Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B6/7_9

 छठा बाब पेज नम्बर 105से108तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 7, बकरे की सिरी का चक्कर काट कर वापस आना

हज़रत इब्ने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फरमाते हैं कि एक सहाबी, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को किसी शख्स ने बकरे की सिरी हदिया के तौर पर दी। उन्होंने ख़्याल फरमाया कि मेरे फलां साथी ज़्यादा ज़रूरतमंद हैं, कुनबे वाले हैं। वह और उनके घर वाले ज़्यादा मुहताज हैं, इसलिए उनके पास भेज दी। उनको एक तीसरे साहब के मुताल्लिक यही ख़्याल पैदा हुआ, और उनके पास भेज दी। ग़रज़ इसी तरह सात घरों में फिरकर वह सिरी सबसे पहले सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के घर लौट आयी।

फायदा, इस किस्से से इन हज़रात का आम तौर से मुहताज और ज़रूरतमंद होना भी मालूम होता है, और यह भी कि हर शख़्स को दूसरे की ज़रूरत अपने से मुक़द्दम मालूम होती थी।

हदीस नम्बर 8, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का अपनी बीवी को जचगी में ले जाना

अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अपने ख़िलाफ़त के ज़माने में बसा औकात रात को चौकीदारी के तौर पर, शहर की हिफ़ाज़त भी करते थे। एक मर्तबा इसी हालत में एक मैदान में गुज़र हुआ, देखा कि एक खेमा बालों का बना हुआ लगा हुआ है, जो पहले वहां नहीं देखा था। उसके क़रीब पहुंचे तो देखा, कि एक साहब वहां बैठे हैं, और खेमे से कुछ कराहने की आवाज़ आ रही है। सलाम करके उन साहब के पास बैठ गये, और दर्याफ्त किया कि तुम कौन हो? उन्होंने कहा, एक मुसाफ़िर हूं, जंगल का रहने वाला हूं। अमीरल मोमिनीन के सामने कुछ, अपनी ज़रूरत पेश करके मदद चाहने के वास्ते आया हूं। 

दर्याफ्त फरमाया कि यह खेमे में से कैसी आवाज़ आ रही है। इन साहब ने कहा, मियां जाओ, अपना काम करो। आपने इसरार फरमाया कि नहीं बता दो, कुछ तकलीफ़ की आवाज़ है। इन साहब ने कहा औरत की विलादत का वक़्त क़रीब है, दर्द ज़ेह (प्रसव-पीड़ा) हो रहा है। आपने दर्याफ्त फरमाया कि कोई दूसरी औरत भी पास है। उन्होंने कहा, कोई नहीं। आप वहां से उठे और मकान तशरीफ़ ले गये और अपनी बीवी उम्मे कुलसूम रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से फरमाया कि एक बड़े सवाब की चीज़ मुक़द्दर से तुम्हारे लिए आई है। उन्होंने पूछा, क्या है? आपने फरमाया, एक गांव की रहने वाली बेचारी तन्हा है, उसको दर्द ज़ेह हो रहा है। उन्होंने इर्शाद फरमाया कि हां, हां तुम्हारी सलाह हो, तो मैं तैयार हूं

और क्यों न तैयार होतीं कि यह भी आख़िर हज़रत सय्यदा फातिमा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, की ही साहबज़ादी थीं। हज़रत उमर ने फरमाया कि विलादत के वास्ते जिन चीज़ों की ज़रूरत पड़ती हो, तेल गुदड़, वगैरह, ले लो, और एक हांड़ी और कुछ घी और दाने वगैरह भी साथ ले लो। वह लेकर चलीं। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, खुद पीछे-पीछे हो लिये। वहां पहुंचकर हज़रत उम्मे कुलसूम रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, तो खेमे चली गयीं और आपने आग जलाकर उस हांड़ी में दाने उबाले, और घी डाला। इतने में विलादत से फ़राग़त हो गई। अन्दर से हज़रत उम्मे कुलसूम रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने आवाज़ देकर अर्ज़ किया, अमीरुल मोमिनीन! अपने दोस्त को लड़का पैदा होने की बशारत खुश खबरी दीजिए।

अमीरुल मोमिनीन का लफ़्ज़ जब उन साहब के कान में पड़ा तो, वह बड़े घबराये। आपने फरमाया घबराने की बात नहीं। वह हांड़ी खेमे के पास रख दी, कि उस औरत को भी कुछ खिला दें। हज़रत उम्मे कुलसूम रजि अल्लाहु ताआला अन्ह, ने उसको खिलाया। इसके बाद हांड़ी बाहर दे दी। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उस बद्दू से कहा कि लो तुम भी खाओ, रात भर तुम्हारे जागने में गुज़र गई। इसके बाद अहलिया को साथ लेकर घर तशरीफ़ ले आये, और उन साहब से फरमा दिया कि कल आना तुम्हारे लिए इंतिज़ाम कर दिया जायेगा।

फायदा, हमारे ज़माने का कोई बादशाह या रईस नहीं। कोई मामूली हैसियत का मालदार भी ऐसा है, जो गरीब की ज़रूरत में मुसाफ़िर की मदद के वास्ते, इस तरह बीवी को रात में जंगल में ले जाये और खुद अपने आप चूल्हा फूंक कर पकाए। मालदार को छोड़िए, कोई दीनदार भी ऐसा करता है? सोचना चाहिए कि हम जिनके नाम लेवा हैं, और उन जैसी बरकात की हर बात में उम्मीदें रखते हैं, कोई काम भी हम उन जैसा कर लेते हैं।

हदीस नम्बर 9, अबू तल्हा का बाग़ वक्फ करना

हज़रत अनस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फरमाते हैं कि अबू तल्हा अंसारी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मदीना मुनव्वरा में सबसे ज़्यादा, और सबसे बड़े बाग़ वाले थे। उनका एक बाग़ था, जिसका नाम बेरहा था। वह उनको बहुत ही ज़्यादा महबूब था। मस्जिदे नबवी के क़रीब था। पानी भी उसमें निहायत शीरीं (मीठा) और इफरात से था। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, भी अक्सर उस बाग़ में तशरीफ़ ले जाते, और उसका पानी नोश फरमाते। जब क़ुरआन शरीफ़ की आयते नाज़िल हुई, 'लन तनालुल बिर्र हत्ता तुन्फिकू मिम्मा तुहिब्बून' ,तर्जुमा, तुम नेकी के कामिल दर्जे को नहीं पहुंच सकते, जब तक ऐसी चीज़ों से ख़र्च न करोगे, जो तुमको पसन्द हैं।

अबूतल्हा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, कि मुझे अपना बाग़ बेरहा सबसे ज़्यादा महबूब है, और अल्लाह तआला का इर्शाद है कि, महबूब माल अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करो। इसलिए यह अल्लाह के रास्ते में देता हूं। आप जैसा मुनासिब समझें, उसके मुवाफिक उसको खर्च फरमा दें। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने बहुत ज़्यादा मसर्रत का इज़हार फरमाया, और फरमाया कि बहुत ही उम्दा माल है। मैं यह मुनासिब समझता हूं कि, उसको अपने अहले क़राबत (रिश्तेदारों), में तक़्सीम कर दो। अबू तल्हा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उसको अपने रिश्तेदारों में तक़्सीम फरमा दिया।

फायदा, हम भी अपना कोई महबूब तरीन माल, जायदाद, कोई एक-आध नाज़ सुनकर, क़ुरआन पाक की कोई आयत पढ़कर, या सुनकर इस तरह बे-धड़क खैरात कर देते हैं। अगर वक्फ वगैरह करने का ख़्याल भी आता है, तो ज़िन्दगी से मायूस हो जाने के बाद, वारिसों से खफा होकर उनको महरूम करने की नीयत से, और बस बहस इस सोच में लगा देते हैं, कि कोई सूरत ऐसी पैदा हो जाए कि मेरी ज़िन्दगी में तो मेरे ही काम आये, बाद में जो हो वह होता रहे, हां, नाम व नमूद की कोई चीज़ हो, ब्याह-शादी की तकरीब हो, तो सूदी कर्ज़ से भी इन्कार नहीं।

दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें 


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