तीसरा बाब,पेज नम्बर 72से74, तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर7, हज़रत अबू हुरैरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,का भूख में मस्अला दर्याफ़्त करना
हजरत अबू हुरैरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़रमाते हैं कि, तुम लोग उस वक़्त हमारी हालतें देखते कि हम में से बाज़ों को, कई-कई वक़्त तक इतना खाना नहीं मिलता था, जिससे कमर सीधी हो सके। मैं भूख की वजह से जिगर को ज़मीन से चिपटा देता, और कभी पेट के बल पड़ा रहता था,और कभी पेट पर पत्थर बांध लेता था। एक मर्तबा मैं रास्ते में बैठ गया, जहां को इन हज़रात का रास्ता था।
अव्वल हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, गुज़रे, मैंने उनसे कोई बात पूछना शुरू कर दी, ख़्याल था कि यह बात करते हुए, घर तक लेते जायेंगे और फिर आदते शरीफ़ा के मुवाफ़िक़, जो मौजूद होगा उसमें तवाज़ो (आव भगत) ही फ़रमायेंगे, मगर उन्होंने ऐसा न किया। ग़ालिबन ज़ेहन मुंतक़िल नहीं हुआ या, अपने घर का हाल मालूम होगा कि वहां भी कुछ नहीं। इसके बाद हज़रत उमर तशरीफ़ लाये, उनके साथ भी यही सूरत पेश आई, फिर नबी अक़रम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,तशरीफ़ लाये और मुझे देख कर मुस्कराये, और मेरी हालत और ग़रज़ समझ गए,
इर्शाद फ़रमाया अबू हुरैरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मेरे साथ आओ। मैं साथ हो लिया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, घर तशरीफ़ ले गए, मैं साथ अन्दर हाज़िरी की इजाज़त लेकर हाज़िर हुआ।
[3D]घर में एक प्याला दूध का रखा हुआ था, जो ख़िदमते अक़्दस में पेश किया गया। दर्याफ़्त फ़रमाया कि कहां से आया है, अर्ज़ किया कि फ़लां जगह से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,के लिए हदिए में आया है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फ़रमाया, अबू हुरैरह ! जाओ अहले सुफ़्फ़ा, को बुला लाओ। 'अहले सुफ़्फ़ा' इस्लाम के मेहमान शुमार होते थे। यह वह लोग थे जिनके न घर था न दर, न ठिकाना, न खाने का कोई मुस्तक़िल इन्तिज़ाम। इन हज़रात की मिक़दार कम व बेश होती रहती थी, मगर इस क़िस्से के वक़्त 70 थी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,का यह भी मामूल था, कि इनमें से दो-दो, चार-चार को खाते-पीते सहाबी का कभी-कभी मेहमान भी बना देते,और खुद अपना मामूल यह था कि कहीं से सदक़ा आता, तो उन लोगों के पास भेज देते और खुद इस में शिरकत न फ़रमाते और कहीं से हदिया आता तो,उनके साथ हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुद भी उसमें शिरकत फ़रमाते।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,ने बुलाने का हुक्म दिया, मुझे गरां (बोझ हुआ) तो हुआ कि इस दूध की मिक़दार ही क्या है, जिस पर सब को बुला लाऊं ? सब का क्या भला होगा ? एक आदमी को भी मुश्किल से काफ़ी होगा, और फिर बुलाने के बाद मुझ ही को पिलाने को हुक्म होगा, इसलिये नम्बर भी आख़िर में आयेगा, जिसमें बचेगा भी नहीं। लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,की इताअत बग़ैर चारा ही क्या था ? मैं गया और सबको बुला लाया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इर्शाद फ़रमाया कि ले, इनको पिला। मैं एक-एक शख़्स के प्याला हवाले करता,और वह खूब सेर होकर पीता और, प्याला मुझे वापिस देता। इसी तरह, सबको पिलाया और सब सैर हो गए तो, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,ने प्याला दस्ते मुबारक में लेकर मुझे देखा, और तबस्सुम फ़रमाया, फिर फ़रमाया कि बस, अब तो मैं और तू ही बाक़ी हैं। मैंने अर्ज़ किया कि बेशक, फ़रमाया कि ले पी। मैंने पिया। इर्शाद फ़रमाया और पी। मैंने और पिया। बिल आख़िर मैंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, अब मैं नहीं पी सकता। इसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सबका बचा हुआ खुद नोश फ़रमाया।
हदीस नम्बर8, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से दो शख़्सों के बारे में सवाल
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में कुछ लोग हाज़िर थे, कि एक शख़्स सामने से गुज़रा। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दर्याफ़्त फ़रमाया कि,तुम लोगों की उस शख़्स के बारे में क्या राय है ? अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, शरीफ़ लोगों में है, वल्लाह ! इस क़ाबिल है कि, अगर कहीं निकाह का पयाम दे दे तो, क़ुबूल किया जाये, किसी की सिफ़ारिश कर दे तो मानी जाये। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, सुनकर ख़ामोश हो गए, इसके बाद एक और साहब सामने से गुज़रे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,ने उनके मुताल्लिक़ भी सवाल किया। लोगों ने कहा, या रसूलल्लाह ! एक मुसलमान फ़क़ीर है, कहीं मंगनी करे तो ब्याहा न जाये, कहीं सिफ़ारिश करे तो क़बूल न हो, बात करे तो कोई मुतवज्जह न हो। आपने इर्शाद फ़रमाया कि इस पहले जैसों से अगर सारी दुनिया भर जाए तो इन सबसे यह शख़्स बेहतर है।
फायदा , मतलब यह है कि महज़ दुनियावी शराफ़त, अल्लाह के यहां कुछ भी वुकअत नहीं रखती। एक मुसलमान फ़क़ीर जिसकी दुनिया में कोई भी वुकअत न हो, उसकी बात कहीं भी नहीं सुनी जाती हो, अल्लाह के नज़दीक सैकड़ों उन शुरफ़ा से बेहतर है, जिनकी बात दुनिया में बड़ी वुकअत से देखी जाती हो, और हर शख़्स उनकी बात सुनने और मानने को तय्यार हो। लेकिन अल्लाह के यहां उसकी कोई वुकअत न हो। दुनिया का क़याम ही अल्लाह वालों की बरकत से है। कि यह तो हदीस में खुद मौजूद है, कि जिस दिन दुनिया में अल्लाह का नाम लेने वाला न रहेगा, क़यामत आ जायेगी, और दुनिया का वजूद भी ख़त्म हो जायेगा। अल्लाह के पाक नाम ही की यह बरकत है, कि यह दुनिया का सारा निज़ाम क़ायम है।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे