Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B1/5

हिकायते सहाबा पहला बाब,हजरत अबूजर गिफारी रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, का इस्लाम,पेज 28से30,तक फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी

हजरत अबूजर गिफारी, रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, मशहूर सहाबी हैं, जो बाद में बडे जाहिदों,और बड़े उलमा में से हुए। हजरत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू, का इर्शाद है कि अबूजर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ऐसे इल्म को हासिल किए हुए हैं, जिससे लोग आजिज हैं, मगर उन्होंने इसको महफूज कर रखा है। 

जब उनको हुजूरे अक्दस सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की नुबूवत की पहली खबर पहुंची, तो उन्होंने अपने भाई को हालात की तहकीक के वास्ते मक्का भेजा, कि जो शख्स यह दावा करता है कि, मेरे पास वही आती है और, आसमान की खबरें आती हैं, उनके हालात मालूम करें और उसके कलाम को गौर से सुनें। वह मक्का मुकर्रमा आये, और हालात मालूम करने के बाद अपने भाई से जाकर कहा कि, मैंने उनको अच्छी आदतों और उम्दा अखलाक का हुक्म करते देखा, और एक ऐसा कलाम सुना, जो न शेर है, न काहिनों का कलाम है। 

अबूजर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,  की इस मुजमल बात से तशफ्फी न हुई तो खुद सामाने सफर किया, और मक्का पहुंचे और सीधे मस्जिदे हराम में गये। हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, को पहचानते नहीं थे और किसी से पूछना मसलेहत के खिलाफ समझा। शाम तक इसी हाल में रहे। शाम को हजरत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू ने देखा कि एक परदेसी मुसाफिर है, मुसाफिरों की, गरीबों की, परदेसियों की खबरगीरी, उनकी जरूरतों का पूरा करना, इन हजरात की घुट्टी में पडा हुआ था, 

इसलिए उनको अपने घर ले आये मेजबानी फर्मायी, लेकिन इसके पूछने की जरूरत न समझी, कि कौन हो, क्यों आये हो, मुसाफिर ने भी कुछ जाहिर न किया, सुबह को फिर, मस्जिद में आ गये, और दिन भर इसी हाल में गुजरा, कि खुद पता न चला और दर्याफ्त किसी से किया नहीं, गालिबन इसकी वजह यह होगी कि हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के साथ दुश्मनी के किस्से बहुत मशहूर थे। आपको और आपके मिलने वालों को हर तरह की तकलीफें दी जाती थीं। उनको ख्याल हुआ हो कि सही हाल मालूम नहीं होगा। और बद-गुमानी की वजह से मुफ्त की तकलीफ अलाहिदा रही। 

दूसरे दिन शाम को भी हजरत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, को ख्याल हुआ कि परदेसी मुसाफिर है। ब-जाहिर जिस गरज के लिए आया है, वह पूरी नहीं हुई, इसलिए फिर अपने घर ले गये और रात को खिलाया सुलाया, मगर पूछने की उस रात को भी नौबत न आयी। तीसरी रात को फिर यही सूरत हुई तो हजरत अली रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने दर्याफ्त किया कि तुम किस काम से आये हो ? क्या गरज है? तो हजरत अबूजर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु,ने अव्वल उनको कसम और अहद व पैमां दिए इस बात के कि वह सही बतायें। इसके बाद अपनी गरज बतायी। हजरत अली कर्रमल्लाहु वज्हहु ने फर्माया कि वह बेशक अल्लाह के रसूल हैं, 

और सुबह को जब मैं जाऊं तो तुम मेरे साथ चलना, मैं वहाँ तक पहुँचा दूंगा, लेकिन मुखालफत का जोर है, इसलिए अगर रास्ते में मुझे कोई ऐसा शख्स मिला जिससे मेरे साथ चलने की वजह से तुम पर कोई अंदेशा हो तो मैं पेशाब करने लगूंगा, या अपना जूता दुरुस्त करने लगूंगा, तुम सीधे चले चलना, मेरे साथ ठहरना नहीं, जिसकी वजह से तुम्हारा-मेरा साथ होना मालूम न हो। चुनांचे सुबह को हजरत अली कर्रमल्लाहु वज्हहु के पीछे-पीछे हुजूर सल्ल० की खिदमत में पहुंचे, 

वहां जाकर बात-चीत हुई। उसी वक्त मुसलमान हो गये। हुजूरे अक्दस सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने उनकी तकलीफ के ख्याल से फर्माया, अपने इस्लाम को अभी जाहिर न करना। चुपके से अपनी कौम में चले जाओ, जब हमारा गलबा हो जाए, उस वक्त चले आना। उन्होंने अर्ज किया या रसूलल्लाह ! उस जात की कसम, जिसके कब्जे में मेरी जान है कि इस कलाम-ए तौहीद को उन बे-ईमानों के बीच चिल्ला चिल्ला के पढूंगा, चुनांचे उसी वक्त मस्जिदे हराम में तशरीफ ले गए और बुलंद आवाज से मैं गवाही देता हूं, कि एक अल्लाह के अलावा कोई माबूद नहीं और मैं गवाही देता हूं, कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, पढा,

फिर क्या था, चारों तरफ से लोग उठे और इस कदर मारा कि जख्मी कर दिया, मरने के करीब हो गये। हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,  के चचा हजरत अब्बास जो उस वक्त तक मुसलमान भी नहीं हुए थे, उनके ऊपर बचाने के लिए लेट गये और लोगों से कहा, क्या जुल्म करते हो, यह शख्स कबीला गिफार का है, और यह कबीला मुल्क शाम के रास्ते में पडता है, तुम्हारी तिजारत वगैरह सब मुल्क शाम के साथ है। अगर यह मर गया तो शाम का आना जाना बन्द हो जायेगा, इस पर उन सब लोगों को भी ख्याल हुआ कि, मुल्क शाम से सारी जरूरतें पूरी होती हैं, वहां का रास्ता बन्द हो जाना मुसीबत है, इसलिए उनको छोड दिया। दूसरे दिन फिर इसी तरह उन्होंने जाकर ब-आवाजे बुलंद कलमा पढा और लोग इस कलमे के सुनने को ताब न ला सकते थे, इसलिए उन पर टूट पडे। दूसरे दिन भी हजरत अब्बास रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इसी तरह उनको समझा कर हटाया कि, तुम्हारी तिजारत का रास्ता बन्द हो जायेगा।

फायदा - हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,  के इस इर्शाद के बावजूद कि अपने इस्लाम को छुपाओ, उनका यह फेल हक के इजहार का वलवला, और गल्बा था कि जब यह दीन हक है तो, किसी के बाप का क्या जाता है, जिससे डर कर छुपाया जाये और,  हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,  का मना फर्माना, शफकत की वजह से था कि मुम्किन है, तकलीफ का तहम्मुल न हो, वरना हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम,  के हुक्म के खिलाफ सहाबा रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, की यह मजाल ही न थी। चुनांचे इसका कुछ नमूना मुस्तकिल बाब में आ रहा है। चूंकि हुजूरे सल्लललाहु अलईही वसल्लम, खुद ही दीन के फैलाने में, हर किस्म की तकलीफें बर्दाश्त फर्मा रहे थे। इसलिए हजरत अबूजर रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने सहूलत पर अमल के बजाय, हुजूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के इत्तिबाअ को तर्जीह दी। यही एक चीज थी कि जिसकी, वजह से हर किस्म की तरक्की दीनी और दुनियावी सहाबा किराम रजि अल्लाहु ताआला अन्हु, के कदम चूम रही थी, और हर मैदान उनके कब्जे में था कि, जो भी शख्स एक मर्तबा कलमा-ए-शहादत पढ कर, इस्लाम के झंडे के नीचे आ जाता था, बडी से बडी कुव्वत भी उसको रोक न सकती थी, और न बड़े से बड़ा  जुल्म उसको दीन की इशाअत से हटा सकता था।

दुवा का तलब गार,आपका खादिम,मुहम्मद इलयास,मेरे और,मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें


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