हिकायते सहाबा पहला बाब,मुसलमानों की हबशा की हिजरत, और शुअब बिन अबी तालिब में क़ैद होना,पेज 36से40,तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी
मुसलमानों को और उनके सरदार, फ़ख़्रे दो आलम सल्लललाहु अलईही वसल्लम, को जब कुफ़्फ़ार से तकलीफ़ पहुंचती ही रहीं, और आये दिन उनके बजाए कमी के इज़ाफ़ा ही होता रहा तो, हुज़ूरे अकरम सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को इसकी इजाज़त फ़रमा दी कि, वह यहां से किसी दूसरी जगह चले जाएं, तो बहुत से हज़रात ने हबशा की हिजरत, (ख़ुदा के लिए अपना वतन माल दौलत छोड़ कर किसी दूसरी जगह चले जाना) फ़रमाई। हबशा के बादशाह अगरचे नसरानी (ईसाई) थे और उस वक़्त तक मुसलमान न हुए थे, मगर उनके रहम दिल और मुंसिफ़ मिज़ाज (इंसाफ़ पसंद करने वाला) होने की शोहरत थी।
चुनांचे नुबूवत के पाँचवे वर्ष रजब के महीने में पहली जमाअत के ग्यारह या बारह मर्द, और चार या पांच औरतों ने, हबशा की तरफ़ हिजरत की। मक्का वालों ने उनका पीछा भी किया कि यह न जा सकें, मगर यह लोग हाथ न आये, वहां पहुंच कर उनको यह ख़बर मिली कि मक्का वाले सब मुसलमान हो गये, और इस्लाम का ग़ल्बा हो गया। इस ख़बर से यह हज़रात बहुत खुश हुए, और अपने वतन वापस आ गए ,लेकिन मक्का मुकर्रमा के क़रीब पहुंच कर मालूम हुआ, कि यह ख़बर ग़लत थी, और मक्का वाले उसी तरह, बल्कि उससे भी ज़्यादा दुश्मनी और तकलीफ़े पहुंचाने में मसरूफ़ हैं, तो बड़ी दिक़्क़त हुई। इनमें से बाज़ हज़रात वहीं से वापस हो गए, और बाज़ किसी की पनाह लेकर मक्का मुकर्रमा में दाख़िल हुए। यह हबशा की पहली हिजरत कहलाता है।
इसके बाद एक बड़ी जमाअत ने जो 83 मर्द, और 18 औरतें बतलाई जाती हैं, मुतफ़र्रिक़ (अलग-अलग होकर) तौर पर हिजरत की और यह हबशा की दूसरी हिजरत कहलाती है। बाज़ सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने दोनों हिजरतें की और बाज़ ने एक।,कुफ़्फ़ार ने जब यह देखा कि यह लोग हबशा में चैन की ज़िन्दगी बसर करने लगे, तो उनको और भी ग़ुस्सा आया, और बहुत से तोहफ़े-तहायफ़ ले कर नजाशी शाह हबशा के पास एक वफ़्द भेजा, जो बादशाह के लिये बहुत से तोहफ़े ले कर गया, और उसके ख़वास और पादरियों के लिए भी बहुत से हदिए लेकर गया, जाकर अव्वल पादरियों से और हुक्काम से मिला और हदिए देकर उनसे बादशाह के यहां अपनी सिफ़ारिश का वायदा लिया,
और फिर बादशाह की ख़िदमत में यह वफ़्द हाज़िर हुआ। अव्वल बादशाह को सजदा किया, फिर तोहफ़े पेश करके अपनी दर्खास्त पेश की,और रिश्वतख़ोर हुक्काम ने ताईद की। उन्होंने कहा कि ऐ बादशाह ! हमारी क़ौम के चंद बेवकूफ़ लड़के अपने क़दीमी दीन को छोड़कर, एक नये दीन में दाख़िल हो गए, जिसको न हम जानते हैं, न आप जानते हैं, और आपके मुल्क में आकर रहने लगे। हमको शुरफ़ा-ए-मक्का ने और उन लोगों के बाप-चाचा और रिश्तेदारों ने भेजा है, कि उनको वापस लाएं। आप उनको हमारे सुपुर्द कर दें।
बादशाह ने कहा कि जिन लोगों ने मेरी पनाह पकड़ी है, बग़ैर तहक़ीक़ उनको हवाले नहीं कर सकता। अव्वल उनसे बुलाकर तहक़ीक़ कर लूं, अगर यह सही हुआ तो हवाले कर दूंगा, चुनांचे मुसलमानों को बुलाया गया। मुसलमान अव्वल बहुत परेशान हुए क्या करें, मगर अल्लाह के फजल, ने मदद की, और हिम्मत से यह तय किया कि चलना चाहिए, और साफ़ बात कहना चाहिए।बादशाह के यहां पहुंच कर सलाम किया। किसी ने एतराज़ किया कि तुमने बादशाह को आदाबे शाही के मुवाफ़िक़ सजदा, नहीं किया। उन लोगों ने कहा कि हमको हमारे नबी ने अल्लाह के सिवा किसी को सजदा, करने की इजाज़त नहीं दी। इसके बाद बादशाह ने उनसे हालात दर्याफ़्त किए।
हज़रत जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, आगे बढ़े, और फ़रमाया कि हम लोग जहालत में पड़े हुए थे, न अल्लाह को जानते थे, न उसके रसूलों से वाक़िफ़ (जानकार) थे, पत्थरों को पूजते थे, मुर्दार खाते थे, बुरे काम करते थे, रिश्ते-नातों को तोड़ते थे, हम में का क़वी (मज़बूत) ज़ईफ़ (कमज़ोर) को हलाक कर देता था। हम इसी हाल में थे कि अल्लाह ने अपना एक रसूल भेजा,जिसके नसब को, उसकी सच्चाई को, उसकी अमानतदारी को, परहेज़गारी को हम ख़ूब जानते हैं। उसने हमको एक अल्लाह वहदहु ला शरी क लहू की इबादत की तरफ़ बुलाया, और पत्थरों और बुतों के पूजने से मना फ़रमाया,
उसने हमको अच्छे काम करने का हुक्म दिया, बुरे कामों से मना किया, उसने हमको सच बोलने का हुक्म दिया, अमानतदारी का हुक्म किया, सिला रहमी (रिश्ते जोड़ना) का हुक्म किया, पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म दिया, नमाज़, रोज़ा, सदक़ा-ख़ैरात का हुक्म दिया, और अच्छे अख़्लाक़ तालीम किये, ज़िना, बद-कारी, झूठ बोलना, यतीम का माल खाना, किसी पर तोहमत लगाना, और इस क़िस्म के बुरे आमाल करने से मना फ़रमाया। हमको क़ुरआने पाक की तालीम दी, हम उस पर ईमान लाये, और उसके फ़रमान की तामील की, जिस पर हमारी क़ौम हमारी दुश्मन हो गई और हमको हर तरह सताया। हम लोग मजबूर होकर तुम्हारी पनाह में अपने नबी के इर्शाद से आये हैं।
बादशाह ने कहा अच्छा जो क़ुरआम तुम्हारे नबी लेकर आये हैं, वह कुछ मुझे सुनाओ। हज़रत जाफ़र रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने सूरः मरयम की अव्वल की आयतें पढ़ीं, जिसको सुनकर बादशाह भी रो दिया और उसके पादरी भी, जो कसरत से मौजूद थे, सब के सब इस क़दर रोये कि दाढ़ियां तर हो गईं।,इसके बाद बादशाह ने कहा कि ख़ुदा की क़सम ! यह कलाम और जो कलाम हज़रत मूसा अलई हिस सलाम लेकर आये थे, एक ही नूर से निकले हैं और उन लोगों से साफ़ इन्कार कर दिया कि मैं इनको तुम्हारे हवाले नहीं कर सकता। वह लोग बड़े परेशान हुए कि बड़ी ज़िल्लत उठानी पड़ी। आपस में सलाह करके एक शख़्स ने कहा कि कल मैं ऐसी तदबीर करूंगा कि बादशाह उनकी जड़ ही काट दे। साथियों ने कहा भी कि ऐसा नहीं चाहिए। यह लोग अगरचे मुसलमान हो गये, मगर फिर भी रिश्तेदार हैं,
मगर उसने न माना। दूसरे दिन फिर बादशाह के पास गए और जाकर कहा, कि यह लोग हज़रत ईसा अलई हिस सलाम की शान में गुस्ताख़ी करते हैं, उनको अल्लाह का बेटा नहीं मानते। बादशाह ने फिर मुसलमानों को बुलाया। सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,फ़रमाते हैं कि दूसरे दिन के बुलाने से हमें और भी ज़्यादा परेशानी हुई। बहरहाल गए, बादशाह ने पूछा कि 'तुम हज़रत ईसा के बारे में क्या कहते हो, उन्होंने कहा, 'वही कहते हैं जो हमारे नबी पर उनकी शान में नाज़िल हुआ, कि वह अल्लाह के बन्दे हैं, उसके रसूल हैं, उसकी रूह हैं और उसके कलमा हैं, जिसको ख़ुदा ने कुंवारी और पाक मरयम की तरफ़ डाला।' नजाशी ने कहा कि हज़रत ईसा भी इसके सिवा कुछ नहीं फ़रमाते। पादरी लोग आपस में कुछ चूं-चूं करने लगे। नजाशी ने कहा तुम जो चाहो कहो। इसके बाद नजाशी ने उनके तोहफ़े वापस कर दिए और मुसलमानों से कहा, तुम अमन से रहो, जो शख़्स इनको सतायेगा, उस को तावान (जुर्माना) देना पड़ेगा, और इसका एलान भी कर दिया कि जो शख़्स इनको सतायेगा, उनको तावान देना होगा ।
इसकी वजह से वहां के मुसलमानों का इक़राम और भी ज़्यादा होने लगा, और इस वफ़्द, को ज़िल्लत से वापस आना पड़ा। तो फिर कुफ़्फ़ारे मक्का का जितना भी ग़ुस्सा जोश करता, ज़ाहिर है। इसके साथ ही हज़रत उमर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,के इस्लाम लाने ने उनको और भी जला रखा था, और हर वक़्त इस फ़िक्र में रहते थे कि इन लोगों का उनसे मिलना जुलना बन्द हो जाये, और इस्लाम का चिराग़ किसी तरह बुझे। इसलिए सरदाराने मक्का की एक बड़ी जमाअत ने, आपस में मशवरा किया, कि अब खुल्लम खुल्ला मुहम्मद सल्लललाहु अलईही वसल्लम, को क़त्ल कर दिया जाये, लेकिन क़त्ल कर देना भी आसान काम न था, इसलिए कि बनूहाशिम भी बड़े जत्थे, और ऊंचे तबक़े के लोग शुमार होते थे। वह अगरचे अक्सर मुसलमान नहीं हुए थे, लेकिन जो मुसलमान नहीं थे, वह भी हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के क़त्ल हो जाने पर आमादा नहीं थे,
इसलिए इन सब कुफ़्फ़ार ने मिलकर एक मुआहदा (समझौता) किया, कि सारे बनू हाशिम और बनू अल-मुत्तलिब, का बाईकाट किया जाये, न उनको कोई शख़्स अपने पास बैठने दे, न उनसे कोई ख़रीद व फ़रोख़्त करे, न बात-चीत करे, न उनके घर जाये, न उनको अपने घर में आने दे, और उस वक़्त तक सुलह न की जाये, जब तक कि वह हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, को क़त्ल के लिये हवाले न कर दें।
यह मुआहदा ज़बानी ही गुफ़्तगू पर ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि यकुम मुहर्रम सन् 07 को एक मुआहदा तहरीरी लिखकर, बैतुल्लाह में लटकाया गया, ताकि हर शख़्स उसका एहतराम करे, और उसको पूरा करने की कोशिश करे, और इस मुआहदा की वजह से तीन वर्ष तक यह सब हज़रात दो पहाड़ों के दरम्यान, एक घाटी में नज़रबन्द रहे, कि न कोई उनसे मिल सकता था, न यह किसी से मिल सकते थे, न मक्का के किसी आदमी से कोई चीज़ ख़रीद सकते थे, न बाहर के आने वाले किसी ताजिर से मिल सकते थे।
अगर कोई शख़्स बाहर निकलता तो पीटा जाता, और किसी से ज़रूरत का इज़हार करता तो साफ़ जवाब पाता। मामूली सा सामान, ग़ल्ला वग़ैरह जो उन लोगों के पास था, वह कहां तक काम देता। आख़िर फ़ाक़ों पर फ़ाक़े (उपवास) गुज़रने लगे और औरतें और बच्चे भूख से बेताब होकर रोते, और चिल्लाते और उनके अइज़्ज़ा (रिश्तेदार) को अपनी भूख और तकलीफ़ से ज़्यादा, इन बच्चों की तकलीफ़ सतातीं।
आख़िर तीन वर्ष के बाद अल्लाह के फ़ज़ल, से, वह सहीफ़ा (किताब, लिखा हुआ समझौता) दीमक की नज़र हुआ, और इन हज़रात की यह मुसीबत दूर हुई। तीन वर्ष का ज़माना ऐसे सख़्त बाईकाट और नज़रबन्दी में गुज़रा, और ऐसी हालत में इन हज़रात पर क्या-क्या मशक़्क़तें गुज़री होंगी, वह ज़ाहिर हैं, लेकिन इसके बावजूद सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अलईहिम अज़्मईन, निहायत ही साबित क़दमी (पैरों के जमाव) के साथ अपने दीन पर जमे रहे, बल्कि उसकी इशाअत (फैलाना) फ़रमाते रहे।
फायदा- यह तकलीफ़ और मशक़्क़तें उन लोगों ने उठाई हैं, जिनके आज हम नाम लेवा कहलाते हैं, और अपने को उनका मत्तबअ (पैरवी करने वाले) बतलाते और समझते हैं, हम लोग तरक़्क़ी के बाब में, सहाबा किराम जैसी तरक़्क़ियों के ख़्वाब देखते हैं, लेकिन किसी वक़्त ज़रा ग़ौर कर के यह भी सोचना चाहिए, कि इन हज़रात ने क़ुर्बानियाँ कितनी फ़रमायीं, और हमने दीन की ख़ातिर, इस्लाम की ख़ातिर, मज़हब की ख़ातिर क्या किया। कामयाबी हमेशा कोशिश, और सई के मुनासिब होती है। हम लोग चाहते हैं कि ऐश व आराम, बद-दीनी और दुनियां-तलबी में कफ़िरों के दोश बदोश (कंधे से कंधा मिलाकर) चलें, और इस्लामी तरक़्क़ी हमारे साथ हो यह कैसे हो सकता है-,तरसम न रसी बकअबा ऐ आराबी कीं रह कि तू मीरवी ब तुर्किस्तानस्त
तर्जुमा- मुझे ख़ौफ़ है ओ बदवी ! कि तू काबा को नहीं पहुंच सकता, इसलिए कि यह रास्ता काबा की दूसरी जानिब तुर्किस्तान की तरफ़ जाता है।
इस हदीस के साथ, हिकायते सहाबा का, पहला बाब मुकम्मल हुआ, अल्लाह कुबुल फरमाये आमीन,दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और,मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें