Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B1/6/7/8

हिकायते सहाबा पहला बाब,हजरत खब्बाब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बिन अल-अरित की तकलीफें,हजरत अम्मार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,और उनके वालिदैन का जिक्र,हजरत सुहैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,का इस्लाम,पेज 30से33तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी

हजरत खब्बाब बिन अल-अरित, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी उन्हीं मुबारक हस्तियों में हैं, जिन्होंने इम्तिहान के लिए, अपने आप को पेश किया था, और अल्लाह के रास्ते में, सख्त से सख्त तकलीफे बर्दाश्त कीं। शुरू ही में पांच-छः आदमियों के बाद मुसलमान हो गये थे, इसलिए बहुत जमाने तक तकलीफें उठायीं। लोहे की जिरह (कवच) पहना कर इनको धूप में डाल दिया जाता, जिस से गर्मी और तपिश की वजह से पसीनों पर पसीने बहते रहते थे। अक्सर औकात बिल्कुल सीधा गर्म रेत पर लिटा दिया जाता, जिसकी वजह से कमर का गोश्त तक, गल कर गिर गया था। 

यह एक औरत के गुलाम थे। उसको खबर पहुंची कि यह हुजूर अक्दस सल्लललाहु अलईही वसल्लम,से मिलते हैं, तो उसकी सजा में लोहे को गर्म करके, उनके सर को उससे दाग देती थी। हजरत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने एक मर्तबा अर्से के बाद अपने जमाना-ए-खिलाफत में हजरत खब्बाब से, उनकी तकलीफों की तफ्सील पूछी, जो उनको पहुंचाई गई। उन्होंने अर्ज किया कि मेरी कमर देखें। हजरत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने कमर देख कर फर्माया कि, ऐसी कमर किसी की देखी ही नहीं। उन्होंने अर्ज किया मुझे आग के अंगारों पर डाल कर घसीटा गया।

मेरी कमर की चर्बी और, खून से वह आग बुझी। इन हालात के बावजूद जब इस्लाम को तरक्की हुई और, फुतूहात¹ का दरवाजा खुला तो उस पर रोया करते थे, कि खुदा-न-ख्वास्ता हमारी तकलीफ का बदला, कहीं दुनिया ही में तो नहीं मिल गया। हजरत खब्बाब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, कहते हैं कि एक मर्तबा हुजूर अक्दस सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने खिलाफ आदत बहुत ही लम्बी नमाज पढी। सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उसके मुतअल्लिक अर्ज किया, तो हुजूरे सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने इर्शाद फरमाया कि यह रगबत व, डर की नमाज थी। 

[3D]मैंने इस में अल्लाह तआला से तीन दुआयें की थीं।  दो उनमें से कुबूल हुईं और, एक को इन्कार फरमा दिया। मैंने यह दुआ की कि मेरी सारी उम्मत कह्त से हलाक न हो जाये, यह कुबूल हो गई। दूसरी यह कि उन पर कोई ऐसा दुश्मन मुसल्लत न हो, जो उनको बिल्कुल मिटा दे। यह भी कुबूल हो गई। तीसरी यह दुआ की कि, इनमें आपस में लडाई-झगडे न हों, यह बात मन्जूर न हुई। 

हजरत खब्बाब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का इन्तिकाल, 37 हिजरी में हुआ और कूफा में, सबसे पहले सहाबी यही दफन हुए। इनके इन्तिकाल के बाद हजरत अली कर्मल्लाहु वज्हहु का गुजर इनकी कब्र पर हुआ तो इर्शाद फरमाया,'अल्लाह खब्बाब पर रहम फर्मायें, अपनी रगबत से मुसलमान हुआ, और खुशी से हिजरत की और जिहाद में जिन्दगी गुजार दी, और मुसीबतें बर्दाश्त कीं। मुबारक है वह शख्स जो कियामत को याद रखे, और हिसाब किताब की तैयारी करे, और गुजारे के काबिल माल पर कनाअत² काफी समझना करे और अपने मौला को राजी कर लें।

फायदा - हकीकत में मौला को राजी कर लेना, उन्हीं लोगों का हिस्सा था कि, इनकी जिन्दगी का हर काम मौला ही की रजा के वास्ते था।

हदीस नम्बर 7

हजरत अम्मार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, और उनके मां-बाप को भी सख्त से सख्त तकलीफें पहुंचाई गयीं। मक्का की सख्त गर्म और रेतीली जमीन में उनको अजाब दिया जाता, और हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उस तरफ गुजर होता तो सब्र की तल्कीन¹ फर्माते और जन्नत की बशारत फर्माते। आखिर उनके वालिद हजरत यासिर, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, इसी हालते तकलीफ में वफात पा गए कि, जालिमों ने मरने तक चैन न लेने दिया, और उनकी वालिदा हजरत सुमैय्या रजि अल्लाहु ताआला अन्हा, की शर्मगाह में अबूजहल मलऊन ने एक बरछा मारा, जिससे वह शहीद हो गई, मगर इस्लाम से न हटीं, हालांकि बूढी थीं जईफ थीं मगर उस बद-नसीब ने किसी चीज का भी ख्याल नहीं किया। इस्लाम में सबसे पहली शाहदत इनकी है,

और इस्लाम में सब से पहली मस्जिद, हजरत अम्मार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की बनाई हुई। जब हुजूर अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हिजरत फर्मा कर मदीना तशरीफ ले गये तो, हजरत अम्मार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने कहा कि हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,के लिए एक मकान साये का बनाना चाहिए, जिसमें तशरीफ रखा करें, दोपहर को आराम फर्मा लिया करें और नमाज भी साये में पढ सकें। तो कुबा में हजरत अम्मार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अव्वल पत्थर जमा किए और फिर मस्जिद बनाई। 

लडाई में निहायत जोश से शरीक होते थे। एक मर्तबा मजे में आकर कहने लगे कि अब जाकर दोस्तों से मिलेंगे, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनकी जमाअत से मिलेंगे, इतने में प्यास लगी और पानी किसी से मांगा, उसने दूध सामने किया, उसको पिया और पीकर कहने लगे, मैंने हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, से सुना कि तू दुनिया में सबसे आखिरी चीज दूध पिएगा, इसके बाद शहीद हो गए। उस वक्त चौरान्वें वर्ष कि उम्र थी। बाज ने एक आध साल कम बतलाई है।²

हदीस नम्बर 8

हजरत सुहैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, भी हजरत अम्मार रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ही के साथ मुसलमान हुए। नबी-ए-अकरम सल्लललाहु अलईही वसल्लम, हजरत अरकम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, सहाबी के मकान पर तशरीफ फर्मा थे, कि यह दोनों हजरत अलाहिदा-अलाहिदा हाजिरे खिदमत हुए, और मकान के दरवाजे पर दोनों इत्तिफाकिया, इकट्ठा हो गए। हर एक ने दूसरे की गरज मालूम की तो, एक ही गरज यानी इस्लाम लाना, और हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,के फैज से मुस्तफीद होना दोनों का मक्सूद था। इस्लाम लाये और इस्लाम लाने के बाद जो उस जमाने में इस कलील और कमजोर जमाअत को पेश आना था, वह पेश आया

और हर तरह सताये गये, तकलीफे पहुंचाई गयीं, आखिर तंग आकर हिजरत का इरादा फर्माया तो काफिरों को यह चीज भी गवारा न थी, कि यह लोग किसी दूसरी ही जगह जाकर आराम से जिन्दगी बसर कर लें, इसलिए जिस किसी की हिजरत का हाल मालूम होता था, उसको पकडने की कोशिश करते थे, कि तकलीफ से निजात न पा सके। ,चुनांचे इनका भी पीछा किया गया, और एक जमाअत इनको पकडने के लिए गई। उन्होंने अपना तरकश¹ जिसमे तीर रखे जाते है संभाला जिसमें तीर थे, और उन लोगों से कहा कि देखो तुम्हें मालूम है, कि मैं तुम सब से ज्यादा तीर अन्दाज² हूं। जब तक एक तीर मेरे पास बाकी रहेगा, तुम लोग मुझ तक नहीं आ सकोगे, और जब एक भी तीर न रहेगा, तो मैं अपनी तलवार से मुकाबला करूंगा, यहां तक कि तलवार भी मेरे हाथ में न रहे। इसके बाद तुमसे जो हो सके करना। 

इस लिए अगर तुम चाहो तो अपनी जान के बदले में अपने माल का पता बतला सकता हूं, जो मक्का में है, और दो बांदियां भी हैं, वह सब तुम ले लो। इस पर वह लोग राजी हो गये, और अपना माल देकर जान छुडाई। इसी बारे में आयत पाक-,तर्जुमा- बाज लोग ऐसे हैं जो अल्लाह की रजा के वास्ते अपनी जान को खरीद लेते हैं, और अल्लाह तआला बन्दों पर मेहरबान हैं। हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, उस वक्त कुबा में तशरीफ फर्मा थे, सूरत देख कर इर्शाद फरमाया, कि नफा की  (तिजारत) की। 

[3D]सुहैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,कहते हैं कि हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, उस वक्त खजूर नोश फरमा रहे थे और मेरी आंख दुख रही थी, मैं भी साथ खाने लगा हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,ने फरमाया, कि आंख तो दुख रही है,और खजूरें खाते हो। मैंने अर्ज किया कि हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, उस आंख की तरफ से खाता हूं जो तन्दुरुस्त है। हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, यह जवाब सुनकर हंस पडे। 

हजरत सुहैब रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, बड़े ही खर्च करने वाले थे, हालांकि हजरत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने उनसे फरमाया, कि तुम फुजूल खर्ची करते हो। उन्होंने अर्ज किया कि ना-हक, कहीं खर्च नहीं करता। हजरत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का जब विसाल होने लगा तो उन्हीं को जनाजे की नमाज पढाने की वसीयत फरमाई थी।⁴

दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें



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और हराम कमाई इन्सान को खा जाती है

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