छठा बाब पेज नम्बर 102से105तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर 4, हज़रत शैखैन का सदके में मुकाबला
[3D]हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फरमाते हैं, कि एक मर्तबा हुज़ूरे अकदस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सदका करने का हुक्म फरमाया। इत्तिफाकन (संयोग से) उस ज़माने में मेरे पास कुछ माल मौजूद था। मैंने कहा, आज मेरे पास इत्तिफाक से माल मौजूद है। अगर मैं अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु से कभी भी बढ़ सकता हूं, तो आज बढ़ जाऊंगा। यह सोचकर मैं खुशी-खुशी घर गया, और जो कुछ भी घर में रखा था, उसमें से आधा ले आया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फरमाया कि घर वालों के लिए क्या छोड़ा? मैंने अर्ज़ किया, कि छोड़ आया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फरमाया, आखिर क्या छोड़ा? मैंने अर्ज़ किया, आधा छोड़ आया,
[3D]और हज़रत अबूबक्र सिद्दीक रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जो कुछ रखा था, सब ले आये। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फरमाया, अबूबक्र, घर वालों के लिये क्या छोड़ा? उन्होंने फरमाया, उनके लिए अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को छोड़ आया, यानी अल्लाह और उसके रसूल पाक सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के नाम की बरकत और उनकी रज़ा और खुशनूदी को छोड़ आया। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, मैंने कहा हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से कभी नहीं बढ़ सकता।
फायदा, खूबियों और नेकियों में इसकी कोशिश करना, कि दूसरे से बढ़ जाऊं, यह मुस्त हसन और मन्दूब (पसंदीदा काम) है, कुरआन पाक में भी इसकी तर्गीब (शौक पैदा करना) आयी है। यह किस्सा गज़वा-ए-तबूक का है। उस वक़्त में हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने चंदे की खास तौर से तर्गीब फरमायी थी, और सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने अपने-अपने हौसले के मुवाफिक बल्कि हिम्मत व वुसअत से ज़्यादा इआनतें फरमायीं, जिनका ज़िक्र बाब 2 के किस्सा 9 में भी मुख़्तसर तौर पर गुजरा है
हदीस नम्बर 5. सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का दूसरों की वजह से प्यासे मरना
हज़रत अबू जहम बिन हुज़ैफा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि यर्मूक की लड़ाई में मैं अपने चचाज़ाद, भाई की तलाश में निकला कि, यह लड़ाई में शरीक थे, और एक मशकीज़ा पानी का मैंने अपने साथ लिया कि मुमकिन है, वह प्यासे हों तो पानी पिलाऊं। इत्तिफाक से यह एक जगह इस हालत में पड़े हुए मिले, कि दम तोड़ रहे थे और जांकनी शुरू थी।
[3D]मैंने पूछा पानी का घूंट दूं। उन्होंने इशारे से कहा हां कि इतने में दूसरे साहब ने जो करीब ही पड़े थे, और वह भी मरने के करीब थे, आह की। मेरे चचाज़ाद भाई ने आवाज़ सुनी तो मुझे उनके पास जाने का इशारा किया। मैं उनके पास पानी लेकर गया। वह हिशाम बिन अबिल आस थे। उनके पास पहुंचा ही था कि उनके पास एक तीसरे साहब उसी हाल में पड़े दम तोड़ रहे थे। उन्होंने आह की। हिशाम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने मुझे उनके पास जाने का इशारा कर दिया। मैं उनके पास पानी लेकर पहुंचा, तो उनका दम निकल चुका था। हिशाम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास वापस आया तो वह भी जां-ब-हक हो चुके थे। उनके पास से अपने भाई के पास लौटा तो इतने में वह भी ख़त्म हो चुके थे। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
फायदा, इस नौज के मुता अद्दद वाकिआत कुतुबि हदीस में ज़िक्र किये गये हैं। क्या इंतिहा है इस ईसार की, कि अपना भाई आख़िरी दम तोड़ रहा हो, और प्यासा हो ऐसी हालत में किसी दूसरे की तरफ तवज्जोह करना भी मुश्किल हो जाता है, च-जाय-कि उसको प्यासा छोड़कर दूसरे को पानी पिलाने चला जाय। और इन मरने वालों की रूहों को अल्लाह जल्ला शानुहू अपने लुत्फ़ व फ़ज़्ल से नवाज़े कि मरने के वक़्त भी, जब होश व हवास सब ही जवाब दे देते हैं, यह लोग हमदर्दी में जान देते हैं।
हदीस नम्बर 6, हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का कफ़न
हुज़ूरे अकदस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के चचा हज़रत हमज़ा गुज़वा-ए-ओहद में शहीद हो गये, और बे-दर्द काफ़िरों ने आपके कान-नाक वगैरह आज़ा काट दिये, और सीना चीर कर दिल निकाला, और तरह-तरह के जुल्म किये। लड़ाई के ख़त्म पर हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, और दूसरे सहाबा शहीदों की लाशें तलाश फरमाकर, उनकी तजहीज़ व तक्फीन (कफ़न-दफ़न) का इंतिज़ाम फरमा रहे थे, कि हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को इस हालत में देखा, निहायत सदमा हुआ और एक चादर से उनको ढांक दिया।
इतने में हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की हक़ीक़ी बहन हज़रत सफ़िया रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, तशरीफ़ लायीं कि अपने भाई की हालत को देखें। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इस ख़्याल से कि आख़िर औरत हैं, ऐसे ज़ुल्मों को देखने का तहममुल (बर्दाश्त ) मुश्किल होगा। उनके साहब ज़ादा हज़रत ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से इर्शाद फरमाया, कि अपनी वालिदा को देखने से मना करो। उन्होंने वालिदा से अर्ज़ किया कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने देखने को मना फरमा दिया। उन्होंने कहा कि मैंने यह सुना है, कि मेरे भाई के कान-नाक वगैरह काट दिए गए। अल्लाह के रास्ते में यह कौन-सी बड़ी बात है। हम इस पर राज़ी हैं। मैं अल्लाह से सवाब की उम्मीद रखती हूं और इन्शाअल्लाह सब्र करूंगी।
हज़रत ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने जाकर इस कलाम का ज़िक्र किया, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इस जवाब को सुनकर देखने की इजाज़त अता फ़रमा दी। आकर देखा, इन्नालिल्लाह पढ़ी, और उनके लिए इस्तिग़फ़ार और दुआ की। एक रिवायत में है कि गुज़वा-ए-ओहद , में जहां लाशें रखी थीं, एक औरत तेज़ी से आ रही थी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फरमाया, देखो औरत को रोको, हज़रत ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने पहचान लिया कि मेरी वालिदा हैं। मैं जल्दी से रोकने के लिए बढ़ा, मगर वह क़वी थीं, एक घूंसा मेरे मारा और कहा परे हट जा। मैंने कहा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मना फरमाया है, तो फ़ौरन खड़ी हो गईं, इसके बाद दो कपड़े निकाले, और फरमाया कि मैं अपने भाई के कफ़न के लिए लाई थी, कि मैं उनके इन्तिकाल की ख़बर सुन चुकी थी।
इन कपड़ों में उन्हें कफ़ना देना। हम लोग वह कपड़े लेकर हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को कफ़नाने लगे। कि बराबर में एक अंसरी शहीद पड़े हुए थे, जिनका नाम हज़रत सुहैल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु था। इनका भी कुफ्फार ने ऐसा ही हाल कर रखा था, जैसा कि हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का था। हमें इस बात से शर्म आई, कि हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को दो कपड़ों में कफ़न दिया जाए, और अंसरी के पास एक भी न हो। इसलिए हमने दोनों के लिए एक-एक कपड़ा तज्वीज़ कर दिया। मगर एक कपड़ा इनमें बड़ा था, दूसरा छोटा, तो हमने कुरआ डाला कि कुरआ में जो कपड़ा जिसके हिस्से में आ जाएगा, वह उनके कफ़न में लगाया जाए। कुआं में बड़ा कपड़ा हज़रत सुहैल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हिस्से में आया, और छोटा हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हिस्से में आया जो उनके कद से भी कम था।
कि अगर सर को ढांका जाता, तो पांव खुल जाते और पांव की तरफ किया जाता तो सर खुल जाता। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फरमाया कि सर को कपड़े से ढांक दो, और पांव पर पत्ते वगैरह डाल दो। इब्ने साद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की रिवायत में है कि, हज़रत सफ़िया रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, जब दो कपड़े लेकर हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की लाश पर पहुंची तो, उनके करीब ही एक अंसरी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उसी हाल में पड़े हुए थे, तो एक-एक कपड़े में दोनों को कफ़न दिया गया। हज़रत हमज़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का कपड़ा बड़ा था, यह रिवायत मुख़्तसर है और ख़मीस की रिवायत मुफस्सल है।
फायदा, यह दो जहान के बादशाह के चचा का कफ़न है, वह भी इस तरह कि एक औरत अपने भाई के लिए दो कपड़े देती है। उसमें यह गवारा नहीं कि दूसरा अंसारी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बे-कफ़न रहे, एक-एक कपड़ा बांट दिया जाता है, और फिर छोटा कपड़ा उस शख्स के हिस्से में आता है, जो कई वजह से तजीह का इस्ति हक़ाक़ (हकदार होना) भी रखता है। गरीब परवरी और मुसावात (बराबरी) के दावेदार, अगर अपने दावों में सच्चे हैं तो, इन पाक हस्तियों की इत्तिबाअ करें, जो कहकर नहीं, बल्कि करके दिखला गये। हम लोगों के लिए इनका पैरो कहना भी शर्म की बात है।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें