हिकायते सहाबा पहला बाब,हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का क़िस्सा,पेज 34से35,तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, जिनके पाक नाम पर आज मुसलमानों को फ़ख़्र है, और जिनके जोशे ईमानी से आज चौदह सौ वर्ष बाद तक, काफ़िरों के दिल में ख़ौफ़ है, इस्लाम लाने से क़ब्ल मुसलमानों के मुक़ाबले और तकलीफ़ पहुंचाने में भी मुमताज़ (मशहूर) थे, नबी अकरम सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के क़त्ल के दरपै (तैयार) रहते थे। एक रोज़ कुफ़्फ़ार ने मशवरा की कमेटी क़ायम की कि कोई है, जो मुहम्मद सल्लललाहु अलईही वसल्लम, को क़त्ल कर दे। उमर ने कहा कि मैं करूंगा। लोगों ने कहा कि बेशक तुम्हीं कर सकते हो। उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, तलवार लटकाये हुए उठे और चल दिए। इसी फ़िक्र में जा रहे थे कि एक साहब क़बीला ज़ोहरा के, जिनका नाम हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, है, और बाज़ों ने और साहब लिखे हैं, मिले।
उन्होंने पूछा उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,कहां जा रहे हो? कहने लगे कि मुहम्मद (सल्लललाहु अलईही वसल्लम,) के क़त्ल की फ़िक्र में हूं।' (नऊज़ुबिल्लाह), सअद ने कहा कि बनू हाशिम और बनू ज़ोहरा, और बनू अब्दे मनाफ़ से कैसे मुतमइन हो गये, वह तुमको बदले में क़त्ल कर देंगे। इस जवाब पर बिगड़ गए और कहने लगे, कि मालूम होता है तू भी बे-दीन (यानी मुसलमान) हो गया, ला पहले, तुझी को निमटा दूं। यह कह कर तलवार सूंत ली और हज़रत सअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने भी यह कह कर कि हां, मैं मुसलमान हो गया हूं, तलवार संभाल ली। दोनों तरफ़ से तलवार चलने को थी, कि हज़रत सअद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने कहा कि पहले अपने घर की तो ख़बर ले, तेरे बहन और बहनोई, दोनों मुसलमान हो चुके हैं। यह सुनना था कि ग़ुस्से से भर गए और सीधे बहन के घर गए।
वहाँ हज़रत खब्बाब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,जिन का ज़िक्र नं० 6 पर गुज़रा, किवाड़ बन्द किए हुए, दोनों मियां-बीवी को क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा रहे थे। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने किवाड़ खुलवाये। इनकी आवाज़ से हज़रत खब्बाब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,तो जल्दी से अन्दर छुप गए, और वह सहीफ़ा (किताब) भी जल्दी में बाहर ही रह गया, जिस पर आयते क़ुरआनी लिखी हुई थीं। हमशीरा ने किवाड़ खोले।
हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के हाथ में कोई चीज़ थी, जिसको बहन के सर पर मारा, जिससे सरसे ख़ून बहने लगा,और कहा कि अपनी जान की दुश्मन, तू भी बद-दीन हो गई। इसके बाद घर में आये और पूछा कि क्या कर रहे थे, और यह आवाज़ किस की थी। बहनोई ने कहा कि बात-चीत कर रहे थे, कहने लगे, 'क्या तुमने अपने दीन को छोड़ कर दूसरा दीन इख़्तियार कर लिया ? बहनोई ने कहा कि 'अगर दूसरा दीन हक़ हो तब !'
यह सुनना था कि उनकी दाढ़ी पकड़ कर खींची, और बे-तहाशा टूट पड़े, और ज़मीन पर गिरा कर ख़ूब मारा। बहन ने छुड़ाने की कोशिश की तो उनके मुंह पर इस ज़ोर से एक तमांचा मारा, कि ख़ून निकल आया। वह भी आख़िर उमर ही की बहन थीं, कहने लगीं, कि उमर ! हमको इस वजह से मारा जाता है कि हम मुसलमान हो गए। बेशक हम मुसलमान हो गए हैं, जो तुझसे हो सके तू कर ले।
इसके बाद हज़रत उमर की निगाह उस सहीफ़े पर पड़ी जो जल्दी में बाहर रह गया था, और ग़ुस्से का जोश भी इस मार-पीट से कम हो गया था, और बहन के इस तरह से ख़ून में भर जाने से,शर्म सी भी आ रही थी। कहने लगे कि अच्छा मुझे दिखलाओ, यह क्या है। बहन ने कहा कि तू नापाक है, और इसको नापाक हाथ नहीं लगा सकते। हरचन्द इस्रार किया (बहुत कहा) मगर वह बे-वुज़ू और ग़ुस्ल के देने को तैयार न हुईं। हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने ग़ुस्ल किया और उसको लेकर पढ़ा, उसमें सूरः ताहा लिखी हुई थी। उसको पढ़ना शुरू किया और-,इन्नी अनल्लाहुला इला ह इल्ला अना फ़अबुदनी व आक़िमिस्सला त लिजिक्री०। तक पढ़ा था
कि हालात ही बदल गई। कहने लगे कि अच्छा मुझे भी मुहम्मद सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की ख़िदमत में ले चलो। यह अल्फ़ाज़ सुनकर हज़रत खब्बाब अन्दर से निकले, और कहा कि ए उमर, ! तुम्हें खुशख़बरी देता हूं, कि कल शब पंच शंबा में हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, ने दुआ मांगी थी कि या अल्लाह, उमर और अबू जहल में जो तुझे ज़्यादा पसन्द हो, उससे इस्लाम को कुववत अता फ़रमा। (ये दोनों कुवत में मशहूर थे) मालूम होता है कि हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की दुआ तुम्हारे हक़ में क़ुबूल हो गई।
इसके बाद हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,) के क़त्ल की फ़िक्र में हूं।' (नऊज़ुबिल्लाह) सअद ने कहा की ख़िदमत में हाज़िर हुए, और जुमा की सुबह को मुसलमान हुए, उनका मुसलमान होना था कि, कुफ़्फ़ार के हौसले पस्त होना शुरू हो गए। मगर फिर भी यह निहायत मुख़्तसर जमाअत थी, और वह सारा मक्का, बल्कि सारा अरब इसलिए, और भी जोश पैदा हुआ और जलसे करके, मशवरे करके, इन हज़रात को नापैद (ख़त्म करना) करने की कोशिश होती थी
और तरह-तरह की तदबीरें की जाती थीं, ताहम (फिर भी) इतना ज़रूर हुआ कि मुसलमान मक्का की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने लगे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, फ़रमाते हैं कि उमर का इस्लाम लाना मुसलमानों की फ़तह थी, और उनकी हिजरत मुसलमानों की मदद थी और उनकी ख़िलाफ़त रहमत थी (असदुलग़ाबा)।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह,दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करे