दूसरा बाब हदीस नंबर 9 तबूक में, हज़रत काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,की ग़ैर हाज़िरी और तौबा,
इसी तबूक की लड़ाई में माज़ूरीन, (जिन्हें शरई उज्र या मजबूरी रही हो), के अलावा अस्सी से ज़्यादा तो मुनाफ़िक़ अंसार में से थे, और इतने ही तकरीबन बदवी लोगों में से। इन के अलावा एक बड़ी जमाअत, बाहर के लोगों में से ऐसी थी, जो शरीक नहीं हुए और इतना ही नहीं, बल्कि यह लोग दूसरों को भी 'ला तंफ़िरू फ़िलर्हि' (गर्मी में न निकलो) कह कर रोकते थे।
हक़ तआला शानुहू फ़रमाते हैं, कि जहन्नम की आग की गर्मी बहुत सख़्त है। इसके अलावा तीन सच्चे पक्के मुसलमान भी ऐसे थे, जो बिला किसी क़वी उज्र के, लड़ाई में शरीक नहीं हो सके। एक काअब बिन मालिक रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, दूसरे हिलाल बिन उमैया, तीसरे मुरार: बिन रबीअ, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,, यह तीनों हज़रात, किसी निफ़ाक़ या उज्र से नहीं ठहरे, बल्कि, खुशहाली ही सबब रह जाने का बन गई। काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अपनी सरगुज़श्त (कहानी, रिपोर्ट) जो इस मौके पर पेश आई, मुफ़स्सल सुनाते हैं जो आइन्दा आ रही है
मुरार: बिन रबीअ का बाग़ खूब फल रहा था। उनको ख़याल हुआ कि अगर मैं चला गया, तो यह सब ज़ाया हो जायेगा। हमेशा मैं लड़ाइयों में शरीक होता ही रहा हूं। अगर इस मर्तबा रह गया, तो क्या मुज़ायका है, इसलिए ठहर गए, मगर जब तनब्बुह हुआ, तो चूंकि बाग़ ही इसका सबब हुआ था, इसलिए सब को अल्लाह के रास्ते में सदक़ा कर दिया।हिलाल रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के अहल व इज़्ज़ (बाल-बच्चे, रिश्तेदार), जो कहीं गए हुए थे, इत्तिफ़ाक़ से उस मौके पर सब जमा हो गए, उनको भी यही ख़याल हुआ कि हमेशा शिरकत करता रहता हूं, अगर इस मौके पर न जाऊं तो क्या हर्ज है इसलिए ठहर गये, मगर तनब्बुह होने पर सब से ताल्लुक़ात मुंकतअ कर लेने का इरादा किया कि यह ताल्लुक़ात ही इस लड़ाई में शिरकत न करने का सबब हुए।
हज़रत काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का क़िस्सा अहादीस में कसरत से आता है। वह अपनी सरगुज़श्त, बड़ी तफ़सील से सुनाया करते थे। वह फ़रमाते हैं कि मैं तबूक से पहले किसी लड़ाई में भी, इतना क़वी व मालदार नहीं था, जितना कि तबूक के वक़्त था, उस वक़्त मेरे पास, खुद अपनी ज़ाती दो ऊंटनियां थीं। इससे पहले कभी भी, दो ऊंटनियां मेरे पास होने की नौबत नहीं आई। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की हमेशा आदत शरीफ़ा यह थी, कि जिस तरफ लड़ाई का इरादा होता था, उसका इज़हार नहीं होता था, बल्कि दूसरी जानिबों के अहवाल, दर्याफ्त फ़रमाते थे, मगर इस लड़ाई में चूंकि गर्मी भी शदीद थी, और सफ़र भी दूर का था, इन के अलावा दुश्मनों की भी, बहुत बड़ी जमाअत थी, इसलिए साफ़ ऐलान फ़रमा दिया, ताकि लोग तैयारी कर लें।
चुनांचे मुसलमानों की इतनी बड़ी जमाअत, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के साथ हो गई कि, रजिस्टर में उनका नाम भी लिखना दुशवार था, और मज्मा की कसरत की वजह से, कोई शख़्स अगर छुपना चाहता कि मैं न जाऊं, न पता चले तो दुशवार न था। इसके साथ ही फल बिल्कुल पक रहे थे। मैं भी सामाने सफ़र की तैयारी का सुबह ही से इरादा करता, मगर शाम हो जाती, और किसी क़िस्म की तैयारी की नौबत न आती, लेकिन मैं अपने दिल में ख़याल करता, कि मुझे वुसअत (माल ज़्यादती) हासिल है, जब इरादा पुख़्ता करूंगा, फ़ौरन हो जायेगा, हालांकि हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, रवाना भी हो गए, और मुसलमान आपके साथ-साथ, मगर मेरा सामाने सफ़र तैयार न हुआ, फिर भी यही ख़याल रहा कि एक-दो रोज़ में तैयारी करके जा मिलूंगा।
इसी तरह आज कल पर टलता रहा, हत्ताकि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के वहां पहुंचने का ज़माना तकरीबन आ गया। उस वक़्त मैंने कोशिश भी की, मगर सामान न हो सका। अब मैं जब मदीना तैयबा में इधर-उधर देखता हूं, तो सिर्फ़ वही लोग मिलते हैं, जिनके ऊपर निफ़ाक़ का बदनुमा दाग़ लगा हुआ था, या वह माज़ूर थे, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने भी तबूक पहुंच कर, दर्याफ्त फ़रमाया कि काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, नज़र नहीं पड़ते,
क्या बात हुई एक साहब ने कहा, या रसूलल्लाह ! उसको अपने माल, व जमाल की अकड़ ने रोका। हज़रत मुआज़ ने फ़रमाया, कि ग़लत कहा, हम जहां तक समझते हैं, वह भला आदमी है, मगर हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने बिल्कुल सुकूत फ़रमाया, और कुछ नहीं बोले। हत्ताकि चन्द रोज़ में मैंने वापसी की ख़बर सुनी, तो मुझे रंज व ग़म सवार हुआ, और बड़ा फ़िक्र हुआ।
दिल में झूठे-झूठे उज्र आते थे, कि इस वक़्त किसी फ़र्जी उज्र से, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के गुस्से से जान बचा लूं, फिर किसी वक़्त माफ़ी की दरख़्वास्त कर लूंगा, और इस बारे में अपने घराने के, हर समझदार से मशवरा करता रहा। मगर जब मुझे मालूम हो गया कि, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,तशरीफ़ ले ही आये, तो मेरे दिल ने फ़ैसला किया, कि बग़ैर सच के कोई चीज़ निजात न देगी, और मैंने सच-सच अर्ज़ करने की ठान ही ली। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की आदत शरीफ़ा यह थी, कि जब सफ़र से वापस तशरीफ़ लाते, तो अव्वल मस्जिद में तशरीफ़ ले जाते, और दो रकअत तहीयतुल मस्जिद पढ़ते, और वहां थोड़ी देर तक तशरीफ़ रखते कि लोगों से मुलाक़ात फ़रमायें।
चुनांचे हस्ब मामूल हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, तशरीफ़ फ़रमा रहे और मुनाफ़िक़ लोग आकर झूठे-झूठे उज्र करते, और क़समें खाते रहे। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, उनके ज़ाहिर हाल को क़बूल फ़रमाते रहे, और बातिन को अल्लाह के सुपुर्द फ़रमाते रहे, कि इतने में मैं भी हाजिर हुआ,और सलाम किया।हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने नाराज़गी के अन्दाज में तबस्सुम,(मुस्कराये) फ़रमाया, और एराज़ (मुंह फेर लिया) फ़रमाया। मैंने अर्ज़ किया, या अल्लाह के नबी आपने एराज़ फ़रमा लिया। मैं ख़ुदा की क़सम न तो मुनाफ़िक़ हूं, न मुझे ईमान में कुछ तरद्दुद (संकोच) है।
इरशाद फ़रमाया कि यहाँ आ। मैं क़रीब होकर बैठ गया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया, कि तुझे किस चीज़ ने रोका, क्या तूने ऊंटनियां नहीं ख़रीद रखी थीं, मैंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, अगर मैं किसी दुनियांदार के पास, इस वक़्त होता तो मुझे यक़ीन है, कि मैं उसके गुस्से से माक़ूल उजर के साथ ख़लासी पा लेता, कि मुझे बात करने का तरीक़ा, अल्लाह तआला ने अता फ़रमाया है, लेकिन आपके मुताल्लिक़, मुझे मालूम है कि, अगर आज झूठ से आप को राज़ी कर लूं, तो क़रीब है कि, अल्लाह जल्ला जलालुहु मुझसे नाराज़ होंगे, और अगर आपसे साफ़-साफ़ अर्ज़ कर दूं, तो आप को गुस्सा आयेगा, लेकिन क़रीब है कि, अल्लाह की पाक जात आपके इताब (गुस्सा) को ज़ायल फ़रमा देगी। इसलिए सच ही अर्ज़ करता हूं
कि वल्लाह, मुझे कोई उजर नहीं था, और जैसा फ़ारिग और वुसअत वाला, मैं उस ज़माने में था, किसी ज़माने में भी इससे पहले नहीं हुआ। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया, कि उसने सच कहा, फिर फ़रमाया अच्छा ! उठ जाओ, तुम्हारा फ़ैसला हक़ तआला शानुहू फ़रमायेंगे।
मैं वहाँ से उठा तो मेरी क़ौम के बहुत से लोगों ने, मुझे मलामत की कि तूने इससे, पहले कोई गुनाह नहीं किया था। अगर तू कोई उजर करके हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से इस्तिगफ़ार की दरख़्वास्त करता, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का इस्तिगफ़ार (ख़त्म करना) तेरे लिए काफ़ी था। मैंने उनसे पूछा कि कोई और भी, ऐसा शख़्स है जिसके साथ ऐसा मामला हुआ हो। लोगों ने बताया कि दो शख़्सों के साथ, और भी यही मामला हुआ, कि उन्होंने भी यही गुफ़्तगू की जो तूने की और यही जवाब उनको मिला जो तुझको मिला-
एक हिलाल बिन उमैया, दूसरे मुरार: बिन रबीअ। मैंने देखा कि दो सालेह (नेक) शख़्स, जो दोनों बद्री (बद्री वे लोग कहलाते हैं जो बद्र की लड़ाई में शरीक हुए। उन की बुजुर्गी और बड़ाई, मुसल्लम है। अहादीस में भी उन की बड़ाई आयी है। कितनी ही हदीसों में उन की मगफ़िरत और, अल्लाह तआला की उनसे खुश होने की बशारतें आयी हैं।) हैं, वह भी मेरे शरीके हाल हैं।हुज़ूर अक़सद सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने हम तीनों से, बोलने की मुमानअत भी फ़रमा दी (मना कर दिया), कि कोई शख़्स हम से कलाम न करे। यह क़ायदे की बात है, कि गुस्सा उसी पर आता है जिससे ताल्लुक़ होता है, और तम्बीह उसी को की जाती है, जिसमें उसकी अहिलयत भी हो, जिसमें इस्लाह व सलाह की क़ाबलियत ही न हो, उसको तम्बीह ही कौन करता है।
हज़रत काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,की मुमानअत पर, लोगों ने हम से बोलना छोड़ दिया, और हम से इज्तिनाब (कतराना) करने लगे, और गोया दुनिया ही बदल गई, हालांकि ज़मीन वाबजूद, अपनी वुसअत के मुझे तंग मालूम होने लगी। सारे लोग अजनबी मालूम होने लगे, दर व दीवार ओपरे बन गये।मुझे सबसे ज़्यादा इसका फ़िक्र था, कि मैं इस हाल में मर गया, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, जनाज़े की नमाज़ भी न पढ़ेंगे, और ख़ुदा-न-ख़्वास्ता हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का विसाल हो गया, तो मैं हमेशा-हमेशा के लिए ऐसा ही रहूंगा, न कोई मुझ से कलाम करेगा, न मेरी नमाज़ पढ़ेगा, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के इरशाद के ख़िलाफ़ कौन कर सकता है, ग़रज़ हम लोगों ने पचास दिन इसी हाल में गुज़ारे।
मेरे दोनों साथी तो शुरू ही से, घरों में छुप कर बैठ गये थे, मैं सबमें क़वी था, चलता-फिरता बाज़ार में जाता, नमाज़ में शरीक होता, मगर मुझ से बात कोई न करता। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मज्लिस में हाज़िर होकर सलाम करता, और बहुत ग़ौर से ख़याल करता कि, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के लब मुबारक जवाब के लिए हिलें या नहीं। नमाज़ के बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,के क़रीब ही खड़े होकर, नमाज़ पूरी करता और, आँख चुरा कर देखता कि, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, मुझे देखते भी हैं या नहीं। जब मैं नमाज़ में मशगूल होता तो, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, मुझे देखते और जब मैं इधर मुतवज्जह होता तो, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, मुंह फेर लेते, और मेरी जानिब से एराज़ फ़रमा लेते।
ग़रज़ यही हालात गुज़रते रहे और, मुसलमानों का बातचीत बन्द करना मुझ पर बहुत ही, भारी हो गया तो मैं, अबू क़तादा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की दीवार पर चढ़ा। वह मेरे रिश्ते के चचाज़ाद भाई भी थे, और मुझसे ताल्लुक़ात भी बहुत ही ज़्यादा थे। मैंने ऊपर चढ़ कर सलाम किया। उन्होंने सलाम का जवाब न दिया। मैंने उनको क़सम देकर पूछा, कि क्या तुम्हें मालूम नहीं, मुझे अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, से मुहब्बत है। उन्होंने इसका भी जवाब न दिया। मैंने दोबारा क़सम दी, और दर्याफ़्त किया, वह फिर भी चुप ही रहे। मैंने तीसरी मर्तबा फिर क़सम देकर पूछा, उन्होंने कहा अल्लाह जाने और उस का रसूल, ! यह कलमा सुनकर मेरी आंखों में आंसू निकल पड़े, और वहां से लौट आया।
इसी दौरान मैं एक मर्तबा, मदीना के बाज़ार में जा रहा था, कि एक क़िब्ती को जो नसरामी था, और शाम से मदीना मुनव्वरा, अपना ग़ल्ला फ़रोख़्त करने आया था, यह कहते हुए सुना कि, कोई काअब बिन मालिक का पता बता दो। लोगों ने उसको मेरी तरफ इशारा करके बताया, वह मेरे पास आया, और ग़स्सान के काफ़िर बादशाह का, ख़त लाकर मुझे दिया,
उसमें लिखा हुआ था, हमें मालूम हुआ कि, तुम्हारे आका ने तुम पर ज़ुल्म कर रखा है, तुम्हें अल्लाह ज़िल्लत की जगह न रखे, और न ज़ाया (बर्बाद) करे। तुम हमारे पास आओ, हम तुम्हारी मदद करेंगे, (दुनिया का क़ायदा होता है, कि किसी बड़े की तरफ से अगर छोटों को तम्बीह होती है, तो उनको बहकाने वाले, और ज़्यादा खोने की कोशिश किया करते हैं, और ख़ैर ख़्वाह (भलाई चाहने वाला) बनकर, इस क़िस्म के अल्फ़ाज़ से इश्तियाल (भड़काना) दिलाया ही करते हैं।)।
काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि मैंने यह ख़त पढ़ कर, इन्ना लिल्लाहि पढ़ी कि मेरी हालत यहां तक पहुंच गई, कि काफ़िर भी मुझ में तमा करने लगे, और मुझे इस्लाम तक से हटाने की तदबीरें होने लगीं। यह एक और मुसीबत आई, और इस ख़त को ले जाकर मैंने, एक तन्दुर में फेंक दिया, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,से जाकर अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ! आपके एराज की वजह से, मेरी यह हालत हो गई कि, काफ़िर मुझ में तमा करने लगे।
इसी हालत में चालीस रोज़ हम पर गुज़रे थे, कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का क़ासिद (दूत) मेरे पास हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का यह इरशाद वाला लेकर आया, कि अपनी बीवी को भी छोड़ दो। मैंने दर्याफ्त किया कि क्या मंशा है, उसको तलाक़ दे दूं ? कहा नहीं, बल्कि अलहदगी इख़्तियार कर लो, और मेरे दोनों साथियों के पास भी इन्हीं क़ासिद की मारफ़त यही हुक्म पहुंचा। मैंने अपनी बीवी से कह दिया, कि तू अपने मायके में चली जा। जब तक अल्लाह तआला शानुहू, इस अम्र का फ़ैसला फ़रमायें, वहीं रहना।
हिलाल बिन उमैया रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की बीवी, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर हुईं, और अर्ज़ किया कि हिलाल, बिल्कुल बूढ़े शख़्स हैं, कोई ख़बरगीरी करने वाला न होगा, तो हलाक हो जायेंगे। अगर आप इजाज़त दें, और आपको गिरानी न हो तो मैं, कुछ कामकाज उन का कर दिया करूं। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया, मुज़ायका नहीं, लेकिन सोहबत न करें। उन्होंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह ! इस चीज़ की तरफ तो उनको, मैलान भी नहीं। जिस रोज़ से यह वाक़िआ पेश आया, आज तक उनका वक़्त रोते ही गुज़र रहा है।
काअब कहते हैं, कि मुझसे भी कहा गया कि, हिलाल की तरह तू भी अगर बीवी की, खिदमत की इजाज़त ले ले तो, शायद मिल जाए। मैंने कहा वह बूढ़े हैं, मैं जवान हूं, न मालूम मुझे क्या जवाब मिले, इस लिए मैं जुरअत नहीं करता। ग़रज़ इस हाल में दस रोज़ और गुज़रे, कि हमसे बात-चीत, मेलजोल छूटे हुए पूरे पचास दिन हो गए। पचासवें दिन की सुबह की नमाज़, अपने घर की छत पर पढ़कर मैं निहायत ग़मगीन बैठा हुआ था, ज़मीन मुझ पर बिल्कुल तंग थी, और ज़िन्दगी दूभर हो रही थी, कि सलअ पहाड़ की चोटी पर से, एक ज़ोर से चिल्लाने वाले ने आवाज़ दी, कि काअब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ! खुशख़बरी हो तुमको। मैं इतना ही सुनकर सज्दे में गिर गया, और खुशी के मारे रोने लगा, और समझा कि तंगी दूर हो गई।
हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने सुबह की नमाज़ के बाद, हमारी माफ़ी का ऐलान फ़रमाया, जिस पर एक शख़्स ने तो पहाड़ पर चढ़ कर, जोर से आवाज़ दी कि वह सबसे पहले पहुंच गई, इसके बाद एक साहब घोड़े पर सवार होकर, भागे हुए आए, मैं जो कपड़े पहन रहा था, वह निकाल कर बशारत देने वाले की नज़र कर दिए। ख़ुदा की क़सम ! इन दो कपड़ों के सिवा और कोई कपड़ा, उस वक़्त मेरी मिल्क में न था। इसके बाद मैंने दो कपड़े मांगे हुए पहने, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की खिदमत में हाज़िर हुआ। इसी तरह मेरे दोनों साथियों के पास भी खुशख़बरी लेकर लोग गए।
मैं जब मस्जिदे नबवी में हाज़िर हुआ तो, वह लोग जो खिदमते अक़दस में हाज़िर थे, मुझे मुबारकबाद देने के लिए, दौड़े और सबसे पहले अबूतलहा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने बढ़कर मुबारकबाद दी, और मुसाफ़ा किया जो हमेशा ही यादगार रहेगा, मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,की बारगाह में जा कर सलाम किया, तो चेहरा-ए-अन्वर खिल रहा था, और अन्वार खुशी के चेहरे से ज़ाहिर हो रहे थे।
हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का चेहरा-ए-मुबारक खुशी के वक़्त में, चांद की तरह से चमकने लगता था। मैंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! मेरी तौबा की तकमील यह है, कि मेरी जायदाद जो है, वह सब अल्लाह के रास्ते में सदक़ा है, (कि यह सरवत ही इस मुसीबत का सबब बनी थी।)। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, न फ़रमाया कि इसमें तंगी होगी, कुछ हिस्सा अपने पास भी रहने दो। मैंने अर्ज़ किया कि बेहतर है, ख़ैबर का हिस्सा रहने दिया जाए, मुझे सच ही ने निजात दी, इसलिए मैंने अहद कर लिया कि हमेशा ही सच बोलूंगा ।
फ़ाइदा— यह है सहाबा-ए-किराम की इताअत, और दीनदारी का और अल्लाह के ख़ौफ़ का नमूना, कि हमेशा जंग में यह हज़रात शरीक रहे। एक मर्तबा की ग़ैर हाज़िरी पर क्या-क्या इताब हुआ, और उसको किस फ़रमांबरदारी से बर्दाश्त किया, कि पचास दिन रो कर गुज़ार दिए, और माल जिसकी वजह से यह वाक़िआ पेश आया था, वह भी सदक़ा कर दिया, और काफ़िरों ने तमअ दिलाई तो, बजाए मुश्तजिल होने के और ज़्यादा पशेमान हुए, और उसको भी अल्लाह का इताब और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के एराज़ की वजह से समझा कि मेरे दीन का ज़ोअफ़ इस दर्जे तक पहुंच गया कि काफ़िरों को इसकी तमअ होने लगी कि वह मुझे बे-दीन बना दें।
हम लोग भी मुसलमान हैं। अल्लाह और उसके पाक रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,के इरशादात भी सामने हैं। बड़े से बड़ा हुक्म नमाज़ ही का ले लो, कि ईमान के बाद इसके बराबर कोई चीज़ भी नहीं। कितने हैं जो इस हुक्म की तामील करते हैं, और जो करते हैं वह भी कैसे करते हैं। इसके बाद ज़कात और हज का तो पूछना ही किया, कि इसमें तो माल भी ख़र्च होता है।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह,दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करे