पाँचवां बाब,पेज नम्बर 88से93तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 5, एक मुहाजिर और एक अंसारी की चौकीदारी, और मुहाजिर का नमाज़ में तीर खाना
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक ग़ज़्वे से वापस तशरीफ़ ला रहे, थे,शब रात को एक जगह क़याम फ़र्माया और इर्शाद फ़र्माया कि आज शब (रात) को हिफ़ाज़त-चौकीदारी कौन करेगा। एक मुहाजिरी और एक अंसारी हज़रत अम्मार बिन यासिर, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और हज़रत उबाद बिन बिश्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया कि हम दोनों करेंगे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने एक पहाड़ी, जहां से दुश्मन के आने का रास्ता हो सकता था, बता दी कि इस पर दोनों क़याम करो। दोनों हज़रात वहां पर तशरीफ़ ले गए,। वहां जाकर अंसारी ने मुहाजिर से कहा कि, रात को दो हिस्सों पर तकसीम, करके एक हिस्से में आप सो रहे, मैं जागता रहूं। दूसरे हिस्से में आप जागें मैं सोता रहूं, कि दोनों के तमाम रात जागने में यह भी एहतिमाल है, कि किसी वक़्त नींद का ग़लबा हो, जाये और दोनों की आंख लग जाये।
अगर कोई ख़तरा जागने वाले का महसूस हो, तो अपने साथी को जगा ले। रात का पहला हिस्सा अंसारी के जागने का क़रार पाया और मुहाजिर सो गये,। अंसारी ने नमाज़ की नीयत बांध ली। दुश्मन की जानिब से एक शख़्स आया,और दूर से खड़े हुए शख़्स को देखकर तीर मारा,और जब कोई हरकत न हुई तो, दूसरा, और फिर इसी तरह तीसरा तीर मारा और हर तीर उनके बदन में घुसता रहा,और वह हाथ से उसको बदन से निकाल कर फेंकते रहे,। इसके बाद इत्मीनान से रुकूअ किया, सज्दा किया, नमाज़ पूरी करके अपने साथी को जगाया,
वह तो एक ही जगह दो को देखकर भाग गया, कि न मालूम कितने हों, मगर साथी ने जब उठकर देखा तो अंसारी के बदन से तीन जगह से ख़ून ही ख़ून बह रहा था। मुहाजिर ने फ़र्माया, सुब्हानल्लाह, तुमने मुझे शुरू ही में न जगा लिया। अंसारी ने फ़र्माया कि मैंने एक सूरः (सूरह कहफ़) शुरू कर रखी थी, मेरा दिल न चाहा कि उसको ख़त्म करने से पहले रुकूअ करूं। अब भी मुझे इसका अंदेशा हुआ कि ऐसा न हो,, मैं बार-बार तीर लगने से मर जाऊं, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने जो हिफ़ाज़त की ख़िदमत सुपुर्द कर रखी है, वह फ़ौत हो, जाये। अगर मुझे यह अंदेशा न होता, तो मैं मर जाता, मगर सूरः ख़त्म करने से पहले रुकूअ न करता।
[3D]फायदा,- यह थी उन हज़रात की नमाज़ और इसका शौक़ कि तीर पर तीर खाये जायें, और ख़ून ही ख़ून हो, जाये, मगर नमाज़ के लुत्फ़ में फ़र्क़ न पड़े। एक हमारी नमाज़ है, कि अगर मच्छर भी काट ले तो नमाज़ का ख़्याल जाता रहे,। भिड़ का तो पूछना ही क्या।
यहां एक फ़िक़्ही मसअला भी इख़्तिलाफ़ी है, कि ख़ून निकलने से हमारे इमाम यानी इमाम आज़म रहमतुल्लाह अलईही, के नज़दीक वुज़ू टूट जाता है,, इमाम शाफ़ई के नज़दीक नहीं टूटता। मुम्किन है, कि इन सहाबी का मज़हब भी यही हो, या उस वक़्त इस मसअले की तहक़ीक़ न हुई हो, कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, उस मजलिस में तशरीफ़ फ़र्मा न थे, या उस वक़्त तक यह हुक्म ही न हुआ हो,।
हदीस नम्बर 6, हज़रत अबू तल्हा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का नमाज़ में ख़्याल आ जाने से बाग़ वक़्फ़ करना
हज़रत अबूतल्हा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक मर्तबा अपने बाग़ में नमाज़ पढ़ रहे, थे,। एक परिंदा उड़ा और चूंकि बाग़ गंझान था, इसलिए उसको जल्दी से बाहर जाने का रास्ता न मिला। कभी इस तरफ़ कभी उस तरफ़ उड़ता रहा, और निकलने का रास्ता ढूंढता रहा। उनकी निगाह उस पर पड़ी, और इस मंज़र की वजह से उधर ख़्याल लग गया, और निगाह उस परिंदे के साथ फिरती रही। दफ़अतन (यकायक) नमाज़ का ख़्याल आया तो सहू हो गया कि कौन-सी रक्अत है। निहायत क़लक़ हुआ कि इस बाग़ की वजह से यह मुसीबत पेश आई, कि नमाज़ में भूल हुई फ़ौरन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में हाज़िर हुए, और पूरा क़िस्सा अर्ज़ करके दरख़्वास्त की कि इस बाग़ की वजह से यह मुसीबत पेश आई। इसलिए में इसको अल्लाह के रास्ते में देता हूं। आप जहाँ दिल चाहे, इसको सर्फ़, फ़र्मा दीजिए।
इसी तरह एक और क़िस्सा हज़रत उस्मान रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के ज़माना-ए-ख़िलाफ़त में पेश आया, कि एक अंसारी अपने बाग़ में नमाज़ पढ़ रहे, थे,। खजूरें पकने का ज़माना शबाब पर था, और सोशे (गुच्छे) खजूरों के बोझ और कसरत से झुके पड़े थे,। निगाह ख़जूरों पर पड़ी और ख़जूरों से भरे होने की वजह से बहुत ही अच्छे मालूम हुए। ख़्याल उधर लग गया, जिसकी वजह से यह भी याद न रहा कि कितनी रक्अतें पढ़ीं। इसके रंज और सदमे का ऐसा ग़लबा हुआ, कि इसकी वजह से यह ठान ली कि इस बाग़ को अब नहीं रखना, जिसकी वजह से यह मुसीबत पेश आई। चुनांचे हज़रत उस्मान रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ख़िदमत में हाज़िर हुए, और आकर अर्ज़ किया कि वह अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करना चाहता हूं, इसको जो चाहे कीजिए। उन्होंने उस बाग़ को पचास हज़ार में फ़रोख़्त करके,उसकी क़ीमत दीनी कामों में ख़र्च फ़र्मा दी।
फायदा,- यह ईमान की ग़ैरत है, कि नमाज़ जैसी अहम चीज़ में ख़्याल आ जाने से, पचास हज़ार दिरहम का बाग़ एक दम सदक़ा कर दिया। हमारे हज़रत शाह वलीउल्लाह साहब रहमतुल्लाह अलईही, ने 'क़ौले जमील' में सूफ़िया की निस्बत दो क़िस्में तहरीर फ़र्माते हुए, उसके मुताल्लिक़ तहरीर फ़र्माया है, कि यह निस्बत है,। अल्लाह की इताअत को मालिक पर मुक़द्दम रखना, और इस पर ग़ैरत करना कि इन हज़रात को इस पर ग़ैरत आई, कि अल्लाह की इताअत में किसी दूसरी चीज़ की तरफ़ तवज्जोह क्यों हुई ?
हदीस नम्बर 7, हज़रत इब्ने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का नमाज़ की वजह से आंख न बनवाना
[3D]हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की आँख में जब पानी उतर आया, तो आँख बनाने वाले हाज़िरे ख़िदमत हुए, और अर्ज़ किया कि इजाज़त हो, तो हम आँख बना दें, लेकिन पांच दिन तक आपको एहतियात करना पड़ेगी, कि सज्दा बजाय ज़मीन के किसी ऊंची लकड़ी पर करना होगा। उन्होंने फ़र्माया, यह हरगिज़ नहीं हो, सकता। वल्लाह एक रक्अत भी इस तरह पढ़ना मुझे मंज़ूर नहीं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद मुझे मालूम है, कि जो शख़्स एक नमाज़ भी जान कर छोड़ दे, वह हक़ तआला शानुहू से ऐसी तरह मिलेगा कि हक़ सुब्हानहू व तक़द्दुस उसपर नाराज़ होंगे।
फायदा,- अगरचे शरअन नमाज़ इस तरह से मजबूरी की हालत में पढ़ना जायज़ है, और यह सूरत नमाज़ छोड़ने की वईद (धमकी, डरावा) में दाख़िल नहीं होती, मगर हज़रात सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को नमाज़ के साथ जो शग़फ़ (लगाव, चाव) था और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के इर्शाद पर अमल की इस क़दर अहमियत थी, उसकी वजह से हज़रत इब्ने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने आँख बनवाने को भी पसन्द न किया, कि इन हज़रात के नज़दीक एक नमाज़ पर सारी दुनिया क़ुर्बान थी। आज हम बे-हयाई से जो चाहें, इन मर मिटने वालों की शान में मुंह से निकाल दें। जब कल उनका सामना होगा कि यह फ़िदाई मैदाने हश्र की, सैर के लुत्फ़ उड़ा रहे, होंगे, तब हक़ीक़त मालूम होगी, कि यह क्या था और हमने इनके साथ क्या बर्ताव किया।
दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे