दूसरा बाब हदीस नम्बर4,हुज़ूर सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, का तमाम रात रोते रहना, पेज नम्बर 43से44,तक, फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलईही व सल्लम, एक मर्तबा तमाम रात रोते रहे, और सुबह तक नमाज़ में यह आयत तिलावत फरमाते रहे-अरबी आयत, اِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَاِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَاِنْ تَغْفِرْلَهُمْ فَاِنَّكَ اَنْتَ الْعَزِيْزُ الْحَكِيْمُ,इन तुअज्ज़िबहुम फ़इन्नहुम इबादु क व इन तग़फ़िर लहुम फ़इन्न क अन्तल अज़ीज़ुल हकीम)
'ऐ अल्लाह,अगर आप उनको सज़ा दें, जब भी आप मुख़्तार हैं, कि यह आपके बन्दे हैं, और आप इनके मालिक, और मालिक को हक़ है, कि बन्दों को जरायम पर सज़ा दे, और अगर आप उनको माफ़ फरमाते दें तो भी आप मुख़्तार हैं, कि आप ज़बरदस्त, क़ुदरत वाले हैं, तो माफ़ी पर भी क़ुदरत है, और हिकमत वाले हैं, तो माफ़ी भी हिकमत के मुवाफ़िक़ होगी। इमामे आज़म रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के मुताल्लिक़ भी नक़ल किया गया है कि वह एक शब तमाम रात-अरबी आयत, وَامْتَازُوا الْيَوْمَ أَيُّهَا الْمُجْرِمُونَ,वम्ताजुल यौ म अय्युहल मुज्रिमून, पढ़ते रहे और रोते रहे। मतलब आयते शरीफ़ा का यह है,
[3D]कि क़यामत के दिन मुजरिमो,को हुक्म होगा, कि दुनिया में तो सब मिले-जुले रहे, मगर आज मुजरिम लोग सब अलग हो जाएं, और ग़ैर मुजरिमो अलाहिदा। इस हुक्म को सुनकर, जितना भी रोया जाए थोड़ा है, कि न मालूम अपना शुमार मुजरिमो, में होगा या फरमा बरदारों में।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह,दुवा का तलब गार,आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करे