Fazail e Amaal (Hikayate Sahaba) B1/4

हिकायते सहाबा पहला बाब,हज़रत बिलाल हबशी रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, का इस्लाम और मसाइब,पेज 26से27 तक,फ़ज़ाइले आमाल हिन्दी

हज़रत बिलाल हबशी, रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, एक मशहूर सहाबी है,  जो मस्जिदे नबवी के हमेशा मुअज़्ज़िन अज़ान देने वाले रहे शुरू में एक काफिर के गुलाम थे, इस्लाम ले आये जिसकी वजह से तरह तरह की तकलीफे दी जाती थी, उमय्या बिन खल्फ जो मुसलमानो का सख्त दुश्मन था, उनको सख्त गर्मी में दोपहर के वक़्त, तपती हुई रेत पर सीधा लिटा कर। उनके सीने पर पतथर की बड़ी चट्टान रख देता था, ताकि वह हिल भी न सकें, और कहता था कि, या तो इसी तरह तड़प कर मर जाओ, या इस्लाम से फिर जाओ (हट जाओ)।

मगर उस सख़्त तक़लीफ़, और आज़माइश (परीक्षा / संकट) की हालत में भी, हज़रत बिलाल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ज़बान से सिर्फ़, "अहद, अहद" (एक, एक, यानी अल्लाह एक है) का कलिमा (शब्द) निकलता था।रात को ज़ंजीरों में बांध कर कोड़े लगाये जाते, और अगले दिन उन ज़ख़्मों को गर्म ज़मीन पर डाल कर, और ज़्यादा ज़ख़्मी किया जाता, ताकि बेक़रार होकर इस्लाम से फिर जायें, या तड़प-तड़प कर मर जाएं। अज़ाब देने वाले उक्ता जाते, कभी अबू जेहल, का नम्बर आता कभी, उमैया बिन ख़ल्फ़ का, कभी औरों का, और हर शख़्स इसकी कोशिश करता कि, तकलीफ़ देने में ज़ोर ख़त्म कर दे। हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने इस हालत में देखा तो, उनको ख़रीद कर आज़ाद फ़र्माया।

फायदा – चूंकि अरब के बुतपरस्त, अपने बुतों को भी माबूद कहते थे। इसलिए उनके मुक़ाबले में इस्लाम की तालीम तौहीद की थी, जिसकी वजह से हज़रत बिलाल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, की ज़बान पर 'एक ही एक' का विर्द था। यह ताल्लुक़ और इश्क़ की बात है। हम झूठी मुहब्बतों में देखते हैं,  कि जिससे मुहब्बत हो जाती है, उसका नाम लेने में लुत्फ़ आता है, बे-फ़ायदा उसको रटा जाता है, तो अल्लाह की मुहब्बत का क्या कहना, जो दीन और दुनिया में दोनों जगह काम आने वाली है।

यही वजह है कि हज़रत बिलाल रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, को हर तरह से सताया जाता था, सख़्त से सख़्त तकलीफ़ें पहुंचाई जाती थीं, मक्का के लड़कों के हवाले कर दिया जाता कि, वह उनको गली-कूचों में चक्कर देते फिरें, और यह ये कि, 'एक ही एक है' की रट लगाते थे। इसी का यह सिला (बदला) मिला कि फिर हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के दरबार में मुअज़्ज़िन बने और स़फ़रे-हज़र में हमेशा अज़ान की ख़िदमत इनके सुपुर्द हुई। 

हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के विसाल के बाद मदीना-तय्यिबा में रहना, और हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की खाली जगह देखना मुश्किल हो गया, इसलिए इरादा किया कि अपनी ज़िंदगी के जितने दिन हैं, जिहाद में गुज़ार दूं, इसलिए जिहाद में शिरकत की नीयत से चल दिए। एक अर्से तक मदीना मुनव्वरा लौट कर नहीं आये। 

एक मर्तबा हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, की ख़्वाब में ज़ियारत की। हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, ने फ़र्माया, बिलाल! यह क्या ज़ुल्म है, हमारे पास कभी नहीं आते, तो आंख खुलने पर मदीना तय्यबा हाज़िर हुए। हज़रत हसन, व हुसैन रज़ि अल्लाहु ताआला अन्हु, ने अज़ान की फ़र्माइश की, लाडलों की दरख़्वास्त ऐसी नहीं थी, कि इन्कार की गुंजाइश होती। अज़ान कहना शुरू की और मदीना में हुज़ूर सल्लललाहु अलईही वसल्लम, के ज़माने की अज़ान, कानों में पड़ कर कोहराम मच गया। औरतें तक रोती हुई घर से निकल पड़ीं। चंद रोज़ क़याम के बाद वापस हुए, और सन् 20 हिजरी के क़रीब दमिश्क़ में विसाल हुआ,

दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,मेरे और, मेरे परिवार,के हक़ में दुआ करें


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