पाँचवां बाब,पेज नम्बर 93से98तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर8, सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का नमाज़ के वक़्त फ़ौरन दुकानें बन्द करना
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक मर्तबा बाज़ार में तशरीफ़ रखते थे, कि जमाअत का वक़्त हो गया, देखा कि फ़ौरन सबने अपनी-अपनी दुकानें बन्द करके मस्जिद में दाख़िल हो गये। इब्ने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़र्माते हैं, कि इन्हीं लोगों की शान में यह आयत नाज़िल हुई-रिचालुल्ला तुल्हीहिम तिचारतुं ला बैउन अन ज़िक्रिल्लाह, (सूरः नूर, पारा 18) तर्जुमा पूरी आयत शरीफ़ा का यह है, कि इन मस्जिदों में ऐसे लोग सुबह और शाम अल्लाह की पाकी बयान करते हैं, जिनको अल्लाह की याद से,और बिलख़सूस नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने से, ना ख़रीदना ग़फ़लत में डालता है, ना बेचना। वह ऐसे दिन की पकड़ से डरते हैं, जिसमें बहुत से दिल, और बहुत सी आंखें उलट जायेंगी।
हज़रत इब्ने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़र्माते हैं, कि यह लोग तिजारत वग़ैरह अपने-अपने कारोबार में मशग़ूल होते थे,, लेकिन जब अज़ान की आवाज़ सुनते तो, सब कुछ छोड़कर फ़ौरन मस्जिद में चले जाते। एक जगह कहते हैं,, ख़ुदा की क़सम, वह लोग ताजिर थे,मगर इनकी तिजारत उनको अल्लाह के ज़िक्र से नहीं रोकती थी। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक मर्तबा बाज़ार में तशरीफ़ रखते थे, कि अज़ान हो, गयी। उन्होंने देखा कि लोग अपने-अपने सामान को छोड़कर नमाज़ की तरफ़ चल दिये। इब्ने मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़र्माया, यही लोग हैं,, जिनको अल्लाह जल्ला शानुहू ने "रिचालुल्ला तुल्हीहिम तिचारतुं ला बैउन अन ज़िक्रिल्लाह" से याद फ़र्माया।
एक हदीस में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि क़यामत के दिन, जब हक़ तआला शानुहू तमाम दुनिया को एक जगह जमा फ़र्मायेंगे, तो इर्शाद होगा, 'कहां हैं, वह लोग जो ख़ुशी और रंज दोनों हालतों में अल्लाह की हम्द करने वाले थे'। तो एक मुख़्तसर जमाअत उठेगी, और बग़ैर हिसाब-किताब के जन्नत में दाख़िल हो जायेगी। फिर इर्शाद होगा कहां हैं, वह लोग, जो रातें में अपनी ख़्वाब गाह से दूर रहते और अपने रब को ख़ौफ़, और रग़बत के साथ याद करते थे,। तो एक दूसरी मुख़्तसर जमाअत उठेगी, और वह भी जन्नत में बग़ैर हिसाब के दाख़िल हो जायेगी। फिर इर्शाद होगा, कहां हैं, वह लोग, जिनको तिजारत या बेचना, अल्लाह के ज़िक्र से नहीं रोकता था, तो एक तीसरी जमाअत मुख़्तसर-सी खड़ी होगी, और जन्नत में बग़ैर हिसाब दाख़िल होगी। इसके बाद बकिया लोगों का हिसाब शुरू हो, जाएगा।
हदीस नम्बर 9, हज़रत ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का क़त्ल के वक़्त नमाज़ पढ़ना और ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, व आसिम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का क़त्ल
ओहद की लड़ाई में जो दुश्मन मारे गये, थे, उनके अज़ीज़ों में इंतिक़ाम का जोश ज़ोर पर था। सुलाफ़ा ने जिसके दो बेटे इस लड़ाई में मारे गये, थे मन्नत मानी थी कि अगर आसिम का (जिन्होंने उसके बेटे का क़त्ल किया था), सर हाथ आ जाए, तो उसकी खोपड़ी में शराब पीऊंगी, इसलिए उसने ऐलान किया था कि जो आसिम का सर लायेगा, उसको सौ ऊंट इनाम दूंगी। सुफ़ियान बिन ख़ालिद को इस लालच ने आमादा किया, कि वह उनका सर लाने की कोशिश करे। चुनांचे उसने अज़्ल व क़ारा के चंद आदमियों को मदीना मुनव्वरा भेजा। उन लोगों ने अपने को मुसलमान ज़ाहिर किया, और हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से तालीम व तब्लीग़ के लिए अपने साथ चंद हज़रात को भेजने की दरख़्वास्त की और हज़रात आसिम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को भी साथ भेजने कि दरख़्वास्त की उनका बाज़ पसंदीदा बतलाया।
चुनांचे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दस आदमियों को और बाज़ रिवायात में छः आदमियों को उनके साथ कर दिया, जिनमें हज़रत आसिम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी थे,। रास्ते में जाकर उन जाने वालों ने बद-अहदी की और दुश्मनों को मुक़ाबले के लिए बुलाया, जो दो सौ आदमी थे, और उनमें से सौ बहुत मशहूर तीरंदाज़ थे, और बाज़ रिवायात में है, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इन हज़रात को मक्का वालों की ख़बर लाने के लिए भेजा था। रास्ते में बनू लहयान के दो सौ आदमियों से मुक़ाबला हुआ। वह मुख़्तसर जमाअत दस आदमियों की या छः आदमियों की, यह हालत देखकर एक पहाड़ी पर, जिसका नाम फ़दफ़द था, चढ़ गयी।
कुफ़्फ़ार ने कहा कि हम तुम्हारे ख़ून से अपनी ज़मीन रंगना नहीं चाहते, सिर्फ़ अहले मक्का से तुम्हारे बदले में कुछ माल लेना चाहते हैं,। तुम हमारे सांप आ जाओ हम तुम्हें क़त्ल न करेंगे। मगर उन्होंने कहा कि हम दुश्मन के अहद में आना नहीं चाहते, और तरकश से तीर निकाल कर मुक़ाबला किया। जब तीर ख़त्म हो, गये, तो नेज़ों से मुक़ाबला किया। हज़रत आसिम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने साथियों से जोश में कहा, कि तुम से धोका किया गया, मगर घबराने की बात नहीं ! शहादत को ग़नीमत समझो, तुम्हारा महबूब तुम्हारे साथ है, और जन्नत की हूरें तुम्हारी मुंतज़िर हैं,। यह कहकर जोश से मुक़ाबला किया और जब नेज़ा भी टूट गया तो तलवार से मुक़ाबला किया।
मुक़ाबिलों का मज्मा कसीर था, और आख़िर शहीद हो गए, और दुआ की कि या अल्लाह, अपने रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को हमारे किस्से की ख़बर कर दे। चुनांचे यह दुआ क़ुबूल हुई और उसी वक़्त इस वाक़िए का इल्म हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को हो गया, और चूंकि आसिम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, यह भी सुन चुके थे, कि सुलाफ़ा ने मेरे सर की खोपड़ी में शराब पीने की मन्नत की है,। इसलिए मरते वक़्त दुआ की कि या अल्लाह, मेरा सर तेरे रास्ते में काटा जा रहा है, तू ही इसका मुहाफ़िज़ है,। और वह दुआ भी क़ुबूल हुई, और शहादत के बाद जब दुश्मन ने सर काटने का इरादा किया, तो अल्लाह तआला ने शहद की मक्खियों का, और कुछ रिवायात में भिड़ों का एक गोल भेज दिया, जिन्होंने उनके बदन को चारों तरफ़ से घेर लिया। दुश्मन का ख़्याल था, कि रात के वक़्त जब यह उड़ जायेंगी तो सर काट लेंगे, मगर रात को एक बारिश की रो आई और उनकी लाश को बहाकर ले गयी।
इस तरह सात आदमी या तीन आदमी शहीद हो, गये,, ग़रज़ तीन बाक़ी रह गये-हज़रत ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और ज़ैद बिन दस्ना रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और अब्दुल्लाह बिन तारिक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,। इन तीनों हज़रात से फिर उन्होंने अहद-पैमान किया, कि तुम नीचे आ जाओ, हम तुम से बद-अहदी न करेंगे। यह तीनों हज़रात नीचे उतर आये और नीचे उतरने पर कुफ़्फ़ार ने उनकी कमानों की तांत उतार कर उन्होंने मश्के बांधी। हज़रत अब्दुल्लाह बिन तारिक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़र्माया कि यह पहली बद-अहदी है,, मैं तुम्हारे साथ हरगिज़ न जाऊंगा। इन शहीद होने वालों का इक़्तिदा ही मुझे पसंद है। उन्होंने ज़बरदस्ती उनको खींचना चाहा, मगर यह न चले, तो उन लोगों ने उनको भी शहीद कर दिया। सिर्फ़ दो हज़रात उनके साथ रहे, जिनको ले जाकर उन लोगों ने मक्का वालों के हाथ फ़रोख़्त कर दिया।
एक हज़रत ज़ैद बिन दस्ना रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिनको, सफ़वान बिन उमैया ने पचास ऊंट के बदले में ख़रीदा ताकि अपने बाप उमैया के बदले में क़त्ल करे। दूसरे हज़रत ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिन को हुजैर बिन अबी अह्हाब ने सौ ऊंट के बदले में ख़रीदा, ताकि अपने बाप के बदले में उनको क़त्ल करे। बुख़ारी शरीफ़ की रिवायत है, कि हारिस बिन आमिर की औलाद ने ख़रीदा कि उन्होंने बद्र में हारिस को क़त्ल किया था। सफ़वान ने तो अपने क़ैदी हज़रत ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को फ़ौरन ही हरम से बाहर अपने ग़ुलाम के साथ भेज दिया, कि क़त्ल कर दिये जायें। इसका तमाशा देखने के वास्ते और भी बहुत से लोग जमा हुए, जिनमें अबू सुफ़ियान भी था। उसने हज़रत ज़ैद से शहादत के वक़्त पूछा कि ऐ ज़ैद तुझको ख़ुदा की क़सम, सच कहना क्या तुझको यह पसंद है, कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की गर्दन तेरे बदले में मार दी जाये, और तुझको छोड़ दिया जाये, कि अपने अह्ल व अयाल में ख़ुश व ख़ुर्रम रहे। हज़रत ज़ैद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़र्माया कि ख़ुदा की क़सम, मुझे यह भी गवारा नहीं कि हुज़ूर अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, जहां हैं, वही उनके एक कांटा भी चुभे और हम अपने घर आराम से रहें।
यह जवाब सुनकर क़ुरैश हैरान रह गये। अबू सुफ़ियान ने कहा कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथियों को जितनी उनसे मुहब्बत देखी, उसकी नज़ीर कहीं नहीं देखी। इसके बाद हज़रत ज़ैद शहीद कर दिये गए। हज़रत ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक अर्से तक क़ैद में रहे,। हुजैर की बांदी, जो बाद में मुसलमान हो गई कहती है, कि जब ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हम लोगों की क़ैद में थे, तो हमने देखा कि ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हाथ में अंगूर का बहुत बड़ा गुच्छा आदमी के सर के बराबर हाथ में लिए हुए अंगूर खा रहे, थे, और मक्का में उस वक़्त अंगूर बिल्कुल नहीं था। वही कहती है, जब उनके क़त्ल का वक़्त क़रीब आया, तो उन्होंने सफ़ाई के लिए उस्तरा मांगा, वह दे दिया गया।
इत्तिफ़ाक़ से एक कम-सिन बच्चा उस वक़्त ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास चला गया। उन लोगों ने देखा कि उस्तरा उनके हाथ में है, और बच्चा उनके पास यह देखकर घबराये। ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़र्माया, क्या तुम यह समझते हो, कि में बच्चे को क़त्ल कर दूंगा, ऐसा नहीं कर सकता। इसके बाद उनको हरम से बाहर लाया गया, और सूली पर लटकाने के वक़्त आख़िरी ख़्वाहिश के तौर पर पूछा गया, कि कोई तमन्ना हो, तो बताओ। उन्होंने फ़र्माया कि मुझे इतनी मोहलत दी जाये कि दो रक्अत नमाज़ पढ़ लूं, कि दुनिया से जाने का वक़्त है, और अल्लाह जल्ला शानुहू की मुलाक़ात क़रीब है। चुनांचे मोहलत दे दी गयी।
उन्होंने दो रक्अत निहायत इत्मीनान से पढ़ीं, और फिर फ़र्माया कि अगर मुझे यह ख़्याल न होता कि तुम लोग यह समझोगे, कि मौत के डर की वजह से देर कर रहा हूं, तो दो रक्अत और पढ़ता। इसके बाद वह सूली पर लटका दिये गए, तो उन्होंने यह दुआ की या अल्लाह, कोई ऐसा शख़्स नहीं है, जो तेरे रसूल पाक सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, तक मेरा आख़िरी सलाम पहुंचा दे। चुनांचे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को ब ज़रिये, वही उसी वक़्त सलाम पहुंचाया गया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़र्माया, व अलैकुम अस्सलाम या ख़ूबैब,
और साथियों को इत्तिला फ़र्मायी कि ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को क़ुरैश ने क़त्ल कर दिया। हज़रत ख़ूबैब को जब सूली पर चढ़ाया गया, तो चालिस दुश्मन ने नेज़े लेकर चारों तरफ़ से उन पर हमला किया, और बदन को छलनी कर दिया। उस वक़्त किसी ने क़सम देकर यह भी पूछा कि तुम यह भी पसन्द करते हो, कि तुम्हारी जगह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को क़त्ल कर दें, और तुमको छोड़ दें। उन्होंने फ़र्माया वल्ला हिल अज़ीम (अल्लाह की क़सम, जो महान है,) मुझे यह भी पसन्द नहीं कि, मेरी जान के फ़िदय में एक कांटा भी हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के चुभे।
फायदा,- वैसे तो इन क़िस्सों का हर-हर लफ़्ज़ इब्रत (सबक, शिक्षा,) है,, लेकिन इस क़िस्से में दो चीजें ख़ास-तौर से क़ाबिले क़द्र, क़ाबिले इब्रत हैं। उन हज़रात की नबी करीम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ मुहब्बत व इश्क़ कि अपनी जान जाए. और उसके बदले में इतना लफ़्ज़ कहना भी गवारा नहीं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को किसी किस्म की तकलीफ़ मामूली सी भी पहुंच जाए, इसलिए कि हज़रत ख़ूबैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से सिर्फ़ ज़बान से ही कहलाना चाहते थे, और सिर्फ़ ज़बान ही से कहना था, वरना बदले में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को तकलीफ़ पहुंचाने पर तो उन कुफ़्फ़ार को भी क़ुदरत न थी, बल्कि वह लोग खुद ही हर वक़्त तकलीफ़ पहुंचाने की कोशिश में रहते थे, जिसमें बदला, बे-बदला सब बराबर था।
दूसरी चीज़ नमाज़ की अज़मत और उसका शग़फ़ (लगाव, चाव,) कि ऐसे आख़िरी वक़्त में आम तौर से बीवी बच्चों को आदमी याद करता है,, सूरत देखना चाहता है,, पयाम व सलाम कहता है,, मगर इन हज़रात को पयाम व सलाम देना है, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को और आख़िरी तमन्ना है, तो दो रक्अत नमाज़ की।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे