दूसरा बाब, कुल हदीस 2 पेज नम्बर56 से 58तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी,हदीस नम्बर 10,सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हंसने पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,की तम्बीह,और क़ब्र की याद
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक मर्तबा नमाज़ के लिए तशरीफ़ लाये, तो एक जमाअत को देखा, कि वह खिलखिला कर हंस रही थी, और हंसी की वजह से दांत खुल रहे थे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम,ने इरशाद फ़रमाया, कि अगर मौत को कसरत से याद किया करो, तो जो हालत मैं देख रहा हूं, वह पैदा न हो, लिहाजा मौत को कसरत से याद किया करो।
[3D]क़ब्र पर कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता, जिसमें वह यह आवाज़ न देती हो, कि मैं बेगानी का घर हूं, तन्हाई का घर हूं, मिट्टी का घर हूं, कीड़ों का घर हूं। जब कोई मोमिन क़ब्र में रखा जाता है, तो वह कहती है कि तेरा आना मुबारक है। बहुत अच्छा किया, तू आ गया। जितने आदमी ज़मीन पर चलते थे, तू उन सब में मुझे ज़्यादा पसन्द था। आज जब तू मेरे पास आया है, तो मेरे बेहतरीन सुलूक को देखेगा। इसके बाद वह क़ब्र जहां तक मुर्दे की नज़र पहुंच सके, वहां तक वसीअ बड़ी हो जाती है, और एक दरवाजा उसमें जननत का खुल जाता है, जिससे वहां की हवा और खुशबुएं उसको आती रहती हैं।
[3D]और जब कोई बद्किरदार क़ब्र में रखा जाता है, तो वह कहती है, तेरा आना ना-मुबारक है, बुरा किया जो तू आया ! ज़मीन पर जितने आदमी चलते थे, उन सब में तुझ ही से मुझे, ज़्यादा नफ़रत थी। आज जब तू मेरे हवाले हुआ है, तो मेरे बर्ताव को भी देख लेगा। इसके बाद वह इस तरह से उसको दबाती है, कि पसलियां आपस में एक दूसरे में घुस जाती हैं, और सत्तर अजदहे उस पर ऐसे मुसल्लत हो जाते हैं, कि अगर एक भी ज़मीन पर फ़ुंकार मारे, तो उसके असर से ज़मीन पर घास तक बाक़ी न रहे, वह उसको क़यामत तक डसते रहते हैं। इसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया, कि क़ब्र या जननत का एक बाग़ है, या जहन्नम का एक गढ़ा।
फ़ाइदा— अल्लाह का ख़ौफ़ बड़ी ज़रूरी और अहम चीज़ है। यही वजह है कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, अक्सर किसी गहरी सोच में रहते थे, और मौत को याद करना उसके लिए मुफ़ीद है। इसीलिए हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने यह नुस्ख़ा इरशाद फ़रमाया, कभी-कभी मौत को याद करते रहना, बहुत ही ज़रूरी और मुफ़ीद है।
हदीस नम्बर 11 हज़रत हंज़ला, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को निफ़ाक़ का डर,हज़रत हंज़ला रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि एक मर्तबा हम, लोग हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मज्लिस में थे। हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने वाज़ फ़रमाया, जिससे क़ुलूब (दिल) नर्म हो गये, और आंखों से आंसू बहने लगे, और अपनी हक़ीक़त हमें ज़ाहिर हो गई। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मज्लिस से उठकर मैं घर आया, और बीवी-बच्चे पास आ गये, और कुछ दुनियां का ज़िक्र-तज़्किरा शुरू हो गया, और बच्चों के साथ हंसना-बोलना, बीवी के साथ मज़ाक़ शुरू हो गया, और वह हालत जाती रही, जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की मज्लिस में थी। दफ़अतन (यकायक) ख़याल आया कि, मैं पहले से किस हाल में था, अब क्या हो गया।
मैंने अपने दिल में कहा कि तू तो मुनाफ़िक़ हो गया, कि ज़ाहिर में हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के सामने तो वह हाल था, और अब घर में आकर यह हालत हो गई। मैं इस पर अफ़सोस और रंज करता हुआ, और यह कहता हुआ घर से निकला कि हंज़ला तो मुनाफ़िक़ हो गया। सामने से हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, तशरीफ़ ला रहे थे। मैंने उनसे अर्ज़ किया कि हंज़ला तो मुनाफ़िक़ हो गया। वह यह सुन कर फ़रमाने लगे कि सुब्हानल्लाह ! क्या कह रहे हो, हरगिज़ नहीं। मैंने सूरत बयान की कि हम लोग जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, कि खिदमत में होते हैं, और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, दोज़ख़ और जननत का ज़िक्र फ़रमाते हैं, तो हम लोग ऐसे हो जाते हैं गोया वह दोनों हमारे सामने हैं, और जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के पास से आ जाते हैं, तो बीवी-बच्चों, जायदाद वग़ैरह के धंधों में फंस कर, उसको भूल जाते हैं।
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने फ़रमाया कि यह बात तो हम को भी पेश आती है, इस लिए दोनों हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, की ख़िदमत में हाजिर हुए, और जा कर हंज़ला ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ! मैं तो मुनाफ़िक़ हो गया। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने फ़रमाया, क्या बात हुई ! हंज़ला रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अर्ज़ किया कि, जब हम लोग आपकी ख़िदमत में हाज़िर होते हैं, और आप जन्नत दोज़ख़ का ज़िक्र फ़रमाते हैं, तब तो हम ऐसे हो जाते हैं, कि गोया वह हमारे सामने हैं, लेकिन जब ख़िदमते अक़दस से चले जाते हैं, तो जाकर बीवी-बच्चों और, घर-बाहर के धंधों में लग कर भूल जाते हैं।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, ने इरशाद फ़रमाया कि उस ज़ात की क़सम ! जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, अगर तुम्हारा हर वक़्त वही हाल रहे जैसा मेरे सामने होता है, तो फ़रिश्ते तुम्हारे से बिस्तरों पर, और रास्तों में मुसाफ़ा करने लगें, लेकिन हंज़ला ! बात यह है कि गाहे-गाहे-गाहे।
फ़ाइदा— यानी आदमी के साथ इन्सानी ज़रूरतें भी लगी हुई हैं, जिन को पूरा करना भी ज़रूरी है। खाना-पीना, बीवी-बच्चे और उनकी ख़ैरख़बर लेना यह भी ज़रूरी हैं। इसलिए इस क़िस्म के हालात कभी-कभी हासिल होते हैं। न हर वक़्त यह हासिल होते हैं, न इसकी उम्मीद रखनी चाहिए। यह फ़रिश्तों की शान है, कि उनको कोई दूसरा धंधा ही नहीं। न बीवी-बच्चे, न फ़िक्र-ए-मआश, न दुन्यवी क़िस्से, और इन्सान के साथ चूंकि बशरी ज़रूरियत लगी हुई हैं, इसलिए वह हर वक़्त एक सी हालत पर, नहीं रह सकता लेकिन ग़ौर की बात यह है कि सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को अपने दीन की कितनी फ़िक्र थी
कि ज़रा सी बात से, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, के सामने हमारी जो हालत होती है, वह बाद में नहीं रहती, उससे अपने मुनाफ़िक़ होने का, उन को बहुत फ़िक्र हो गया। इश्क़ अस्त व हज़ार बदगुमानी। इश्क़ जिससे होता है, उसके मुताल्लिक़ हज़ार तरह की, बदगुमानी और फ़िक्र हो जाती हैं। बेटे से मुहब्बत हो, और वह कहीं सफ़र में चला जाए, फिर देखिए हर वक़्त ख़ैरियत की ख़बर का फ़िक्र रहता है, और जो यह भी मालूम हो जाए, कि वहां ताऊन है, या फ़साद हो गया, फिर ख़ुदा जाने कितने, ख़तूत और तार पहुंचेंगे।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह, दुआ का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास, मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करे