Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B5/4

पाँचवां बाब,पेज नम्बर 88से90तक, फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, 

हदीस नम्बर4, हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ व हज़रत इब्ने ज़ुबैर हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, वग़ैरह की नमाज़ों के हालात

मुजाहिद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का हाल नक़्ल करते हैं, कि जब वह नमाज़ में खड़े होते थे, तो ऐसा मालूम होता था कि एक लकड़ी गड़ी हुई है, (तरीख़ुल खुलफ़ा)। यानी बिल्कुल हरक़त नहीं होती थी। उलमा ने लिखा है, कि हज़रत इब्ने ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु से नमाज़ सीखी, और उन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से यानी जिस तरह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, नमाज़ पढ़ते थे, उसी तरह हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, पढ़ते थे, और उसी तरह अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ।

साबित रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर की नमाज़ ऐसी होती थी कि गोया लकड़ी एक जगह गाढ़ दी। एक शख़्स कहते हैं, कि इब्ने ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जब सजदा,करते तो इस क़दर लम्बा और बे-हरकत होता था, कि चिड़ियां आकर कमर पर बैठ जातीं। बाज़ मर्तबा इतना लम्बा रुकू, करते कि तमाम रात सुबह तक रुकू ही में रहते। बाज़ औक़ात सजदा,इतना ही लम्बा होता कि पूरी रात गुज़र जाती। जब हज़रत इब्ने ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से लड़ाई हो, रही थी तो एक गोला मस्जिद की दीवार पर लगा, जिससे दीवार का एक टुकड़ा उड़ा और हज़रत इब्ने ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हला और दाढ़ी के दर्मियान को गुज़रा, मगर न उनको कोई इन्तिशार (बिखराव) हुआ, न रुकू, सजदा, मुख़्तसर किया।

[3D]एक मर्तबा नमाज़ पढ़ रहे, थे,। बेटा जिसका नाम हाशिम था, पास सो रहा था, छत में से एक सांप गिरा और बच्चे पर लिपट गया। वह चिल्लाया। घर वाले सब दौड़े हुए आये। शोर मच गया। उस सांप को मारा। इब्ने ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उसी इत्मीनान से नमाज़ पढ़ते रहे, सलाम फेर कर फ़र्माने लगे, कुछ शोर की-सी आवाज़ आयी थी, क्या था, बीवी ने कहा, अल्लाह तुम पर रहम करे, बच्चे की तो जान भी गई थी, तुम्हें पता ही न चला, फ़र्माने लगे तेरा नास हो,, अगर नमाज़ में दूसरी तरफ़ तवज्जोह करता तो नमाज़ कहां बाक़ी रहती।

[3D]हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के आख़िर ज़माने में, जब उनके ख़ंजर मारा गया, जिसकी वजह से उनका इंतिक़ाल हुआ, तो हर वक़्त ख़ून बहता था और अक्सर ग़फ़लत भी हो, जाती थी, लेकिन इस हालत में भी जब नमाज़ के लिए मुतनब्बेह किये जाते, तो उसी हालत में नमाज़ अदा फ़र्माते और इर्शाद फ़र्माते कि इस्लाम में उसका कोई हिस्सा नहीं, जो नमाज़ छोड़ दे।

हज़रत उस्मान रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, तमाम रात जागते और एक रक्अत में पूरा क़ुरआन शरीफ़ ख़त्म कर लेते, हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की आदते शरीफ़ा यह थी कि जब नमाज़ का वक़्त आ जाता, तो बदन में कंपकंपी आ जाती और चेहरा ज़र्द हो जाता। किसी ने पूछा कि यह क्या बात है, ? फ़र्माया कि उस अमानत का वक़्त है,, जिसको अल्लाह जल्ला शानुहू ने आसमानों और ज़मीन और पहाड़ों पर उतारा तो वह उसके तहम्मुल से आजिज़ हो गये, और मैंने उसका तहम्मुल किया है,।

[3D]ख़ल्क बिन अय्यूब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से किसी ने पूछा कि तुम्हें नमाज़ में मक्खियां दिक़ नहीं करतीं। फ़र्माया कि फ़ासिक़ लोग हुकूमत के कोड़े खाते हैं, और हरकत नहीं करते और इस पर फ़ख़्र करते हैं, और अपने सब्र व तहम्मुल पर अकड़ते हैं, कि इतने कोड़े मारे मैं हिला तक नहीं  मैं अपने रब के सामने खड़ा हूं, और एक मक्खी की वजह से हरकत कर जाऊं।

मुस्लिम बिन यसार रहमतुल्लाह अलईही, जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो अपने घर वालों से कहते कि तुम बातें करते रहो, मुझे तुम्हारी बात का पता ही नहीं चलेगा। एक मर्तबा बसरा की जामा मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे थे, कि मस्जिद का एक हिस्सा गिरा। लोग उसकी वजह से दौड़े, वहाँ जमा हुए, शोर व शग़ब हुआ मगर उनको पता ही न चला।

हातिम असम्म रहमतुल्लाह अलईही, से किसी ने उनकी नमाज़ की कैफ़ियत पूछी, तो कहने लगे कि जब नमाज़ का वक़्त आता है, तो वुज़ू के बाद उस जगह पहुंच कर जहां नमाज़ पढूं, थोड़ी देर बैठता हूं कि बदन के तमाम हिस्से में सुकून पैदा हो, जाये। फिर नमाज़ के लिए खड़ा होता हूं? इस तरह कि बैतुल्लाह को अपनी निगाह के सामने समझता हूं, और पुलसिरात को, पांव के नीचे, जन्नत को दायीं तरफ और जहन्नम को बायीं तरफ और मौत के फ़रिश्ते को अपने पीछे खड़ा हुआ ख़्याल करता हूं, और समझता हूं कि यह आख़िरी नमाज़ है,। इसके बाद पूरे खुशू (ख़ुदा के डर के साथ)-खुज़ूअ (आज़िज़ी) से नमाज़ पढ़ता हूं और इसके बाद उम्मीद और डर के दर्मियान रहता हूं, कि न मालूम क़ुबूल हुई या नहीं।

इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी,  इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार,  के हक़ में दुआ करे


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