काबा के क़रीब, उस वक़्त तक नमाज़ नहीं पढ़ सकते थे, जब तक कि उमर मुसलमान नहीं हुए।

हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फर्माते हैं कि अव्वल-अव्वल हर शख़्स ने, हिजरत छुप कर की, मगर जब उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने हिजरत का इरादा किया, तो तलवार गले में डाली, कमान हाथ में ली,और बहुत से तीर साथ लिये, अव्वल मस्जिद में गये, तवाफ़ इत्मीनान से किया, फिर निहायत इत्मीनान से नमाज़ पढ़ी। इसके बाद कुफ़्फ़ार के मज्मों में गये, और फर्माया कि जिसका यह दिल चाहे कि उसकी मां उसको रोये, उसकी बीवी रांड हो, उसके बच्चे यतीम हों, वह मक्का से बाहर आकर मेरा मुक़ाबला करे। यह अलग-अलग जमाअतों को सुनाकर तशरीफ ले गये। किसी एक शख़्स की भी हिम्मत न पड़ी, कि पीछा करता।

हदीस नम्बर 11,ग़ज़्वा-ए-मौता का क़िस्सा

हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मुख्तलिफ बादशाहों के पास, तब्लीगी दावतनामे इर्साल (भेजे थे) फर्माए थे। इनमें एक खत हज़रत हारिस बिन उमैर बिन अज़दी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हाथ बसरा के बादशाह के पास भी भेजा था। जब यह मौता पहुंचा तो, शुरहबील गुस्सानी ने, जो कैसर के हुक्काम में से एक शख़्स था, उनको क़त्ल कर दिया। क़ासिदों का क़त्ल किसी के नज़दीक भी पसंदीदा नहीं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को यह बात बहुत गिरां हुई,और आपने तीन हज़ार का एक लश्कर तज्वीज़ फर्मा कर, हज़रत ज़ैद बिन हारिसा को उनपर अमीर मुक़र्रर फर्माया, और इर्शाद फर्माया कि अगर यह शहीद हो जायें तो, जाफ़र बिन अबी तालिब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अमीर बनाये जायें,यह भी शहीद हो जायें तो अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अमीर हों। यह भी शहीद हो जायें तो फिर मुसलमान जिसको दिल चाहे अमीर बना लें।

एक यहूदी इस गुफ़्तगू को सुन रहा था। उसने कहा, यह तीनों तो ज़रूर शहीद होंगे। पहले अंबिया के इस किस्म के कलाम का यही मतलब होता है। हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने एक सफेद झंडा बना कर हज़रत ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हवाले फर्माया और, खुद मय एक जमाअत के इन हज़रात को रुख़्सत फर्माने तशरीफ ले गये। शहर के बाहर जब पहुंचाने वाले वापस आने लगे, तो इन मुजाहिदीन के लिए दुआ की कि हक़ ताआला शानुहु तुमको सलामती के साथ, कामयाबी के साथ वापस लाये, और हर किस्म की बुराई से महफूज़ रखे।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इसके जवाब में तीन शेर पढ़े, जिनका मतलब यह था, कि मैं तो अपने रब से गुनाहों की मग़्फिरत चाहता हूं, और यह चाहता हूं कि एक ऐसी तलवार हो, जिससे मेरे खून के फव्वारे छूटने लगें, या ऐसा बरछा हो जो आंतों और कलेजे को चीरता हुआ निकल जाए,और जब लोग मेरी क़ब्र पर गुज़रें तो यह कहें कि, अल्लाह तुझ ग़ाज़ी को रशीद (हिदायत पाने वाला) और कामयाब करे, वाक़ई तू तो रशीद और कामयाब था।

इसके बाद यह हज़रात रवाना हो गये। शुरहबील को भी उन की रवानगी का इल्म हुआ। वह एक लाख फौज के साथ मुक़ाबले के लिए तैयार हुआ। यह हज़रात कुछ आगे चले तो मालूम हुआ, कि खुद हिरक़्ल, रूम का बादशाह भी एक लाख फौज साथ लिये हुए, मुक़ाबले के लिए आ रहा है। इन हज़रात को इस ख़बर से तरद्दुद हुआ, कि इतनी बड़ी जमाअत का मुक़ाबला किया जाये या हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को इत्तिला दी जावे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ललकार कर फर्माया, ऐ लोगो ! तुम किस बात से घबरा रहे हो ? तुम किस चीज़ के इरादे से निकले हो? तुम्हारा मक़्सूद शहीद हो जाना है। हम लोग कभी भी कुव्वत और आदमियों की कसरत के ज़ोर पर नहीं लड़े। हम सिर्फ उस दीन की वजह से लड़े हैं, जिसकी वजह से अल्लाह ने हमें इकराम नसीब फर्माया है, आगे बढ़ो, दो कामयाबियों में से एक तो ज़रूरी है- या शहादत या ग़ल्बा।

यह सुनकर मुसलमानों ने हिम्मत की, और आगे बढ़ गये, हत्ताकि मौता पर पहुंचकर लड़ाई शुरू हो गई। हज़रत ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने झंडा हाथ में लिया, और मैदान में पहुंचे, घमासान की लड़ाई शुरू हुई। शुरहबील का भाई भी मारा गया,और उसके साथी भाग गये। खुद शुरहबील भी भागकर एक किले में छुप गया, और हिरक़्ल के पास मदद के लिए आदमी भेजा। उसने तक़रीबन दो लाख फौज भेजी,और लड़ाई ज़ोर से होती रही। हज़रत ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, शहीद हुए, तो जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने हाथ में झंडा लिया, और अपने घोड़े के खुद ही पांव काट दिये, ताकि वापसी का ख़्याल भी दिल में न आए, और चन्द अशआर पढ़े, जिनका तर्जुमा यह है:-

ऐ लोगो ! क्या ही अच्छी है जन्नत और क्या ही अच्छा है, उसका क़रीब होना, कितनी बेहतरीन चीज़ है, और कितना ठंडा है इस का पानी, और मुल्क रूम के लोगों पर अज़ाब का वक़्त आ गया। मुझ पर भी लाज़िम है कि उनको मारूं। यह अशआर पढ़े और अपने घोड़े के पांव खुद ही काट चुके थे, कि वापसी का ख़्याल भी दिल में न आवे, और तलवार लेकर काफ़िरों के मजमे में घुस गये। अमीर होने की वजह से झंडा भी उन्हीं के पास था। अव्वल झंडा दाहिने हाथ में लिया। काफ़िरों ने दाहिना हाथ काट दिया, कि झंडा गिर जाए। उन्होंने फौरन बांये हाथ में लिया। उन्होंने वह भी काटा, तो उन्होंने दोनों बाज़ुओं से उसको थामा और मुंह से मज़बूत पकड़ लिया। एक शख़्स ने पीछे से उनके दो टुकड़े कर दिए, जिससे वह गिर पड़े। उस वक़्त उनकी उम्र तैंतीस साल की थी।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हमने बाद में लाशों में से हज़रत जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को जब उठाया तो उनके बदन के अगले हिस्से में नब्बे ज़ख्म थे। जब यह शहीद हो गये तो लोगों ने अब्दुल्लाह बिन रवाहा को आवाज़ दी। वह लश्कर के एक कोने में गोश्त का टुकड़ा खा रहे थे कि तीन दिन से कुछ चखने को भी न मिला था। यह आवाज़ सुनते ही गोश्त के टुकड़े को फेंक कर अपने आपको मलामत करते हुए कि जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, तो शहीद हो जायें, और तू दुनिया में मशगूल रहे। आगे बढ़े और झंडा लेकर क़िताल (लड़ाई) शुरू कर दिया, उंगली में ज़ख्म आया, वह लटक गई तो उन्होंने पांव से कटी हुई उस उंगली को दबाकर, हाथ खींचा, वह अलग हो गई, उसको फेंक दिया और आगे बढ़े।

इस घमासान और परेशानी की हालत में थोड़ा सा तरद्दुद भी पेश आया, कि न हिम्मत, न मुक़ाबले की ताक़त। लेकिन इस तरद्दुद को थोड़ी ही देर गुज़री थी, कि अपने दिल को मुख़ातिब बनाकर कहा, ओ दिल, किस चीज़ का अब इश्तियाक (शौक) बाक़ी है, जिसकी वजह से तरद्दुद है, क्या बीवी का है, तो उसको तीन तलाक़ या गुलामों का है तो वह सब आज़ाद, या बाग़ का है तो वह अल्लाह के रास्ते में सदक़ा।

इसके बाद चन्द शेर पढ़े, जिनका तर्जुमा यह है, 'क़सम है ओ दिल तुझे, उतरना होगा, खुशी से उतर या नागवारी से उतर। तुझे इत्मीनान की ज़िन्दगी गुज़ारते हुए एक ज़माना गुज़र चुका, सोच तो आख़िर तू एक क़तरा-ए-मनी है। देख काफ़िर लोग मुसलमानों पर गिरे हुए आ रहे हैं। तुझे क्या हुआ जन्नत को पसन्द नहीं करता, अगर तू क़त्ल न हुआ तो वैसे भी आख़िर मरेगा ही।' इसके बाद घोड़े से उतरे। उनके चचाज़ाद भाई गोश्त का एक टुकड़ा लाये, कि ज़रा सा खा लो, कमर सीधी कर लो। कई दिन से कुछ नहीं खाया। उन्होंने ले लिया। इतने में एक जानिब से हल्ले की आवाज़ आयी उसको फेंक दिया, और तलवार लेकर जमाअत में घुस गये और शहीद होने तक तलवार चलाते रहे।

फायदा,- सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की पूरी ज़िन्दगी का यही नमूना है, उनका हर-हर क़िस्सा दुनिया की बे-सबाती (मुस्तक़िल न रहना) और आख़िरत के शौक का सबक़ देता है। सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का तो पूछना ही क्या, ताबिईन पर भी यही रंग चढ़ा हुआ था। एक क़िस्से पर इस बाब को ख़त्म करता हूं, जो दूसरे रंग का है। दुश्मन से मुक़ाबले के नमूने तो आप देख ही चुके हैं, अब हुकूमत के सामने का मंज़र भी देख लीजिए। नबी करीम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है-

दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें

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हलाल कमाई इन्सान खाता है

और हराम कमाई इन्सान को खा जाती है

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