दूसरा बाब कुल हदीस 3,हज़रत उमर की हालत, हज़रत इब्ने अब्बास की नसीहत, तबूक के सफ़र में क़ौमे समूद की बस्ती पर गुज़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,
हदीस नम्बर 6,हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बसा औक़ात कभी-कभी, एक तिनका हाथ में लेते और फ़र्माते, काश, मैं यह तिनका होता, कभी फ़र्माते, काश, मुझे मेरी माँ ने जना ही न होता। एक मर्तबा किसी काम में मश्ग़ूल थे, एक शख़्स आया और कहने लगा, कि फ़्लां शख़्स ने मुझ पर ज़ुल्म किया है। आप चलकर मुझे बदला दिलवा दीजिए। आपने उसके एक दुर्रा मार दिया, कि जब मैं इस काम के लिए बैठता हूं, उस वक़्त तो आते नहीं, जब मैं दूसरे कामों में मश्ग़ूल हो जाता हूं, तो आकर कहते हैं कि बदला दिलवा। वह शख़्स चला गया। आपने आदमी भेज कर उसको बुलवाया, और दुर्रा उसको देकर फ़र्माया कि बदला ले लो। उसने अर्ज़ किया कि मैंने, अल्लाह के वास्ते माफ़ किया।
घर तशरीफ़ लाये , दो रकअत नमाज़ पढ़ी, इसके बाद अपने आपको ख़िताब करके फ़र्माया, ए उमर ! तू कमीना था, अल्लाह ने मुझ को ऊंचा किया, तू गुमराह था, अल्लाह ने तुझको हिदायत की, तू ज़लील था, अल्लाह ने तुझे इज़्ज़त दी, फिर लोगों का बादशाह बनाया। अब एक शख़्स आकर कहता है, कि मुझे ज़ुल्म का बदला दिलवादे, तो तू उसको मारता है, कल को क़यामत के दिन अपने रब को क्या जवाब देगा। बड़ी देर तक इसी तरह अपने आपको, मलामत करते रहे,
आपके ग़ुलाम हज़रत असलम कहते हैं, कि मैं एक मर्तबा हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के साथ हुर्रा मदीना के क़रीब एक जगह का नाम ,की तरफ़ जा रहा था। एक जगह आग जलती हुई जंगल में नज़र आई, हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़र्माया कि शायद यह कोई क़ाफ़िला है, जो रात हो जाने की वजह से शहर में नहीं गया, बाहर ही ठहर गया। चलो उसकी ख़ैर-ख़बर लें। रात को हिफ़ाज़त का इन्तिज़ाम करें।
वहां पहुंचे तो देखा एक औरत है, जिसके साथ चंद बच्चे हैं, जो रो रहे हैं, और चिल्ला रहे हैं, और एक देगची चूल्हे पर रखी है, जिसमें पानी भरा हुआ है और उसके नीचे आग जल रही है। उन्होंने सलाम किया और क़रीब आने की इजाज़त लेकर उसके पास गए, और पूछा कि यह बच्चे क्यों रो रहे हैं? औरत ने कहा कि भूख से लाचार होकर रो रहे हैं। दर्याफ़्त फ़र्माया, इस देगची में क्या है ? औरत ने कहा कि पानी भर कर बहलाने के वास्ते आग पर रख दी है, ज़रा उनको तसल्ली हो जाये और सो जायें। अमीरुल मोमिनीन, उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का और मेरा, अल्लाह ही के यहां फ़ैसला होगा, कि मेरी इस तंगी की ख़बर नहीं लेते। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,रोने लगे, और फ़र्माया कि अल्लाह तुझ पर रहम करे। भला उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,को तेरे हाल की क्या ख़बर है?
कहने लगी कि वह हमारे अमीर बने हैं, और हमारे हाल की ख़बर भी नहीं रखते। असलम कहते हैं कि हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मुझे साथ लेकर वापस हुए, और एक बोरी में बैतुल माल में से कुछ आटा, और खजूरें, और चर्बी, और कुछ कपड़े, और कुछ दिरहम लिए, ग़रज़ उस बोरी को ख़ूब भर लिया, और फ़र्माया कि यह मेरी कमर पर रख दे, मैंने अर्ज़ किया कि मैं ले चलूं। आपने फ़र्माया कि नहीं, मेरी कमर पर रख दे। दो तीन मर्तबा जब मैंने इस्रार किया तो फ़र्माया, क्या क़यामत में भी मेरे बोझ को तू ही उठायेगा, उसको मैं ही उठाऊंगा, इसलिए कि क़यामत में मुझ ही से इसका सवाल होगा।
मैंने मजबूर होकर, बोरी को आपकी कमर पर रख दिया। आप निहायत तेज़ी के साथ, उसके पास तशरीफ़ ले गए, मैं भी साथ था, वहां पहुंचकर उस देगची में आटा, और कुछ चर्बी, और खजूरें डालीं और उसको चलाना शुरू किया। और चूल्हे में ख़ुद ही फूंक मारना शुरू किया। असलम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि आपकी गुंजान दाढ़ी से, धुआं निकलता हुआ मैं देखता रहा, हत्ताकि हरीरा सा तैयार हो गया। इसके बाद आपने अपने दस्ते मुबारक, से निकालकर उनको खिलाया। वह सेर होकर हंसी-खेल में मश्ग़ूल हो गए, और जो बचा था, वह दूसरे वक़्त के वास्ते, उनके हवाले कर दिया। वह औरत बहुत ख़ुश हुई और कहने लगी, अल्लाह तआला तुम्हें ज़ज़ा-ए-ख़ैर दे। तुम थे इसके मुस्तहिक़ कि बजाए हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,के तुम ही ख़लीफ़ा बनाये जाते। हज़रत उमर ने उसको तसल्ली दी, और फ़र्माया कि जब तुम ख़लीफ़ा के पास जाओगी, तो मुझको भी वहीं पाओगी।
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, उसके क़रीब ही ज़रा हट कर ज़मीन पर बैठ गये,और थोड़ी देर बैठने के बाद चले आये, और फ़र्माया कि मैं इसलिए बैठा था, कि मैंने उनको रोते हुए देखा था। मेरा दिल चाहा कि थोड़ी, देर मैं उनको हंसते हुए भी देखूं, सुबह की नमाज़ में अक्सर सूरः कहफ़ ताहा वग़ैरह बड़ी सूरतें पढ़ते, और रोते कि कई-कई सफ़ों तक आवाज़ जाती। एक मर्तबा सुबह की नमाज़ में सूरः यूसुफ़ पढ़ रहे थे-
अरबी आयत:, اِنَّمَا اَشْكُوْ بَثِّيْ وَحُزْنِيْ اِلَى اللّٰهِ ,(इन्नमा अश्कू बस्सी व हुज़्नी इलल्लाहि),पर पहुंचे तो रोते-रोते आवाज़ न निकली। तहज्जुद की नमाज़ में बाज़ मर्तबा रोते-रोते गिर जाते, और बीमार हो जाते।
फायदा – यह है अल्लाह का ख़ौफ़, उस शख़्स का जिसके नाम से बड़े-बड़े नामवर बादशाह, डरते थे, कांपते थे। आज भी चौदह सौ वर्ष के ज़माने तक, उसका दबदबा माना हुआ है। आज कोई बादशाह नहीं, हाकिम नहीं, कोई मामूली-सा अमीर भी अपनी रिआया के साथ ऐसा बर्ताव करता है?
हदीस नम्बर 7,वहब बिन मुनब्बः कहते हैं, कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,की ज़ाहिरी बीनाई जाने के बाद, मैं उनको लिए जा रहा था। वह मस्जिदे हराम में तशरीफ़ ले गए। वहां पहुंचकर एक मजमें से कुछ झगड़े की आवाज़ आ रही थी। फ़र्माया, मुझे, उस मजमें की तरफ़ ले चलो, मैं उस तरफ़ ले गया। वहाँ पहुंचकर आपने सलाम किया। उन लोगों ने बैठने की दर्ख़्वास्त की तो आपने इन्कार फ़र्मा दिया, और फ़र्माया कि तुम्हें मालूम नहीं, कि अल्लाह के ख़ास बन्दों की जमाअत में वह लोग हैं, जिनको उसके ख़ौफ़ ने चुप कर रखा है, हालांकि वह न अजिज़ हैं न गूंगे, बल्कि फ़सीह अच्छी ज़बान में बातें करने वाले लोग हैं, बोलने वाले हैं, समझदार हैं मगर अल्लाह तआला की बड़ाई के ज़िक्र ने उनकी अक़्लों को उड़ा रखा है,
उसके दिल इसकी वजह से टूटे रहते हैं, और ज़बानें चुप रहती हैं और जब इस हालत पर उनको, पुख़्तगी मयस्सर हो जाती है तो इसकी वजह से वह नेक कामों, में जल्दी करते हैं, तुम लोग उनसे कहाँ हट गए। वहब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि उसके बाद, मैंने दो आदमियों को भी, एक जगह जमा नहीं देखा।
फायदा – हज़रत इबने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, अल्लाह के ख़ौफ़ से इस क़दर रोते थे, कि चेहरे पर आंसुओं के हर वक़्त बहने से, दो नालियां सी बन गई थीं। ऊपर के क़िस्से में हज़रत इबने अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने नेक कामों पर एहतमाम का, यह एक सहल नुस्ख़ा बतलाया, कि अल्लाह की अज़मत, और उसकी बड़ाई का, सोच किया जाये, कि इसके बाद हर क़िस्म का नेक अमल सहल है, और फिर वह यक़ीनन इख़लास से भरा हुआ होगा। रात दिन के 24 घंटों में,अगर थोड़ा सा वक़्त भी, हम लोग इसके सोचने की ख़ातिर, निकाल लें तो क्या मुश्किल है?
हदीस नम्बर 8 ,तबूक के सफ़र में क़ौमे समूद की बस्ती पर गुज़र, ग़ज़वा-ए-तबूक, ग़ज़वा उस लड़ाई को कहते हैं, जिसमें हुज़ूरे अक़दम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, खुद शरीक हुए हों, मशहूर ग़ज़वा है, और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का आख़िरी ग़ज़वा है। हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,को इत्तिला मिली कि रूम का बादशाह, मदीना-मुनव्वरा पर हमला करने का इरादा कर रहा है, और बहुत बड़ा लश्कर लेकर, शाम के रास्ते से मदीना को आ रहा है। इस ख़बर पर, 5 रजब सन् 9 हिजरी, पंजशंबा, को नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, उसके मुक़ाबले के लिए मदीना तैयबा से रवाना हो गए।
चूंकि ज़माना सख़्त गर्मी का था, और मुक़ाबला भी सख़्त था, इसलिए हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने साफ़ ऐलान फरमा दिया था, कि रूम के बादशाह से, मुक़ाबले के लिए चलना है, तैयारी कर ली जाये, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने ख़ुद इसके लिए चंदा फरमाना, शुरू किया। ,यही लड़ाई है जिसमें हज़रत अबूबक्र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, घर का सारा सामान ले आये, और जब उनसे पूछा, कि घर वालों के लिए क्या छोड़ा, तो फ़र्माया कि उनके लिए अल्लाह और उसके रसूल, सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, को छोड़ आया,और हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, घर के पूरे सामान में से आधा ले आये, जिसका क़िस्सा नम्बर, 4 बाब 6 में आता है,
और हज़रत उस्मान ग़नी ने, एक तिहाई लश्कर का पूरा सामान मुहैया फ़र्माया, और इसी तरह हर शख़्स अपनी हैसियत से ज़्यादा ही लाया। इसके बावजूद चूंकि आम तौर से तंगी थी, इसलिए दस-दस आदमी, एक ऊंट पर थे, कि नौबत-ब-नौबत बारी-बारी उस पर सवार होते थे। इसी लिए इस लड़ाई का नाम, जैशुल उसरत (तंगी का लश्कर) भी था। यह लड़ाई निहायत ही सख़्त थी, कि सफ़र भी दूर का था, और मौसम भी इस क़दर सख़्त, कि गर्मी की इन्तहा नहीं थी, और इसके साथ ही मदीना तैयबा में, खजूर के पकने का ज़माना ज़ोर पर था, कि सारे बाग़ बिल्कुल पके हुए खड़े थे,और खजूर ही पर मदीना-तैयबा वालों की ज़िन्दगी, का ज़्यादा दारोमदार था, कि साल भर की रोज़ी के जमा, करने का गोया यही ज़माना था। इन हालात में यह वक़्त, मुसलमानों के लिए निहायत सख़्त इम्तिहान का था,
कि उधर अल्लाह का ख़ौफ़, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,का इर्शाद, जिसकी वजह से बग़ैर जाये न बनती थी और दूसरी जानिब यह सारी दिक़्क़तें कि हर वक़्त मुस्तक़िल रोक थीं, बिलख़ुसूस साल भर की, मेहनत और पके-पकाये दरख़्तों का, यूँ बे-यार व मददगार छोड़ जाना जितना मुश्किल था, वह ज़ाहिर है। मगर इस सब के बावजूद अल्लाह का ख़ौफ़, इन हज़रात पर ग़ालिब था, इस लिए बजुज़ मुनाफ़िक़ीन, और माज़ूरीन जिसमें औरतें और बच्चे भी दाख़िल थे, और वह लोग भी जो, बे-ज़रूरत मदीना तैयबा में छोड़े गए, या किसी क़िस्म की सवारी न मिल सकने के वजह से, रोते हुए रह गए थे, जिनके बारे में 'तवल्ल व अअयुनु हम तलाीज़ु मिनदमइ' नाज़िल हुई और सब ही हज़रात हमरिकाब साथ रवाना हुए थे,
अल-बत्ता तीन हज़रात बिला उज़्र के, शरीक नहीं थे, जिनका क़िस्सा आइंदा आ रहा है। रास्ते में क़ौम समूद की बस्ती पर, गुज़र हुआ जो हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने दामन से अपने चेहरा-ए-अन्वर को ढांक लिया, और ऊंटनी को तेज़ कर दिया, और सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को भी हुक्म फ़र्माया कि यहां से तेज़ चलो, और ज़ालिमों की बस्तियों में से रोते हुए गुज़रो, और उससे डरते हुए गुज़रो, कि तुम पर भी ख़ुदा न ख़्वास्ता वह अज़ाब कहीं नाज़िल न हो, जाये जो उन पर नाज़िल हुआ था।
फायदा – अल्लाह का प्यारा नबी और लाडला रसूल सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, अज़ाब वाली जगह से डरता हुआ, ख़ौफ़ करता हुआ गुज़रता है, और अपने जानिसार दोस्तों को, जो इस सख़्त मजबूरी के वक़्त में भी, जां-निसारी का सबूत देते हैं, रोते हुए जाने का हुक्म फ़र्माता है, कि ख़ुदा-न-ख़्वास्ता वह अज़ाब उन पर न नाज़िल हो जाये। हम लोग किसी बस्ती में ज़लज़ला आ जाये, तो उसको सैरगाह बनाते हैं, खंडहरों की तफ़रीह को जाते हैं, और रोना तो दर-किनार, रोने का ख़याल भी दिल में नहीं लाते।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह,दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे