पाँचवां बाब,पेज नम्बर 98से99तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 10,हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की जन्नत में मइयत के लिए नमाज़ की मदद
हज़रत रबीआ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि मैं नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में रात गुज़ारता था, और तहज्जुद के वक़्त वुज़ू का पानी और दूसरी ज़रूरियात, मसलन मिस्वाक, मुसल्ला वग़ैरह रखता था। एक मर्तबा हुज़ूर अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मेरी ख़िदमात से ख़ुश होकर फ़र्माया, मांग क्या मांगता है। उन्होंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, जन्नत में आपकी रिफ़ाक़त (साथ,)। आप सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया और कुछ बस यही चीज़ मतलूब है,। आपने फ़र्माया, अच्छा मेरी मदद कीजियो सजदों की कसरत से।
[3D]फायदा,- इसमें तम्बीह है, इस अम्र पर कि सिर्फ़ दुआ पर भरोसा करके न बैठना चाहिए, बल्कि कुछ तलब और अमल की भी ज़रूरत है, और आमाल में सबसे अहम नमाज़ है, कि जितनी उसकी कसरत होगी, उतने ही सजदे ज़्यादा होंगे। जो लोग इस सहारे पर बैठे रहते हैं कि फ़लां पीर, फ़लां बुज़ुर्ग से दुआएं करायेंगे, सख्त ग़लती है। अल्लाह जल्ला शानुहू ने इस दुनिया को अस्बाब के साथ चलाया है। अगरचे बे अस्बाब हर चीज़ पर क़ुदरत और क़ुदरत के इज़हार के वास्ते कभी ऐसा भी कर देते हैं, लेकिन आम आदत यही है, कि दुनिया के कारोबार अस्बाब से लगा रखे हैं। हैरत है कि हम लोग दुनिया के कामों में तो तक़दीर पर और सिर्फ़ दुआ पर भरोसा करके कभी नहीं बैठते। पचास तरह की कोशिश करते हैं, मगर दीन के कामों में तक़दीर और दुआ बीच में आ जाती है। इसमें शक नहीं कि अल्लाह वालों की दुआ निहायत अहम है, मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने यह भी इर्शाद फ़र्माया कि सजदों की कसरत से मेरी दुआ की मदद करना।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, पाँचवां बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें