तीसरा बाब,पेज नम्बर 67से70,तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, हदीस नम्बर4, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का बैतुलमाल से वज़ीफ़ा
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के यहां कपड़े की तिजारत होती थी और इसी से गुज़र औक़ात था। जब ख़लीफ़ा बनाये गए, तो हस्बे मामूल सुबह को चन्द, चादरें हाथ पर डालकर बाज़ार में फ़रोख़्त के लिए तशरीफ़ ले चले। रास्ते में हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मिले पूछा, कहां चले फ़रमाया, बाज़ार जा रहा हूँ। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया, कि अगर तुम तिजारत में मशगूल रहोगे तो ख़िलाफ़त के काम का क्या होगा? फ़रमाया, फिर अहल व अयाल को कहां से खिलाऊं। अर्ज़ किया कि अबू उबैदा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिनको हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने अमीन होने का लक़ब दिया है, उनके पास चलें, वह आपके लिए बैतुल माल से कुछ मुक़र्रर कर देंगे।
दोनों हज़रात उनके पास तशरीफ़ ले गए, तो उन्होंने एक, मुहाजिरी को जो औसतन
मिलता था, न कम, न ज़्यादा, वह मुक़र्रर फ़रमा दिया। एक मर्तबा बीवी
ने दरख़्वास्त की, कि कोई मीठी चीज़ खाने को दिल चाहता है। हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि
अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़रमाया कि मेरे पास तो दाम नहीं,
कि खरीदूं। अहलिया ने अर्ज़ किया कि हम
अपने रोज़ के खाने में से थोड़ा-थोड़ा बचा लिया करें, कुछ दिनों में इतनी मिक़दार हो जाएगी।
आपने इजाज़त फ़रमा दी। अहलिया ने कई रोज़ में कुछ थोड़े से पैसे जमा किये। आपने
फ़रमाया कि तजुर्बे से यह मालूम हुआ, कि इतनी मिक़दार हमें बैतुलमाल से ज़्यादा
मिलती है, इसलिए जो अहलिया ने जमा किया था, वह भी बैतुलमाल में जमा कर दिया, और आइन्दा के लिए उतनी मिक़दार
जितना उन्होंने रोज़ाना जमा किया था, अपनी तनख़्वाह में से कम कर दिया।
फायदा— इतने बड़े ख़लीफ़ा और बादशाह, पहले से अपनी तिजारत भी करते थे और, वह ज़रूरतियात को काफ़ी भी थी, जैसा कि उस ऐलान से मालूम होता है, जो बुख़ारी में हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा ,से मरवी है कि जब हजरत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ख़लीफ़ा बनाये गए तो, आपने फ़रमाया कि मेरी क़ौम को यह बात मालूम है, कि मेरा पेशा-ए-तिजारत,मेरे अहल व अयाल के ख़र्च को ना-काफ़ी नहीं था, लेकिन अब ख़िलाफ़त की वजह से मुसलमानों के कारोबार में मशगूली है, इसलिए बैतुलमाल से मेरे अहल व आयल का खाना मुक़र्रर होगा। इसके बावजूद हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का विसाल होने लगा तो, हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, को वसीयत फ़रमाई कि मेरी ज़रूरतों में जो चीजें बैतुलमाल की हैं, वह मेरे बाद आने वाले ख़लीफ़ा के हवाले कर दी जायें।
हज़रत अनस रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़रमाते हैं, कि आपके पास कोई दीनार, और दिरहम नहीं था, एक ऊंटनी दूध की, एक प्याला, एक ख़ादिम था। बाज़ रिवायात में एक ओढ़ना, एक बिछौना भी आया है। यह अश्या (चीजें) हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के पास जब नियाबत में पहुंचीं, तो आपने फ़रमाया कि अल्लाह तआला अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, पर रहम फ़रमाएं कि, अपने से बाद वाले को मशक़्क़त में डाल गए।
हदीस नम्बर5, हज़रत उमर फ़ारूक़ रजि अल्लाहु ताआला
अन्हु, का बैतुलमाल से वज़ीफ़ा
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी तिजारत किया करते थे। जब ख़लीफ़ा बनाये गये तो बैतुल माल से वज़ीफ़ा मुक़र्रर हुआ। मदीना-ए-तय्यबा में लोगों को जमा फ़रमा कर, इर्शाद फ़रमाया कि मैं तिजारत किया करता था। अब तुम लोगों ने इसमें मशगूल कर दिया। इसलिए अब गुज़ारे की क्या सूरत हो। लोगों ने मुख़्तलिफ़ मिक़दारें तज्वीज़ कीं। हज़रत अली कर्रमल्लाहु वजहु चुप बैठे थे। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने दर्याफ़्त किया तुम्हारी क्या राय है? आपने फ़रमाया तवस्सुत (दर्मियाना ख़र्च) के साथ जो तुम्हें, और तुम्हारे घर वालों को काफ़ी हो जाए ? हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इस राय को पसन्द फ़रमाया और कुबूल कर लिया और मुतवस्सित मिक़दार तज्वीज़ हो गई।
इसके बाद एक मर्तबा एक मजलिस में, जिसमें खुद हज़रत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी थे और हज़रत उस्मान रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत ज़ुबैर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, हज़रत तलहा शरीक थे, यह ज़िक्र आया कि हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के वज़ीफ़े में इज़ाफ़ा करना चाहिए, कि गुज़र में तंगी होती है, मगर उन से अर्ज़ करने की हिम्मत न हुई, इसलिए इनकी साहबज़ादी हज़रत हफ़्सा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की बीवी होने की वजह से उम्मुल मोमिनीन भी थीं, उनकी ख़िदमत में यह हज़रात तशरीफ़ ले गए, और इनके ज़रिए से हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की इजाज़त और राय मालूम करने की कोशिश की, और साथ ही यह भी कह दिया कि, हम लोगों के नाम न मालूम हों।
हज़रत हफ़्सा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने जब हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, से इसका तज़किरा किया तो, चेहरे पर गुस्से के आसार ज़ाहिर हुए। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने नाम दर्याफ़्त किये। हज़रत हफ़्सा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया कि, पहले आपकी राय मालूम हो जाये। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़रमाया कि मुझे उनके नाम मालूम हो जाते, तो उनके चेहरे बदल देता, यानी ऐसी सख़्त सज़ाएं देता कि, मुंह पर निशान पड़ जाते।
[3D] तू ही बता कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का उम्दा से उम्दा लिबास तेरे घर में क्या था। उन्होंने अर्ज़ किया कि, दो कपड़े गेरुवी रंग के जिनको हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, जुमा के दिन या किसी वफ़्द, की वजह से पहनते थे, फिर फ़रमाया कि कौन सा खाना तेरे यहां अच्छे से अच्छा खाया जाता। अर्ज़ किया कि हमारा खाना जौं की रोटी थी। हमने गर्म-गर्म रोटी पर घी के, डिब्बे की तलछट उलट कर उसको एक मर्तबा चुपड़ दिया, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुद भी इसको मज़े लेकर नोश फ़रमा रहे थे, और दूसरों को भी खिलाते थे। फ़रमाया, कौन-सा बिस्तर उम्दा होता था, जो तेरे यहां बिछाते थे। अर्ज़ किया, एक मोटा सा कपड़ा था, गर्मी में इसको चौहरा करके बिछा लेते थे, और सर्दी में आधे को बिछा लेते, और आधे को ओढ़ लेते,
फ़रमाया कि हफ़्सा (रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,) उन लोगों तक यह बात पहुंचा दे, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने अपने तर्ज़े अमल से, एक अन्दाज़ा मुक़र्रर फ़रमा दिया, और उम्मीद (आख़िरत) पर किफ़ायत फ़रमाई। मैं भी हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इत्तिबाअ (पैरवी) करूंगा। मेरी मिसाल और मेरे दो साथी हुज़ूरे अक़्सद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, और हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की मिसाल उन तीनों शख़्सों की सी है, जो एक रास्ते पर चले।
पहला शख़्स एक तोशा ले कर चला, और मक़्सद को पहुंच गया। दूसरे ने भी पहले का इत्तिबाअ किया और, उसी के तरीक़े पर चला, वह भी पहले के पास पहुंच गया। फिर तीसरे शख़्स ने चलना शुरू किया। अगर वह इन दोनों के तरीक़े पर चलेगा तो, उनके साथ मिल जाएगा, और अगर उनके तरीक़े के ख़िलाफ़ चलेगा तो, कभी भी उनके साथ नहीं मिल सकेगा।
फायदा, यह उस शख़्स का हाल है, जिससे दुनिया के बादशाह डरते थे, कांपते थे कि किस ज़ाहिदाना, ज़िन्दगी के साथ उमर गुज़ार दी। एक मर्तबा आप ख़ुत्बा पढ़ रहे थे, और आपकी लुंगी में, 12 पैवंद थे, जिन में से एक चमड़े का भी था। एक मर्तबा जुमा की नमाज़ के लिए, तशरीफ़ लाने में देर हो गई तो, तशरीफ़ लाकर माज़रत फ़रमाई कि, मुझे अपने कपड़े धोने में देर हो गई, और इन कपड़ों के अलावा और थे नहीं।
एक बार हज़रत उमर खाना नोश फ़रमा रहे थे, ग़ुलाम ने आकर अर्ज़ किया कि, उत्बा बिन अबी फ़रक़द रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हाज़िर हुए हैं। आपने अन्दर आने की इजाज़त फ़रमाई, और खाने की तवाज़ो फ़रमाई, वह शरीक हो गए तो,ऐसा मोटा खाना था कि निगला न गया। उन्होंने अर्ज़ किया कि छने हुए आटे का खाना भी तो हो सकता था। आपने फ़रमाया, क्या सब मुसलमान मैदा खा सकते हैं ? अर्ज़ किया कि सब तो नहीं खा सकते। फ़रमाया कि अफ़सोस तुम यह चाहते हो, कि मैं अपनी सारी लज़्ज़तें दुनियां ही में ख़त्म कर दूं।
इस क़िस्म के सैकड़ो-हज़ारों नहीं बल्कि, लाखों वाक़िआत इन हज़राते किराम के हैं। उनका इत्तिबाअ न अब हो सकता है, न हर एक शख़्स को करना चाहिए कि, क़ुवा ज़ईफ़ हैं (जिस्म की ताक़त कमज़ोर हैं), जिसकी वजह से तहम्मुल भी उनका इस ज़माने में दुश्वार है। इसी वजह से इस ज़माने में मशायख़ें तसववुफ़, ऐसे मुजाहदों की इजाज़त नहीं देते, जिससे ज़ोफ़ पैदा हो कि कुववते, पहले ही से ज़ईफ़ हैं,
इन हज़रात को अल्लाह जल्ला शानुहू ने, कुववते, भी अता फ़रमाई थीं। अलबत्ता, यह ज़रूरी है कि इत्तिबाअ की ख़्वाहिश, और तमन्ना ज़रूर रखना
चाहिए कि, उस की वजह से आराम तलबी में कुछ कमी वाक़े हो, और निगाह कुछ तो नीची रहे, और इस ज़माने के मुनासिब ऐतदाल पैदा हो जायें, कि हम लोग हर वक़्त, लज़्ज़ाते दुनिया
में बढ़ते जाते हैं, और हर शख़्स अपने से ज़्यादा माल, व दौलत वाले की तरफ निगाह
रखता है, और इस हसरत में मरा जाता है, कि फ़लां शख़्स मुझ से ज़्यादा वुसअत में है।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे