दूसरा बाब, पेज नम्बर 59 से 62तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी, तक्मील-अल्लाह के ख़ौफ़ के, मुताफ़र्रिक़,अहवाल,
क़ुरआन शरीफ़ की आयाात और, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की अहादीस और बुज़ुर्गों के वाक़िआत में, अल्लाह जल्ला शानुहु से डरने से, मुताल्लिक़ जितना कुछ ज़िक्र किया गया है, उसका अहाता तो दुशवार है, लेकिन मुख़्तसर तौर पर इतना समझ लेना चाहिए, कि दीन के हर कमाल का ज़ीना, अल्लाह का ख़ौफ़ है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इरशाद है कि, हिकमत की जड़ अल्लाह का ख़ौफ़ है। हज़रत इबने उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बहुत रोया करते थे, हत्ताकि रोते-रोते आँखें भी बेकार हो गई थीं। किसी शख़्स ने एक मर्तबा देख लिया, तो फ़रमाने लगे कि मेरे,रोने पर ताज्जुब करते हो, अल्लाह के ख़ौफ़ से सूरज रोता है। एक मर्तबा ऐसा ही क़िस्सा आया, तो फ़रमाया कि अल्लाह के ख़ौफ़ से चांद रोता है।
एक नौ-जवान सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का गुज़र हुआ, वह पढ़ रहे थे। जब—, فَإِذَا انشَقَّتِ السَّمَاءُ فَكَانَتْ وَرْدَةً كَالدِّهَانِ ,(फ़इज़न्श क्क़ति स्समाउ फ़ कानत वर्दतन कद्दिहानि।),पर पहुंचे तो बदन के बाल खड़े हो गए, रोते-रोते दम घुटने लगा, और कह रहे थे, हां जिस दिन आसमान फट जावेंगे, (यानी क़यामत के दिन) मेरा क्या हाल होगा, हाय मेरी बर्बादी ! हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया, कि तुम्हारे इस रोने की वजह से फ़रिश्ते भी रोने लगे।
[3D]एक अन्सारी ने तहज्जुद की नमाज़, और फिर बैठ कर बहुत रोये। कहते थे, अल्लाह ही से फ़रियाद करता हूं, जहन्नम की आग से बचने की। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया कि तुमने आज फ़रिश्तों को रूला दिया।
अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी हैं रो रहे थे। बीवी भी उनकी इस हालत को देखकर रोने लगी। पूछा कि तुम क्यों रोती हो, कहने लगीं कि जिस वजह से तुम रोते हो। अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा कि मैं इस वजह से, रो रहा हूं कि, जहन्नम पर तो गुज़रना है ही, न जाने निजात हो सकेगी या, वहीं रह जाऊंगा।ज़ुरारह बिन औफ़ा, एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ा रहे थे। 'फ़इज़ा नुक़ि र फ़िन्नाक़ूरि' अल आयत, पर जब पहुंचे, तो फ़ौरन गिर गए, और इन्तिक़ाल हो गया। लोग उठा कर घर तक लाये,
एक नौ-जवान सहाबी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का गुज़र हुआ, वह पढ़ रहे थे। जब—, فَإِذَا انشَقَّتِ السَّمَاءُ فَكَانَتْ وَرْدَةً كَالدِّهَانِ ,(फ़इज़न्श क्क़ति स्समाउ फ़ कानत वर्दतन कद्दिहानि।),पर पहुंचे तो बदन के बाल खड़े हो गए, रोते-रोते दम घुटने लगा, और कह रहे थे, हां जिस दिन आसमान फट जावेंगे, (यानी क़यामत के दिन) मेरा क्या हाल होगा, हाय मेरी बर्बादी ! हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया, कि तुम्हारे इस रोने की वजह से फ़रिश्ते भी रोने लगे।
[3D]एक अन्सारी ने तहज्जुद की नमाज़, और फिर बैठ कर बहुत रोये। कहते थे, अल्लाह ही से फ़रियाद करता हूं, जहन्नम की आग से बचने की। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया कि तुमने आज फ़रिश्तों को रूला दिया।
अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी हैं रो रहे थे। बीवी भी उनकी इस हालत को देखकर रोने लगी। पूछा कि तुम क्यों रोती हो, कहने लगीं कि जिस वजह से तुम रोते हो। अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कहा कि मैं इस वजह से, रो रहा हूं कि, जहन्नम पर तो गुज़रना है ही, न जाने निजात हो सकेगी या, वहीं रह जाऊंगा।ज़ुरारह बिन औफ़ा, एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ा रहे थे। 'फ़इज़ा नुक़ि र फ़िन्नाक़ूरि' अल आयत, पर जब पहुंचे, तो फ़ौरन गिर गए, और इन्तिक़ाल हो गया। लोग उठा कर घर तक लाये,
[3D]हज़रत खुलैद, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक मर्तबा नमाज़ पढ़ रहे थे। 'कुल्लु नफ़्सिन ज़ाइक़तुल मौत' पर पहुंचे तो, उसको बार-बार पढ़ने लगे। थोड़ी देर में घर के एक कोने से आवाज़ आई कि, कितनी मर्तबा इसको पढ़ोगे, तुम्हारे इस बार-बार के पढ़ने से, चार जिन मर चुके हैं। एक और साहब का क़िस्सा लिखा है, कि पढ़ते-पढ़ते जब, 'वरुद्दू इलल्लाहि मौलाहुमुल हक़्क़ि' पर पहुंचे तो एक चीख़ मारी, और तड़प-तड़प कर मर गए। और भी इसी क़िस्म के वाक़िआत कसरत से गुज़रे हैं।
[3D]हज़रत फ़ुज़ैल रहमतुल्ला अलइही, मशहूर बुज़ुर्ग फ़रमाते हैं कि, अल्लाह का ख़ौफ़ हर ख़ैर की तरफ रहबरी करता है। हज़रत शिब्ली रहमतुल्ला अलइही, के नाम से सभी वाक़िफ़ हैं। वह कहते हैं कि, जब से मैं भी अल्लाह से डरा हूं, उसकी वजह से मुझ पर हिकमत, और इबरत (सबक़) का ऐसा दरवाज़ा खुला है, जो इससे पहले नहीं खुला। हदीस में आया है, अल्लाह जल्ला शानुहु फ़रमाते हैं, कि मैं अपने बंदे पर दो ख़ौफ़, जमा नहीं करता और, दो बे, फ़िक्रियाँ नहीं देता। अगर दुनिया में मुझ से बेफ़िक्र रहे, तो क़यामत में डराता हूं, और दुनिया में डरता रहे, तो आख़िरत में बेफ़िक्री अता करता हूँ। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इरशाद है कि जो अल्लाह से डरता है, उससे हर चीज़ डरती है, और जो ग़ैर-अल्लाह से डरता है, उसको हर चीज़ डराती है।
यह्या बिन मुआज़ कहते हैं, कि आदमी बेचारा अगर जहन्नम से, इतना डरने लगे जितना, तंगदस्ती से डरता है, तो सीधा जन्नत में जाये। अबू सुलैमान दारानी कहते हैं, कि जिस दिल से अल्लाह का ख़ौफ़ जाता रहता है, वह बर्बाद हो जाता है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इरशाद है कि जिस आंख से, अल्लाह के ख़ौफ़ की वजह से ज़रा-सा, आंसू ख़्वाह मक्खी के सर के, बराबर ही क्यों न हो, निकल कर चेहरे पर गिरता है, अल्लाह तआला उस चेहरे को, आग पर हराम फ़रमा देता है।
[3D]हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का एक और इरशाद है कि, जब मुसलमान का दिल, अल्लाह के ख़ौफ़ से कांपता है, तो उसके गुनाह ऐसे झड़ते हैं, जैसे दरख़्तों से पत्ते झड़ते हैं। मेरे नबी सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का एक और इरशाद है कि, जो शख़्स अल्लाह के ख़ौफ़ से रोये, उसका आग में जाना ऐसा ही मुश्किल है, जैसा दूध का थनों में वापस जाना। हज़रत उक़्बा बिन आमिर, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक सहाबी हैं। उन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से पूछा कि निजात का रास्ता क्या है। आपने फ़रमाया कि अपनी ज़बान को रोके रखो, घर में बैठे रहो, और अपनी ख़ताओं पर रोते रहो। हज़रत आइशा रजि अल्लाहु ताआला अन्हा , ने एक मर्तबा दर्याफ़्त किया कि, आपकी उम्मत में कोई ऐसा भी है, जो बे हिसाब-किताब जन्नत में दाख़िल हो। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,ने फ़रमाया हां, जो अपने गुनाहों को याद करके रोता रहे।
मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का एक और इरशाद है कि, अल्लाह के नज़दीक दो क़तरों से ज़्यादा, कोई क़तरा पसन्द नहीं—एक आंसू का क़तरा जो, अल्लाह के ख़ौफ़ से निकला हो, दूसरा ख़ून का क़तरा जो, अल्लाह के रास्ते में गिरा हो। एक जगह इरशाद है कि क़यामत के दिन सात आदमी ऐसे होंगे, जिन को अल्लाह जल्ला शानुहु अपना साया अता फ़रमायेंगे—एक वह शख़्स जो तन्हाई में, अल्लाह को याद करे और, उसकी वजह से उसकी आंखों से आंसू बहने लगें।
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का इरशाद है, कि जो रो सकता हो, वह रोये और जिसको रोना न आये, वह रोने की सूरत ही बना ले। मुहम्मद बिन मुन्कदिर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,जब रोते थे तो, आंसुओं को अपने मुंह और, दाढ़ी से पोंछते थे और कहते थे, कि मुझे यह रिवायत पहुंची है, कि जहन्नम की आग उस जगह को, नहीं छूती जहां आंसू पहुंचे हों।
[3D]साबित बनानी रहमतुल्ला अलइही की आंखें दुखने लगीं। तबीब ने कहा कि एक बात का वायदा कर लो, आंख अच्छी हो जावेगी, कि रोया न करो। कहने लगे, आंख में कोई ख़ूबी ही नहीं, अगर वह रोये नहीं। यज़ीद बिन मैसरा रहमतुल्ला अलइही कहते हैं कि रोना सात वजह से होता है: 1.,खुशी से, 2., जुनून से, 3.,दर्द से, 4., घबराहट से, 5., दिखलावे से, 6., नशा से, और 7.,अल्लाह के ख़ौफ़ से। यही है वह रोना, कि उसका एक आंसू भी, आग के समुद्रों को बुझा देता।
काअब अहबार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि, उस ज़ात की क़सम ! जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, कि अगर मैं अल्लाह के ख़ौफ़ से रोऊं, और आंसू मेरे रुख़्सार पर बहने लगें, यह मुझे इससे ज़्यादा पसन्द है, कि पहाड़ के बराबर सोना सदक़ा करूं। इनके अलावा और भी हज़ारों इरशादात हैं, जिनसे मालूम होता है, कि अल्लाह की याद में, और अपने गुनाहों के फ़िक्र में, रोना कीमिया है, और बहुत ही ज़रूरी और, मुफ़ीद और अपने गुनाहों पर नज़र, करके यही हालत होनी चाहिए।
लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है, कि अल्लाह के फजल और उसकी रहमत की, उम्मीद में भी कमी न हो, यक़ीनन अल्लाह की रहमत, हर शै को वसीअ है। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का इरशाद है कि, अगर क़यामत में यह एलान हो, कि एक शख़्स के सिवा सब को जहन्नम में दाख़िल करो, तो मुझे अल्लाह की रहमत से यह उम्मीद है, कि वह शख़्स मैं ही हूं। और अगर यह एलान हो कि, एक शख़्स के सिवा सब को जन्नत में दाख़िल करो, तो मुझे अपने आमाल से यह ख़ौफ़ है, कि वह शख़्स मैं ही न हूं। इसलिए दोनों चीज़ों को, अलाहिदा-अलाहिदा समझना और रखना चाहिए। बिलख़ुसूस मौत के वक़्त में, उम्मीद का मामला ज़्यादा होना चाहिए।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,का इरशाद है कि, तुम में से कोई शख़्स न मरे, मगर अल्लाह तआला के साथ हुसने ज़न रखता हो। इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्ला अलइही, का जब इन्तिक़ाल होने लगा तो, उन्होंने अपने बेटे को बुलाया और, फ़रमाया कि ऐसी अहादीस मुझे सुनाओ जिन से अल्लाह तआला के साथ उम्मीद बढ़ती हो।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, दूसरा बाब मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन,दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ कर