तीसरा बाब,पेज नम्बर 63से66,तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अन्हुम अजमईन के ज़ुहद और फ़क़र के बयान में
इस बारे में खुद नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का अपना मामूल और वाक़िआत जो इस अम्र पर दलालत करते हैं; कि यह चीज़ हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खुद इख़्तियार फ़रमायी हुई, और पसन्द की हुई थी, इतनी कसरत से हदीस की किताबों में पाये जाते हैं; कि इनका मिसाल के तौर पर भी जमा करना मुश्किल है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,का इर्शाद है कि फ़क़्र (त्याग, दुनिया की किसी चीज़ से लगाव न होना) मोमिन का तोहफ़ा है।
हदीस नम्बर 1,हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का पहाड़ों को सोना बना देने से इंकार;
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इर्शाद है कि मेरे रब ने, मुझ पर यह पेश किया कि मेरे लिए, मक्का के पहाड़ों को सोना बना दिया जावे। मैंने अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह ! मुझे तो यह पसन्द है कि, एक दिन पेट भर कर खाऊं, तो दूसरे दिन भूखा रहूं, ताकि जब भूखा रहूं तो, तेरी तरफ़ज़ारी करूं, और तुझे याद करूं, और जब पेट भरूं तो तेरा शुक्र करूं, तेरी तारीफ़ करूं।फायदा — यह उस ज़ाते मुक़द्दस का हाल है, जिसके हम नाम लेवा हैं; और उसकी उम्मत में होने पर फ़ख्र है, जिसकी हर बात हमारे लिए क़ाबिले इत्तिबाअ है।
हदीस नम्बर2, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के वुस्अत तलब करने पर तंबीह, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,के गुज़र की हालत
बीवियों की बाज़ ज़्यादतियों पर; एक मर्तबा हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने क़सम खा ली थी; कि एक महीने तक उनके पास न जाऊंगा, ताकि उनको तंबीह हो; और अलाहिदा ऊपर एक हुजरे में क़याम फ़रमाया था। लोगों में यह शोहरत हो गई कि, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सबको तलाक़ दे दी। हजरत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उस वक़्त अपने घर थे, जब यह ख़बर सुनी तो दौड़े हुए आए, मस्जिद में देखा कि लोग मुतफ़र्रिक (अलग-अलग) तौर पर बैठे हुए; हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के रंज और गुस्से की वजह से रो रहे हैं,
बीवियां भी सब अपने-अपने घरों में रो रही हैं। अपनी बेटी हज़रत हफ़्सा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा के पास तशरीफ़ ले गए, वह भी मकान में रो रही थीं। फ़रमाया कि अब क्यों रो रही है? क्या मैं हमेशा इससे नहीं डराया करता था, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की नाराज़गी की कोई बात न किया कर। इसके बाद मस्जिद में तशरीफ़ लाए। वहां एक जमाअत मिम्बर के पास, बैठी रो रही थी। थोड़ी देर वहां बैठे रहे, मगर शिद्दते रंज से बैठा न गया, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, जिस जगह तशरीफ़ फ़रमा थे; उसके क़रीब तशरीफ़ ले गए और हज़रत रिबाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक ग़ुलाम के ज़रिये, से, जो दोबारी के ज़ीने पर पांव लटकाये बैठे थे, अन्दर हाज़िरी की इजाज़त चाही।
उन्होंने हाज़िरे ख़िदमत होकर हज़रत उमर, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के लिए इजाज़त मांगी मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सुकूत (ख़ामोशी) फ़रमाया, कोई जवाब न दिया। हज़रत रिबाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने आकर यही जवाब उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को दे दिया कि, मैंने अर्ज़ कर दिया था, मगर कोई जवाब नहीं मिला। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मायूस होकर मिम्बर के पास आ बैठे मगर बैठा न गया तो फिर, थोड़ी देर में हाज़िर होकर हज़रत रिबाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के ज़रिए से इजाज़त चाही। इसी तरह तीन बार पेश आया कि, यह बेताबी से ग़ुलाम के ज़रिए इजाज़त हाज़िरी की मांगते।
उधर से जवाब में सुकूत और ख़ामोशी ही होती। तीसरी बार जब लौटने लगे तो, हज़रत रिबाह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने आवाज़ दी और कहा कि तुम्हें, हाज़िरी की इजाज़त हो गई। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, हाज़िरे ख़िदमत हुए तो देखा कि, हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक बोरिए पर लेटे हुए हैं, जिस पर कोई चीज़ बिछी हुई नहीं है, इस वजह से जिस्मे अतहर पर, बोरिए के निशानात भी उभर आये हैं। ख़ूबसूरत बदन पर निशानात साफ़ नज़र आया ही करते हैं; और सरहाने एक चमड़े का तकिया है, जिसमें खजूर की छाल भरी हुई है। मैंने सलाम किया और, सबसे अव्वल तो यह पूछा, क्या आपने बीवियों को तलाक़ दे दी है?
आपने फ़रमाया, नहीं। इसके बाद मैंने दिल बस्तगी के तौर पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह ! हम क़ुरैशी लोग औरतों पर ग़ालिब रहते थे, मगर जब मदीना आये तो देखा, कि अन्सार की औरतें मर्दों पर ग़ालिब हैं। उनको देखकर क़ुरैशी की औरतें भी, उससे मुतास्सिर हो गयीं। इसके बाद मैंने एक आध बात और की, जिससे नबी अक़रम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के चेहरा-ए-अनवर पर तबस्सुम के आसार ज़ाहिर हुए। मैंने देखा कि घर का कुल सामान यह था, तीन चमड़े बग़ैर दबाग़त दिये हुए, और एक मुट्ठी जौ, एक कोने में पड़े हुए थे। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाकर देखा, तो इसके सिवा कुछ न मिला।
मैं देखकर रो दिया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया कि क्यों रो रहे हो ? मैंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, क्यों न रोऊं कि यह बोरिए के निशानात आपके बदन मुबारक पर पड़ रहे हैं, और घर की कुल कायनात यह है, जो मेरे सामने है। फिर मैंने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह, दुआ कीजिए कि, आपकी उम्मत पर भी वुसअत हो, यह रूम व फ़ारस, बेदीन होने के बावजूद कि अल्लाह की इबादत नहीं करते, इन पर तो यह वुसअत, यह क़ैसर व कसरा, तो बाग़ों और नहरों के दर्मियान हों, और आप अल्लाह के रसूल, और ख़ास बन्दे होकर यह हालत।
नबी सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, तकिया लगाये हुए लेटे थे। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की यह बात सुनकर बैठ गए, और फ़रमाया कि उमर, क्या अब तक इस बात के अन्दर शक में पड़े हुए हो। सुनो, आख़िरत की वुसअत दुनिया की वुसअत से बहुत बेहतर है। इन कुफ़्फ़ार की तय्यिबात, (साफ़ सुथरी पाक चीजें) और अच्छी चीजें दुनिया में मिल गयीं; और हमारे लिए आख़िरत में हैं। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह, मेरे लिए इस्तिग़फ़ार फ़रमायें, कि वाक़ई मैंने ग़लती की।
फायदा — यह दीन व दुनिया के बादशाह, और अल्लाह के लाडले रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का तर्ज़े अमल है, कि बोरिए पर कोई चीज़ बिछी हुई भी नहीं, निशानात बदन पर पड़े हुए हैं, घर के साज़ व सामान का हाल भी मालूम हो गया, उस पर एक शख़्स ने, दुआ की दरख़्वास्त की तो तंबीह फ़रमाई। हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से किसी ने पूछा था कि आपके घर में हुज़ूर, सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का बिस्तरा कैसा था। फ़रमाया कि एक चमड़े का था, जिसमें खजूर की छाल भरी हुई थी। हज़रत हफ़्सा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, से भी किसी ने पूछा कि, आपके घर में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का कैसा बिस्तर था, फ़रमाया कि एक टाट था, जिसको दोहरा करके हुज़ूरे सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के नीचे बिछा देती थीं। एक रोज़ मुझे ख़्याल हुआ कि, अगर इसको चोहरा करके बिछा दूं तो ज़्यादा नर्म हो जाए। चुनांचे हमने बिछा दिया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सुबह को फ़रमाया कि रात क्या बिछा दिया था। हमने अर्ज़ कर दिया, कि वही टाट था, उसको चोहरा कर दिया था, फ़रमाया, उसको वैसा ही कर दो जैसा पहले था। उसकी नर्मी रात को उठने में मानेअ (रुकावट, रोक) बनती है। अब हम लोग अपने नर्म-नर्म और रोएंदार गद्दों पर भी, निगाह डालें कि अल्लाह ने किस क़दर वुसअत फ़रमा रखी है; और फिर भी बजाय शुक्र के हर वक़्त तंगी की शिकायत ही ज़बान पर रहती है,
हदीस नम्बर3, हज़रत अबू हुरैरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की भूख में हालत
हज़रत अबू हुरैरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक मर्तबा कतान के कपड़े में नाक साफ़ करके फ़रमाने लगे, क्या कहने अबू हुरैरह के, आज कतान के कपड़े में नाक साफ़ करता है, हालांकि मुझे वह ज़माना भी याद है, जब हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के मिम्बर और हुजरे के दर्मियान बेहोश पड़ा हुआ होता था, और लोग मजनून समझकर, पांव से गर्दन दबाते थे, हालांकि जुनून नहीं था, बल्कि भूख थी।
फायदा — यानी भूख की वजह से कई-कई रोज़ का फ़ाक़ा हो जाता था। बेहोशी हो जाती थी, और लोग समझते थे कि जुनून हो गया। कहते हैं कि उस ज़माने में मजनून का इलाज गर्दन को, पांव से दबाने से किया जाता था। हज़रत अबू हुरैरह रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बड़े साबिर और क़ानेअ (थोड़े पर बस करने वाले) लोगों में थे। कई-कई वक़्त फ़ाक़े में गुज़र जाते थे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के बाद अल्लाह ने फ़ुतूहात फ़रमाईं, तो उन पर तवंगरी आई। इसके साथ ही बड़े आबिद थे। उनके पास एक थैली थी, जिसमें खजूर की गुठलियां भरी रहतीं, उस पर तस्बीह पढ़ा करते। जब वह सारी थैली खाली हो जाती, तो बांदी फिर भरकर उनके पास रख देती। उनका यह भी मामूल था, कि खुद और बीवी और ख़ादिम तीन आदमी रात के तीन हिस्से कर लेते, और नम्बर वार एक शख़्स तीनों में से इबादत में मशगूल रहता। मैंने अपने वालिद साहब रहमतुल्लाह अलइही , से सुना कि मेरे दादा साहब रहमतुल्लाह अलइही, का भी तक़रीबन यही मामूल था, कि रात को एक बजे तक वालिद साहब रहमतुल्लाह अलइही ,मुताला में मशगूल रहते। एक बजे दादा साहब तहज्जुद के लिए उठते, तो तक़ाज़ा फ़रमाकर वालिद साहब को सुला देते, और खुद तहज्जुद में मशगूल हो जाते,और सुबह से तक़रीबन पौन घण्टा क़ब्ल मेरे ताया साहब रहमतुल्लाह अलइही , को तहज्जुद के लिए जगा देते, और खुद इत्तिबाए सुन्नत (सुन्नत की पैरवी में) में आराम फ़रमाते।अल्लाहुम्मर्ज़ुक्नी इत्तिबाअहुम०
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे