Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B5/1_3

पाँचवां बाब,पेज नम्बर 85से88तक, फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,नमाज़ का शग़फ़ और शौक़ और उसमें खुशू, व खुज़ू

नमाज़ सारी इबादतों में सबसे ज़्यादा अहम चीज़ है, क़यामत में ईमान के बाद सबसे पहले नमाज़ ही का सवाल होता है,। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि कुफ्र और इस्लाम के दर्मियान में नमाज़ ही आड़ है, इसके अलावा और बहुत से इर्शादात इस बारे में वारिद हैं, जो मेरे एक दूसरे रिसाले (यानी फ़ज़ाइले नमाज़ में) में मज़कूर हैं,।

हदीस नम्बर1, अल्लाह तआला का इर्शाद नवाफ़िल वाले के हक़ में

हक़ तआला शानुहू इर्शाद फ़र्माते हैं, जो शख़्स मेरे किसी वली से दुश्मनी करता है, मेरी तरफ़ से उसको लड़ाई का एलान है, और कोई शख़्स मेरा कुर्ब उस चीज़ की बनिस्बत ज़्यादा नहीं हासिल करता, जो मैंने उस पर फ़र्ज़ की है, यानी सब से ज़्यादा कुर्ब और नज़दीकी मुझसे फ़राएज़ के अदा करने से हासिल होती है, और नवाफ़िल की वजह से बन्दा मुझसे क़रीब होता रहता है, 

[3D]यहां तक कि मैं उसको अपना महबूब बना लेता हूं, तो फिर मैं उसका कान बन जाता हूं, जिससे सुने, और उस की आंख बन जाता हूं, जिससे वह देखे और उसका हाथ बन जाता हूं, जिससे वह किसी चीज़ को पकड़े, और उसका पांव बन जाता हूं, जिससे वह चले। अगर वह मुझसे कुछ मांगता है, तो मैं उसको अता करता हूं और किसी चीज़ से पनाह चाहता है, तो पनाह देता हूं।

[3D]फायदा,- आंख-कान बन जाने का मतलब यह है, कि उसका देखना, सुनना, चलना, फिरना, सब मेरी ख़ुशी के ताबेअ बन जाता है, और कोई बात भी मेरी ख़िलाफ़े मर्जी नहीं होती। किस क़दर खुशनसीब हैं, वह लोग जिनको फ़रायज़ के बाद नवाफ़िल पर कसरत की तौफ़ीक़ हो, और यह दौलत नसीब हो, जाए। अल्लाह तआला शानुहू अपने फ़ज़्ल से मुझे और मेरे दोस्तों को भी नसीब फ़र्मायें।

हदीस नम्बर2, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का तमाम रात नमाज़ पढ़ना

एक शख़्स ने हज़रते आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से दर्याफ़्त किया कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की कोई अजीब बात, जो आपने देखी हो, वह सुना दें। हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने फ़र्माया कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की कौन सी बात अजीब न थी। हर बात अजीब ही थी। एक दिन रात को तशरीफ़ लाये और मेरे पास लेट गए, फिर फ़र्माने लगे, ले छोड़ मैं तो अपने रब की इबादत करूं। यह फ़र्मा कर नमाज़ के लिए खड़े हो, गए, और रोना शुरू किया, यहां तक कि आंसू सीना मुबारक तक बहने लगे। 

फिर रुकूअ फ़र्माया, उसमें भी इसी तरह रोते रहे, फिर सजदा किया। उसमें भी इसी तरह रोते रहे,। फिर सजदे से उठे। यहाँ तक कि हज़रत बिलाल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने आकर सुबह की नमाज़ के लिए आवाज़ दी। मैंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, आप इतना रोये, हांलाकि आप मासूम हैं, अगले पिछले सब गुनाहों की (अगर बिलफ़र्ज़ हो, भी तो) मग़्फ़िरत का वायदा अल्लाह तआला ने फ़र्मा रखा है,। आपने इर्शाद फ़र्माया कि फिर मैं शुक्रगुज़ार न बनूं। इसके बाद इर्शाद फ़र्माया कि मैं ऐसा क्यों न करता, हालांकि आज मुझ पर यह आयतें नाज़िल हुई-

इन्नफी ख़ल्किस्समावाति वल् अर्ज़ि,' (इक़ामतुल-हुज्जा) आले इमरान का आख़िरी रुकूअ (जमउल फ़वाइद)।

यह मुतअद्दिद रिवायात् में आया है, कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, रात को इस क़दर लंबी नमाज़ पढ़ा करते थे, कि खड़े-खड़े पांव पर वरम आ गया था। लोगों ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, आप इतनी मशक़्क़त उठाते हैं, हालांकि आप बख़्शे-बख़्शाये हैं,। आपने फ़र्माया कि मैं शुक्रगुज़ार बन्दा न बनूं ।

हदीस नम्बर3, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का चार रकात में छः पारे पढ़ना

हज़रत औफ़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं, कि मैं एक मर्तबा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के हमरिकाब (साथ) था। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मिस्वाक फ़र्मायी वुज़ू फ़र्माया और नमाज़ की नीयत बांध ली। मैं भी हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ नमाज़ में शरीक हो, गया। हुज़ूर ने सूरः बक़रः एक रक्अत में पढ़ी और जो आयत रहमत की आती, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, उस जगह देर तक रहमत की दुआ माँगते रहते, और जो आयत अज़ाब की आती उस जगह देर तक अज़ाब से पनाह मांगते रहते। सूरः के ख़त्म पर रुकूअ किया और उतना ही लम्बा रुकूअ किया, जितनी देर में सूरः बक़रः पढ़ी जाती और रुकूअ में,'सुब्हान ज़िल् जब रूति वल् मलकूति वल् अज़मति, पढ़ते जाते थे, फिर उतना ही लंबा सज्दा किया, फिर दूसरी रक्अत में इसी तरह सूरः आले इमरान पढ़ी और इसी तरह एक-एक रक्अत में एक-एक सूरः पढ़ते रहे,। इस तरह चार रक्अतों में सवा छः सिपारे होते हैं,। यह कितनी लम्बी नमाज़ हुई होगी। जिसमें हर आयते-रहमत और आयते अज़ाब पर देर तक दुआ का मांगना, और फिर उतना ही लंबा रुकूअ और सज्दा था।

हज़रत हुज़ैफ़ा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अपना एक क़िस्सा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ नमाज़ पढ़ने का इसी तरह से नक़्ल करते हैं, और फ़र्माते हैं, कि चार रक्अतों में चार सूरतें सूरः बक़रः से लेकर माइदः के ख़त्म तक पढ़ीं।

फायदा,- इन चार सूरतों के सवा छः सिपारे होते हैं, जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने चार रक्अतों में पढ़े और हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की आदतें शरीफ़ा तज्वीद व तर्तील (पूरी अदायगी के साथ पढ़ना) के साथ पढ़ने की थी, जैसा कि अक्सर अहादीस में है,। इसके साथ ही हर आयते रहमत और आयते अज़ाब पर ठहरना और दुआ मांगना, फिर उतना ही लंबा रुकूअ-सज्दा, इससे अन्दाज़ा हो, सकता है, कि इस तरह चार रक्अत में किस क़दर वक़्त ख़र्च हुआ होगा। बाज़ मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने एक रक्अत में सूरः बक़रः, आले इमरान, माइदः तीन सूरतें पढ़ीं, जो तक़रीबन पांच पारे होते हैं,। यह जब ही हो, सकता है, जब नमाज़ में चैन और आंखों की ठंडक नसीब हो, जाए। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का पाक इर्शाद है, कि मेरी आंखों की ठंडक नमाज़ में है,

इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी,  इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार,  के हक़ में दुआ करे

Previous Next

हलाल कमाई इन्सान खाता है

और हराम कमाई इन्सान को खा जाती है

Have A Nice Day Sir/Mam

Good Health Good Future For You and Me

نموذج الاتصال