तीसरा बाब,पेज नम्बर 75से76, तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर9, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से मुहब्बत करने वाले पर फ़क़्र की दौड़
एक सहाबी हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में हाज़िर हुए, और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह, मुझे आपसे मुहब्बत है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया, देख क्या कहता है। उन्होंने फिर यही अर्ज़ किया कि, मुझे आपसे मुहब्बत है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फिर यही इर्शाद फ़रमाया। जब तीन बार यह सवाल व जवाब हुआ तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया कि अच्छा, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो तो फ़क़्र के ओढ़ने-बिछाने के लिए तैयार हो जाओ, इसलिये कि मुझ से मुहब्बत रखने वालों की तरफ, फ़क़्र ऐसे ज़ोर से दौड़ता है जैसा कि पानी की रौ ढलान की तरफ दौड़ती है।
फायदा , यही वजह है कि हज़रात सहाबा किराम, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, तो अक्सर फ़क़्र व फ़ाक़े में रहे ही। अकाबिर मुहद्दिसीन, अकाबिर सूफ़िया, अकाबिर फ़ुक़हा भी तवंगरी में ज़्यादा नहीं रहे।
हदीस नम्बर10, सरीयतुल अम्बर में फ़क़्र की हालत
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने रजब सन् 8 हिजरी में, समुन्दर के किनारे एक लश्कर तीन सौ आदमियों का, जिन पर हज़रत अबू उबैदा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अमीर बनाये गए थे, भेजा। हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने एक थैली में खजूरों का तोशा भी उनको दिया। पन्द्रह रोज़ इन हज़रात का वहां क़याम रहा और तोशा ख़त्म हो गया।
हज़रत क़ैस ने जो इस क़ाफ़िले में थे, मदीना मुनव्वरा में क़ीमत अदा करने के वायदे पर, क़ाफ़िला वालों से ऊंट ख़रीद कर ज़िब्ह करना शुरू किए, और तीन ऊंट रोज़ाना ज़िब्ह करते, मगर तीसरे दिन अमीरे क़ाफ़िला ने, इस ख़्याल से कि सवारियां ख़त्म हो गयीं, तो वापसी भी मुश्किल हो जायेगी, ज़िब्ह की मुमानअत की, और सब लोगों के पास अपनी-अपनी जो कुछ खजूरें मौजूद थीं, जमा करके एक थैली में रख लीं,और एक-एक खजूर रोज़ाना तक़्सीम फ़रमा दिया करते, जिसको चूसकर यह हज़रात पानी पी लेते, और रात तक के लिए यही खाना था। कहने को मुख़्तसर सी बात है, मगर लड़ाई के मौक़े पर जबकि कुव्वत और ताक़त की भी ज़रूरत हो, एक खजूर पर दिन भर गुज़ार देना, दिल व जिगर की बात है।
चुनांचे हज़रत जाबिर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने जब यह क़िस्सा लोगों को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,के बाद सुनाया तो एक शागिर्द ने अर्ज़ किया कि हज़रत, एक खजूर क्या काम देती होगी ? आपने फ़रमाया, इसकी क़द्र जब मालूम हुई, जब वह भी न रही, कि बजुज़ फ़ाक़े के कुछ भी न था। दरख़्त के खुश्क पत्ते झाड़ते, और पानी में भिगोकर खा लेते। मजबूरी सब कुछ करा देती है, और हर तंगी के बाद अल्लाह तआला जल्ला शानुहू के यहां से सहूलियत होती है। हक़ तआला ने इन तकलीफ़ और मशक़्क़तों के बाद, समुन्दर में से एक मछली उन लोगों को पहुंचाई, जिसको अम्बर कहते हैं, इतनी बड़ी थी कि अठ्ठारह रोज़ तक यह हज़रात उसमें से खाते रहे, और मदीना मुनव्वरा पहुंचने तक उसका गोश्त तोशों में साथ था। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के सामने जब सफ़र का मुफ़स्सल क़िस्सा सुनाया गया, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फ़रमाया कि यह अल्लाह का एक रिज़्क़ था, जो तुम्हारी तरफ भेजा गया।
फायदा , मशक़्क़त और तकलीफ़ इस दुनिया में ज़रूरी है, और अल्लाह वालों को ख़ास तौर पर पेश आती है। इसी वजह से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है कि अम्बिया अलैहिमुस्सलात, वस्सलाम को सबसे ज़्यादा मशक़्क़त में रखा जाता है, फिर जो सबसे अफ़ज़ल हों। फिर उनके बाद जो बक़ीया में अफ़ज़ल हों। आदमी की आज़माइश उसकी दीनी हैसियत के मुवाफ़िक़ होती है, और हर मशक़्क़त के बाद अल्लाह की तरफ से उसके लुत्फ़ व फ़ज़्ल से सहूलत भी अता होती है। यह भी ग़ौर किया करें, कि हमारे बड़ों पर क्या-क्या गुज़र चुका, और यह सब दीन ही की ख़ातिर था। इस दीन के फैलाने में, जिसको आज हम अपने हाथों से खो रहे हैं, इन हज़रात ने फ़ाक़े किए, पत्ते चाबे और अपने खून बहाये, और इसको फैलाया, जिस को आज हम बाक़ी भी नहीं रख सकते।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, तीसरा बाब, मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ कर