चौथा बाब,पेज नम्बर 76से79तक, फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के तक़्वा के बयान में
हज़रात सहाबा-ए-किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की हर आदत, हर ख़सलत इस क़ाबिल है कि, उसको चुना जाए और उसका इत्तिबाअ किया जाए,और क्यों न हो कि अल्लाह जल्ला शानुहू ने अपने लाडले, और महबूब रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मुसाहबत के लिए इस जमाअत को चुना और छांटा। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है, कि मैं बनी आदम के बेहतरीन क़र्न और ज़माने में भेजा गया। इसलिए हर एतबार से यह ज़माना ख़ैर का था,और ज़माने के बेहतरीन आदमी, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की सोहबत में रखे गए।
हदीस नम्बर1, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की एक जनाज़े से वापसी और एक औरत की दावत
हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक जनाज़े से वापस तशरीफ़ ला रहे थे, कि एक औरत का पयाम खाने की, दरख़्वास्त लेकर पहुंचा, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुद्दाम समेत तशरीफ़ ले गए, और खाना सामने रखा गया, तो लोगों ने देखा की हुज़ूरे, अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, लुक़्मा चबा रहे हैं, निगला नहीं जाता। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया, ऐसा मालूम होता है, कि इस बकरी का गोश्त मालिक की बग़ैर इजाज़त ले लिया गया। उस औरत ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, मैंने रेवड़ में बकरी ख़रीदने आदमी को भेजा था, वहां मिली नहीं पड़ोसी ने बकरी ख़रीदी थी, मैंने उसके पास क़ीमत से लेने को भेजा, वह तो मिले नहीं, उनकी बीवी ने बकरी भेज दी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया क़ैदियों को खिला दो ।
फायदा , हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की उलूवे शान (ऊंची शान) के मुक़ाबले में, एक मुशतबहा चीज़ का गले में अटक जाना, कोई ऐसी अहम बात नहीं कि हुज़ूर के अदना ग़ुलामों को भी इस किस्म के वाक़िआत पेश आ जाते हैं,।
हदीस नम्बर2, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का सदक़ा की खजूर के, ख़ौफ़ से तमाम रात जागना
एक मर्तबा नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तमाम रात जागते रहे, और करवटें बदलते रहे। अज़वाज मुतह हरात में से किसी ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह आज नींद नहीं आती। इर्शाद फ़रमाया कि एक खजूर पड़ी हुई थी, मैंने उठाकर खा ली थी कि ज़ाया न हो, अब मुझे यह फ़िक्र है, कि कहीं वह सदक़ा की न हो।
फायदा, अक़रब यही है, कि वह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की अपनी ही होगी, मगर चूंकि सदक़ा का माल भी हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के यहां आता था, इस शुब्हा की वजह से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को रात भर नींद न आई कि ख़ुदा-न-ख़्वास्ता वह सदक़ा की हो, और इस सूरत में सदक़ा का माल खाया गया हो, यह तो आक़ा का हाल है, कि महज़ शुब्हे पर रात भर करवटें बदलीं, और नींद नहीं आई। अब ग़ुलामों का हाल देखो, कि रिश्वत, सूद, चोरी, डाका हर किस्म का नाजायज़ माल किस सुर्ख़रूई से खाते हैं, और नाज़ से अपने को ग़ुलामाने मुहम्मद, सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, शुमार करते हैं,।
हदीस नम्बर3, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का एक काहिन के खाने से क़ै, करना
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का एक गुलाम था, जो ग़ल्ला (गुलाम पर कोई तादाद तै कर दी जाये कि, रोज़ाना या माहवार हमें दिया करो बाक़ी जो कमाओ वह तुम्हारा है, यह ग़ल्ला कहलाता है, यह जायज़ है, और इस तरह सहाबा के ज़माने में ग़ुलामों से मुक़र्रर कर लिया जाता था।) के तौर पर अपनी आमदनी में से हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ख़िदमत में पेश किया करता था। एक मर्तबा वह कुछ खाना लाया और हज़रत ने इसमें से एक लुक़्मा नोश फ़रमा लिया। ग़ुलाम ने अर्ज़ किया कि आप रोज़ाना दर्याफ़्त फ़रमाया करते थे, कि किस ज़रिए से कमाया, आज दर्याफ़्त नहीं फ़रमाया। आपने फ़रमाया कि भूख की शिद्दत की वजह से दर्याफ़्त करने की नौबत नहीं आई, अब बताओ। अर्ज़ किया कि मैं ज़माना-ए-जाहिलियत में एक क़ौम पर गुज़रा और उन पर मन्तर पढ़ा। उन्होंने मुझ से वायदा कर रखा था, आज मेरा गुज़र उधर को हुआ तो, उनके यहां शादी हो रही थी। उन्होंने यह मुझे दिया था।
[3D]हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़रमाया कि तू मुझे हलाक ही कर देता। इसके बाद हलक़ में हाथ डालकर क़ै, करने की कोशिश की मगर एक लुक़्मा वह भी भूख की शिद्दत की हालत में खाया गया, न निकला। किसी ने अर्ज़ किया पानी से क़ै हो सकती है,। एक बहुत बड़ा प्याला पानी मंगवाया, और पानी पी-पीकर क़ै, फ़रमाते रहे, यहां तक कि वह लुक़्मा निकाला। किसी ने अर्ज़ किया कि अल्लाह आप पर रहम फ़रमाएं। यह सारी मशक़्क़त उस एक लुक़्में की वजह से बर्दाश्त फ़रमाई। आपने इर्शाद फ़रमाया कि अगर मेरी जान के साथ भी, यह लुक़्मा निकलता, तो मैं निकालता। मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से सुना है, कि जो बदन माले हराम से परवरिश पाये, आग उसके लिए बेहतर है,। मुझे यह डर हुआ कि मेरे बदन का कोई हिस्सा इस लुक़्मे से परवरिश न पा जाये ।
फायदा, हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को इस किस्म के वाक़िआत, मुताअद्दद (कई) बार पेश आये कि, एहतियात मिज़ाज में ज़्यादा थी। थोड़ा सा भी शुब्हा हो जाता था तो क़ै, फ़रमाते थे।
बुख़ारी शरीफ़ में एक और क़िस्सा इसी किस्म का है, कि किसी ग़ुलाम ने ज़माना-ए-जाहिलियत में कोई कहानत यानी ग़ैब की बात नजूमियों के तौर पर किसी को बतलाई थी, वह इत्तिफ़ाक़ से सही हो गई। उन लोगों ने उस ग़ुलाम को कुछ दिया, जिसको उन्होंने अपनी मुक़र्ररा रक़म में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को लाकर दे दिया। हज़रत ने नोश फ़रमाया और फिर जो कुछ पेट में था, सब क़ै किया। इन वाक़िआत में ग़ुलामों का माल ज़रूरी नहीं कि नाजायज़ ही हो, दोनों एहतमाल हैं,, मगर हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की कमाले एहतियात ने इस मुश्तबहा माल को भी गवारा न किया।
हदीस नम्बर4, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की सदक़ा के दूध से क़ै
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने एक मर्तबा दूध नोश फ़रमाया कि उसका मज़ा कुछ अजीब सा, नया सा मालूम हुआ। जिन साहब ने पिलाया था, उन से दर्याफ़्त फ़रमाया कि यह दूध कैसा है,, कहां से आया है, उन्होंने अर्ज़ किया कि फ़लां जंगल में सदक़ा के ऊंट चर रहे थे, कि मैं वहां गया तो उन लोगों ने दूध निकाला, जिसमें से मुझे भी दिया। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने मुंह में हाथ डाला और सारे का सारा क़ै फ़रमा दिया
फायदा, इन हज़रात को इसका हमेशा फ़िक्र रहता था, कि मुश्तबहा माल भी बदन का जुज़ न बने, चे जाए कि बिल्कुल हराम जैसा कि हमारे इस ज़माने में शाया हो गया (आम रिवाज हो गया है,)।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे