चौथा बाब,पेज नम्बर 82से85तक, फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,
हदीस नम्बर8, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद, जिसका खाना हराम हो, लेना हराम
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद है, कि अल्लाह तआला शानुहू खुद पाक है, और पाक ही माल क़ुबूल फ़रमाते हैं,। मुसलमानों को उसी चीज़ का हुक्म दिया जिसका अपने रसूलों को हुक्म फ़रमाया, चुनांचे कलाम पाक में इर्शाद है, या ऐयुहर्रु सुलु कुलू मिनत्तय्यिबाति वअ् मलू सालिहन इन्नी बिमा तअ्मलून अलीम, तर्ज़ुमा, ऐ रसूलों ,पाक चीज़ों को खाओ, और नेक अमल करो। मैं तुम्हारे आमाल से बा-ख़बर हूं'। दूसरी जगह इर्शाद है, या अयुहल्लज़ी न आमनू कुलू मिनतय्यिबाति मा रज़क़नाकुम, तर्ज़ुमा, 'ए ईमान वालो हमारे दिए हुए पाक रिज़्क़ में से खाओ।
[3D]इसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने एक शख़्स का ज़िक्र फ़रमाया, कि लंबे-लंबे सफ़र करता (और मुसाफ़िर की दुआ क़ुबूल होती है,) और उसके साथ ही बिखरे हुए बालों वाला, गुबार आलूद (परेशानहाल,) कपड़ों वाला, (यानी परेशान हाल) दोनों हाथ आसमान की तरफ फैला कर कहता है,, ऐ अल्लाह, ऐ अल्लाह, ऐ अल्लाह, लेकिन खाना भी उसका हराम है,, पीना भी हराम है,, लिबास भी हराम है,, हमेशा हराम ही खाया तो उसकी दुआ कहां क़ुबूल हो सकती है।
फायदा, लोगों को हमेशा सोच रहता है, कि मुसलमानों की दुआएं क़ुबूल नहीं होतीं, लेकिन हालात का अन्दाज़ा इस हदीस शरीफ़ से किया जा सकता है,। अगरचे अल्लाह जल्ला शानुहू अपने फ़ज़्ल से कभी काफ़िर की भी दुआ क़ुबूल फ़रमा लेते हैं,, चैजाए कि फ़ासिक़ की लेकिन मुत्तक़ी की दुआ असल चीज़ है,। इसीलिए मुत्तक़ियों से दुआ की तमन्ना की जाती है,। जो लोग चाहते हैं, कि हमारी दुआएं क़ुबूल हों, उनको बहुत ज़रूरी है, कि हराम माल से एहतराज़ करें और ऐसा कौन है, जो यह चाहता है, कि मेरी दुआ मक़बूल न हो।
हदीस नम्बर9, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का अपनी बीवी को मुश्क तौलने से इन्कार
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ख़िदमत में एक मर्तबा बहरैन से मुश्क आया, इर्शाद फ़रमाया कि कोई इसको तौल कर मुसलमानों में तक़्सीम कर देता। आपकी अहलिया हज़रत आतिका रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, ने अर्ज़ किया, मैं तौल दूंगी। आपने सुनकर सुकूत फ़रमाया। थोड़ी देर में फिर यही इर्शाद फ़रमाया कि कोई इसको तौल देता ताकि मैं तक़्सीम कर देता। आप रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की अहलिया ने फिर यही अर्ज़ किया। आपने सुकूत फ़रमाया। तीसरी दफ़ा में इर्शाद फ़रमाया कि मुझे यह पसंद नहीं कि तू उसको अपने हाथ से तराज़ू के पलड़े में रखे, और फिर इन हाथों को अपने बदन पर फेर ले, और इतनी मिक़दार की ज़्यादती मुझे हासिल हो।
फायदा, यह कमाल एहतियात थी और अपने आपको महल्ल तोहमत (बदनामी,) से बचाना वरना जो भी तौलेगा, उसके हाथ को तो लगेगा ही। इसलिए इसके जवाज़ में कोई तरद्दुद न था, लेकिन फिर हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अपनी बीवी के लिए उसको गवारा न फ़रमाया।
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिनको उमर सानी भी कहा जाता है, इनके ज़माने में एक मर्तबा मुश्क तोला जा रहा था, तो उन्होंने अपनी नाक बन्द फ़रमा ली, और इर्शाद फ़रमाया कि मुश्क का नफ़ा तो खुश्बू ही सूंघना है,फायदा, यह है, एहतियात इन सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और ताबईंन रहमतुल्लाह अलईहीकी और हमारे बड़ों की पेशवाओं की।
हदीस नम्बर10, हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का हज्जाज के हाकिम को हाकिम न बनाना
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने एक शख़्स को किसी जगह का हाकिम बनाया, किसी शख़्स ने अर्ज़ किया कि यह साहब हज्जाज बिन यूसुफ़ के ज़माने में, उसकी तरफ़ से हाकिम रह चुके हैं,। उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उन हाकिम को माज़ूल (अलग,) कर दिया। उन्होंने अर्ज़ किया कि मैंने तो हज्जाज बिन यूसुफ़ के यहां थोड़े ही ज़माना काम किया। उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़रमाया कि बुरा होने के लिए इतना ही काफ़ी है, कि तू उसके साथ एक दिन या उससे भी कम रहा,
[3D]फायदा, मतलब यह है, कि पास रहने का असर ज़रूर पड़ता है,। जो शख़्स मुत्तक़ियों के पास रहता है,, उसके ऊपर ग़ैर-मामूली और ग़ैर महसूस तरीक़े से तक़्वा का असर पड़ता है, और जो फ़ासिक़ों के पास रहता है,, उसके ऊपर फ़िस्क़ का असर होता है,, इसी वजह से बुरी सोहबत से रोका जाता है,। आदमी तो दर किनार जानवरों तक के असरात पास रहने से आते हैं,।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि फ़ख़्र और बड़ाई, ऊंट, और घोड़े वालों में होती है, और मस्कनत (कमज़ोरी,) बकरी वालों में, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि सालेह आदमी के पास बैठने वालों की मिसाल उस शख़्स की सी है,, जो मुश्क वाले के पास बैठा है, कि अगर मुश्क न भी मिले तब भी उसकी ख़ुश्बू से दिमाग़ को फ़रहत होगी और,बुरे साथी की मिसाल आग की भट्टी वाले की सी है, कि अगर चिंगारी न भी पड़े तो धुआं तो कहीं गया ही नहीं।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, चौथा बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ कर