तीसरा बाब,पेज नम्बर 70से72,तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर6, हज़रत बिलाल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के लिए एक मुशरिक से क़र्ज़
हजरत बिलाल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से एक साहब ने पूछा कि, हुज़ूरे अक़्सद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इख़राजात (ख़र्चे) की क्या सूरत होती थी ? हज़रत बिलाल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने फ़रमाया कि, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पास कुछ जमा तो रहता ही नहीं था, यह ख़िदमत मेरे सुपुर्द थी, जिसकी सूरत यह थी, कि कोई मुसलमान भूखा आता, तो हुज़ूर अक़्सद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, मुझे इर्शाद फ़रमा देते। मैं कहीं से क़र्ज़ लेकर उसको खाना खिला देता। कोई नंगा आता, तो मुझे इर्शाद फ़रमा देते, मैं किसी से क़र्ज़ लेकर उसको कपड़ा बनवा देता। यह सूरत होती रहती थी। एक मुशरिक एक मर्तबा मुझे मिला। उसने मुझसे कहा कि मुझे वुसअत, और सरवत हासिल है, तू किसी से क़र्ज़ न लिया कर, जब ज़रूरत हुआ करे, तो मुझ से ही क़र्ज़ लिया कर, मैंने कहा, इससे बेहतर क्या होगा। उस से क़र्ज़ लेना शुरू कर दिया।
जब इर्शाद आली होता उस से क़र्ज़ ले आता, और इर्शाद वाला की तामील कर देता। एक बार वुज़ू कर के अज़ान कहने के लिए खड़ा ही था, कि वही मुशरिक एक जमाअत के साथ आया और कहने लगा, ओ हब्शी, मैं उधर मुतवज्जह हुआ तो, एकदम बेतहाशा गालियां देने लगा और बुरा-भला जो मुंह में आया, कहा और कहने लगा कि महीना ख़त्म होने में कितने दिन बाक़ी हैं। मैंने कहा, क़रीब ख़त्म के हैं। कहने लगा कि चार दिन बाक़ी है। अगर महीने के ख़त्म तक मेरा सब क़र्जा अदा न किया तो, तुझे अपने क़र्ज़े में ग़ुलाम बनाऊंगा और उसी तरह बकरियां चराता फिरेगा, जैसा पहले था। यह कह कर चला गया।
मुझ पर दिन भर जो गुज़रना चाहिए था, वही गुज़रा। तमाम दिन रन्ज व सदमा सवार रहा, और इशा की नमाज़ के बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में तन्हाई में हाज़िर हुआ,और सारा क़िस्सा सुनाया और अर्ज़ किया कि, या रसूलल्लाह, न आपके पास इस वक़्त अदा करने को फ़ौरी इन्तिज़ाम है, और न खड़े-खड़े मैं कोई इन्तिज़ाम कर सकता हूं। वह ज़लील करेगा, इसलिए अगर इजाज़त हो तो इतने क़र्ज़ उतरने का इन्तिज़ाम हो, मैं कहीं रूपोश हो जाऊं, जब आप के पास कहीं से कुछ आ जायेगा, मैं हाज़िर हो जाऊंगा। यह अर्ज़ करके मैं घर आया, तलवार ली, ढाल उठाई, जूता उठाया, यही सामाने सफ़र था,और सुबह होने का इन्तिज़ार करता रहा, कि सुबह के क़रीब कहीं चला जाऊंगा।
सुबह क़रीब ही थी कि एक साहब दौड़े हुए आये, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में जल्दी चलो। मैं हाज़िरे ख़िदमत हुआ तो देखा कि, चार ऊंटनियां, जिन पर सामान लदा हुआ था, बैठी हैं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,ने फ़रमाया, खुशी की बात सुनाऊं, कि अल्लाह तआला ने तेरे क़र्ज़े (उधार लिया हुआ) की बे बाक़ी का इन्तिज़ाम फ़रमा दिया। ये ऊंटनियां भी तेरे हवाले हैं, और इनका सब सामान भी, फ़िदक के रईस ने यह, नज़राना मुझे भेजा है। मैंने अल्लाह का शुक्र अदा किया, और खुशी-खुशी उनको लेकर गया और सारा क़र्जा अदा करके वापस आया।
हुज़ूरे अक़्सद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, इतने मस्जिद में इन्तिज़ार फ़रमाते रहे। मैंने वापस आकर अर्ज़ किया कि हुज़ूर, अल्लाह का शुक्र है कि,हक़ तआला ने सारे क़र्ज़े से आपको सुबुक दोश कर दिया, और (अब कोई चीज़ भी क़र्ज़ की बाक़ी नहीं रही)। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दर्याफ़्त फ़रमाया कि सामान में से भी कुछ बाक़ी है ? मैंने अर्ज़ किया, कि जी हां, कुछ बाक़ी है ? हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया कि उसे भी तक़्सीम ही कर दे, ताकि मुझे राहत हो जाये। मैं घर में भी उस वक़्त तक नहीं जाने का जब तक यह तक़्सीम न हो जाये। तमाम दिन गुज़र जाने के बाद, इशा की नमाज़ से फ़राग़त पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दर्याफ़्त फ़रमाया कि वह बचा हुआ माल तक़्सीम हो गया या नहीं ? मैंने अर्ज़ किया कि कुछ मौजूद है। ज़रूरत मन्द आये नहीं।
तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने मस्जिद ही में आराम फ़रमाया। दूसरे दिन इशा के बाद फिर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया, कहो जी ! कुछ है? मैंने अर्ज़ किया कि अल्लाह जल्ला शानुहु ने आपको राहत अता फ़रमाई कि वह सब निमट गया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने अल्लाह जल्ला जलालुहू की हम्द, व सना फ़रमाई। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को यह डर हुआ कि, खुदा न ख़्वास्ता मौत आ जाये, और कुछ हिस्सा माल का आपकी मिल्क में रहे। इसके बाद घरों में तशरीफ़ ले गए और बीवियों से मिले।
फायदा , अल्लाह वालों की यह भी ख़्वाहिश रहती है, कि उनकी मिल्क में कुछ भी माल व मताअ न रहे, फिर हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की तो क्या पूछना, जो सारे नबियों के सरदार, सारे औलिया के सरताज, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को इसकी ख़्वाहिश क्यों न होती कि मैं दुनिया से बिल्कुल फ़ारिग़ हो जाऊं।मैंने मुअतबर ज़राए से सुना है, कि हज़रत अक़्दस मौलाना शाह अब्दुर्रहीम साहब रायपुरी, नूब्बरल्लाहु मर्क़दहू का मामूल यह था कि, जब नज़रानो की रक़म कुछ जमा हो जाती, तो एहतमाम से मंगवा कर सब तक़्सीम फ़रमा देते, और विसाल से क़ब्ल तो अपने पहनने के कपड़े वग़ैरह भी, अपने ख़ादिमें ख़ास हज़रत मौलाना शाह अब्दुल क़ादिर साहब रहमतुल्लाह अलइही ,को दे दिए थे, और फ़रमाया था कि बस, अब तुम से मुस्तआर (उधार) लेकर पहन लिया करूंगा, और अपने वालिद साहब रहमतुल्लाह अलइही, को मैंने बारहा देखा कि मग़रिब के बाद जो कोई रुपया पास होता, वह किसी क़र्ज़, ख़्वाह को दे देते, कि कई हज़ार के मक़रूज़ थे। और यह फ़रमाया करते कि, यह झगड़े की चीज़ मैं रात को अपने पास नहीं रखता। इस नौअ के बहुत से हालात अकाबिर के हैं, मगर यह ज़रूरी नहीं कि, हर शैख़ का एक ही रंग हो। मशायख़ के अन्वान (बुजुर्गों के रंग) मुख़्तलिफ़ होते हैं और चमन के फूलों में हर फूल की सूरत-सीरत मुम्ताज होती है।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे