पहली फ़स्ल। आयाते क़ुरआनी। दर ताकीद, अम्र बिल मअरूफ़, व नही अनिल मुन्कर,
फ़ज़ाइले आमाल ज़िल्द फ़ज़ाइले तबलीग पेज 5 से 11 तक हदीस 1/7
अल्लाह पाक के बा-बरकत कलाम में से, चंद आयात का तर्जुमा, जिनमें तब्लीग़। व अम्र बिल मअरूफ़ की ताकीद, व तर्गीब फ़र्मायी है, पेश करता हूं,
जिससे इसका अंदाज़ा हो सकता है, कि ख़ुद हक़ सुब्हानहू व तक़द्दुस को इसका कितना एहतिमाम है। कि जिसके लिए बार-बार मुख़्तलिफ़ उनवानो । से अपने पाक कलाम में इसका अआदा किया है।²
तक़रीबन साठ आयात तो मेरी कोताही, नज़र से इसकी तर्गीब और तौसीफ़ में गुज़र चुकी है।
अगर कोई बारीकी से देखने वाला। ग़ौर से देखे तो न मालूम किस क़दर आयात मालूम हों।
चूंकि इन सब आयात का इस जगह जमा करना तूल का सबब होगा। इसलिए चंद आयात ही पर इक्तिफ़ा करता हूं।
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और इससे बेहतर किसकी बात हो सकती है। जो ख़ुदा की तरफ़ बुलाये, और नेक अमल करे, और कहे कि मैं फ़र्मां बरदारों में से हूं।
मुफ़स्सिरीन ने लिखा है, कि जो शख़्स भी अल्लाह तआला, की तरफ़ किसी को बुलाये, वह इस बशारत और तारीफ़ का मुस्तहिक़ है।
ख़्वाह किसी तरीके से बुलाये, मसलन अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम मोअज जजे। वग़ैरह से बुलाते हैं
और उलमा दलाइल से। मुजाहिदीन तलवार से, और मुअज़्ज़िनीन अज़ान से।
ग़रज़ जो भी किसी शख़्स को दावत इलल ख़ैर¹ करे,। भलाई की तरफ बुलाये । वह इसमें दाख़िल है, ख़्वाह आमाले ज़ाहिरा, की तरफ़ बुलाये या आमाले बातिना की तरफ़।
जैसा कि मशाइख़े सूफ़िया-ए-मारफ़त अल्लाह की तरफ़ बुलाते हैं।
मुफ़स्सिरीन ने यह भी लिखा है कि । क़ा ल इन्नी मिनल मुस्लिमीन। में इस तरफ़ इशारा है कि मुसलमान होने के साथ 'तफ़ाख़ुर'² भी हो।
उसको अपने लिए बाइसे इज़्ज़त भी समझता हो। इस इस्लामी इम्तियाज़ को तफ़ाख़ुर के साथ ज़िक्र भी करे।
बाज़ मुफ़स्सिरीन ने यह भी इर्शाद फ़र्माया है कि। मक़सद यह है कि इस वाज़, नसीहत, तब्लीग़ से, अपने को बहुत बड़ी हस्ती न कहने लगे।
बल्कि यह कहे कि आम मुस्लिमीन में से, एक मुसलमान मैं भी हूं।
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ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम। लोगों को समझाते रहिए, क्योंकि समझाना ईमान वालों को नफ़ा देगा।
मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि इससे क़ुरआन पाक की आयात सुना कर नसीहत फ़र्माना मक़सूद है।
कि वह नफ़ारसां³ है । नफा पहुचाने वाला । मोमिनीन के लिए, तो ज़ाहिर है कुफ़्फ़ार के लिए भी।
इस लिहाज़ से कि वह इन्शा अल्लाह, उसके ज़रिऐ से मोमिनीन में दाख़िल हो जाएंगे।
और आयत के मिस्दाक़ में शामिल होंगे। हमारे इस ज़माने में वाज़ व नसीहत का रास्ता तक़रीबन बन्द हो गया है। वाज़ का मक़सद बिल उमूम चुस्तगी-ए-तक़रीर⁴ बन गया है,
ताकि सुनने वाले तारीफ़ कर दें। हालांकि नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, का इर्शाद है जो शख़्स तक़रीर व बलाग़त, इसलिए सीखे ताकि लोगों को अपनी तरफ़ मायल करे। तो क़यामत के दिन उसकी कोई इबादत मक़बूल नहीं, न फ़र्ज़, न नफ़्ल।
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ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अपने मुताल्लिक़ीन को भी नमाज़ का हुक्म करते रहिए और ख़ुद भी उसके पाबंद रहिए। हम आपसे मआश नहीं चाहते।¹ मआश तो आपको हम देंगे और बेहतर अंजाम तो परहेज़गारी ही का है।
मुतअद्दद रिवायातों में यह मज़मून वारिद हुआ है कि जब नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, को किसी की तंगी-ए-मआश के रफ़ा² फ़रमाने का फ़िक्र होता तो उसको नमाज़ की ताकीद फ़र्माते और आयाते बाला को तिलावत फ़र्मा कर गोया इस तरफ़ इशारा फ़र्माते, कि वुसअते रिज़्क़ का वायदा, एहतिमाम - ए - नमाज़, पर मौक़ूफ़ है।³
उलमा ने लिखा है कि इस आयते शरीफ़ा में नमाज़ के हुक्म करने के साथ ख़ुद इस पर एहतिमाम करने का हुक्म इसलिए इर्शाद हुआ है कि यह अन्फ़अ⁴ है
कि तब्लीग़ के साथ-साथ जिस चीज़ का दूसरों को हुक्म किया जावे, ख़ुद भी उस पर एहतिमाम किया जावे, कि इससे दूसरों पर असर भी ज़्यादा होता है और दूसरों के एहतिमाम का सबब बनता है।
इसीलिए हिदायत के वास्ते अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम को मब्ऊस, फ़र्माया है कि वह नमूना बनकर सामने हों तो अमल करने वालों को अमल करना सहल हो,
और यह ख़दशा⁵ न गुज़रे कि फ़लां हुक्म मुश्किल है, उस पर अमल कैसे हो सकता है,
इसके बाद रिज़्क़ के वायदे की मस्लहत यह है कि नमाज़ का अपने औक़ात के साथ, एहतिमाम बसा औक़ात, अस्बाबे मईशत⁶ में ज़ाहिरन नुक़्सान का सबब मालूम होता है,
बिलख़ुसूस तिजारत, मुलाज़मत वग़ैरह में, इसलिए इसको साथ के साथ दफ़ा फ़र्मा दिया कि यह हमारे ज़िम्मे है।
यह सब दुनियावी उमूर के एतबार से है। इसके बाद बतौर क़ायदा-ए-कुल्लिया और अम्र बदीही⁷ के फ़र्माया कि आक़िबत तो है ही, मुत्तक़ियों के लिए, इसमें किसी दूसरे की शिर्कत ही नहीं।
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बेटा नमाज़ पढ़कर और अच्छे कामों की नसीहत किया कर और बुरे कामों से मना किया कर, और तुझ पर जो मुसीबत वाक़ेअ हो, उस पर सब्र किया कर, यह हिम्मत के कामों में से है।¹
इस आयते शरीफ़ा में मुहसम्म बिश्शान उमूर को ज़िक्र फ़र्माया है और हक़ीक़तन यह उमूर अहम हैं, तमाम कामयाबियों का ज़रिया हैं, मगर हम लोगों ने इन्हीं चीज़ों को ख़ास तौर से पसे पुश्त² डाल रखा है।
अम्र बिल मअरूफ़ का तो ज़िक्र ही क्या कि वह तक़रीबन सब ही के नज़दीक मतरूक है। नमाज़ जो तमाम इबादात में सबसे ज़्यादा अहम चीज़ है
और ईमान के बाद सबसे मुक़द्दम उसी का दर्जा है, उसकी तरफ़ से भी किस क़दर ग़फ़लत बरती जाती है। उन लोगों को छोड़ कर जो बेनमाज़ी कहलाते हैं,
ख़ुद नमाज़ी लोग भी उसका कामिल एहतिमाम नहीं फ़र्माते, बिल-ख़ुसूस जमाअत, जिसकी तरफ़ 'इक़ामते नमाज़' , से इशारा है,
सिर्फ़ ग़ुरबा के लिए रह गयी, उमरा और बा-इज़्ज़त लोगों के लिए मस्जिद में जाना गोया आर³ बन गया है। फ़ इलल्लाहिल मुश्तका। आंचे आरे तस्त ओ फ़ख़्रेमनस्त
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और तुम में से एक जमाअत ऐसी होना ज़रूरी है कि ख़ैर की तरफ़ बुलाये, और नेक कामों के करने को कहा करे, और बुरे कामों से रोका करे, और ऐसे लोग पूरे कामयाब होंगे।
हक़ सुब्हानहू व तक़द्दुस ने, इस आयते शरीफ़ा में एक अहम मज़मून का हुक्म फ़र्माया है, वह यह कि उम्मत में से एक जमाअत, इस काम के लिए मख़्सूस हो,
कि वह इस्लाम की तरफ़, लोगों को तब्लीग़ किया करे। यह हुक्म मुसलमानों के लिए था, मगर अफ़सोस कि इस अस्ल को हम लोगों ने बिल्कुलिया तर्क कर दिया है
और दूसरी क़ौमों ने निहायत एहतिमाम से पकड़ लिया है। नसारा की मुस्तक़िल जमाअतें दुनिया में तब्लीग़ के लिए मख़्सूस हैं और इसी तरह दूसरी अक़वाम में इसके लिए मख़्सूस कारकुन मौजूद हैं,
लेकिन क्या मुसलमानों में भी कोई जमाअत ऐसी है ? इसका जवाब नफ़ी⁴ में नहीं तो इस्बात⁵ में भी मुश्किल है।
अगर कोई जमाअत या कोई फ़र्द इसके लिए उठता भी है, तो इस वजह से कि बजाये इआनत के, उस पर एहतराज़ात की, इस क़दर भरमार होती है, कि वह आज नहीं तो कल थक कर बैठ जाता है,
हालांकि ख़ैरख़्वाही का मुक़्तज़ा यह था कि उसकी मदद की जाती, और कोताहियों की इस्लाह की जाती, न यह कि ख़ुद कोई काम किया जावे, और काम करने वालों को एहतराज़ात, का निशाना बना कर, उनको काम करने से गोया रोक दिया जाये।
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तुम बेहतरीन उम्मत हो कि लोगों के (नफ़ा रसानी)¹ के लिए निकाले गये हो। तुम लोग नेक काम का हुक्म करते हो, और बुरे काम से मना करते हो, और अल्लाह तआला पर ईमान रखते हो।
मुसलमानों का अशरफ़ुन्नास, और उम्मते मुहम्मदिया का, अशरफुल उमम² होना, मुतअद्दद अहादीस में तसरीह से, वारिद हुआ है।
क़ुरआन पाक की आयात में भी, कई जगह इस मज़मून को, सराहतन व इशारतन³, बयान फ़र्माया गया है। इस आयते शरीफ़ा में भी ख़ैरे उम्मत⁴ , का इत्लाक़ फ़र्माया गया है
और इसके साथ ही इसकी, इल्लत⁵ की तरफ़ भी इशारा फ़र्माया है, कि तुम बेहतरीन उम्मत हो, इसलिए कि अम्र, बिल मअरूफ़, और नही अनिल, मुन्कर करते हो।
मुफ़स्सिरीन ने लिखा है, कि आयते शरीफ़ा में अम्र बिल, मअरूफ़, और नही अनिल, मुन्कर को ईमान से भी, पहले ज़िक्र फ़र्माया,
हालांकि ईमान सब चीज़ों की अस्ल है, बग़ैर ईमान के कोई ख़ैर भी मोतबर नहीं। इसकी वजह यह है, कि ईमान में तो, और उमम साबिक़ा⁶ भी शरीक थीं,
यह ख़ास ख़ुसूसियत, जिसकी वजह से तमाम अंबिया, अलैहि स्सलातु वस्सलाम, के मुत्तबईं⁷, से उम्मते मुहम्मदिया को, तफ़व्वुक़⁸ है,
वह यही अम्र बिल, मअरूफ़ और, नही अनिल मुन्कर है, जो इस उम्मत का तमग़ा-ए-इम्तियाज़⁹ है, और चूंकि बग़ैर ईमान के, कोई अमले ख़ैर, मोतबर नहीं,
इसलिए साथ ही बतौर क़ैद के, इसको भी ज़िक्र फ़र्मा दिया, वरना असल मक़सूद, इस आयते शरीफ़ा में इसी का ज़िक्र फ़र्माना है, और चूंकि वही इस जगह मक़सूद बिज़्ज़िक्र है, इसलिए इसको मुक़द्दम फ़र्माया।
इस उम्मत के लिए, तमग़ा-ए-इम्तियाज़ होने का मतलब यह है कि इसका मख़्सूस एहतिमाम किया जाये, वरना कहीं चलते-फिरते, तब्लीग़ कर देना इसमें काफ़ी नहीं इसलिए कि यह अम्र पहली उम्मतों में भी पाया जाता था,
जिसको 'फ़लम्मा नसूमा ज़ुक्किरू बिही' वग़ैरह आयात में ज़िक्र फ़र्माया है। इम्तियाज़ मख़्सूस एहतिमाम का है, कि उसको मुस्तक़िल काम समझ कर, दीन के और कामों की तरह से इसमें, मश्ग़ूल हों।
आम लोगों की अक्सर सरगोशियों¹ में, ख़ैर ब बरकत नहीं होती, मगर जो लोग ऐसे हैं, कि सद्क़ा-ख़ैरात की या और, किसी नेक काम की, या लोगों में बाहम² इस्लाह कर देने की तर्गीब देते हैं ,
और इस तालीम व तर्गीब के लिए ख़ुफ़िया तद्बीरें और मशवरे करते हैं, उनके मशवरों में अलबत्ता ख़ैर व बरकत है और जो शख़्स यह काम ,यानी नेक आमाल की तर्गीब महज़, अल्लाह की रज़ा के वास्ते करेगा (न कि लालच या शोहरत की ग़रज़ से) उसको हम अंकरिब अज्रे अज़ीम अता फ़र्माएंगे।
इस आयत में हक़ तआला शानुहू ने, अम्र बिल मारूफ़ करने वालों के लिए बड़े अज्र का वायदा फ़र्माया है,
और जिस अज्र को, हक़ जल्ले जलालुहू बड़ा फ़र्मा दें, उसकी क्या इंतिहा हो सकती है। इस आयते शरीफ़ा की तफ़्सीर में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, का इर्शाद मुबारक नक़्ल किया गया है,
कि आदमी का हर कलाम उस पर बार है, मगर यह कि उम्र बिल मारूफ़, और नही अनिल मुन्कर हो, या अल्लाह का ज़िक्र हो।
दूसरी अहादीस में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, का इर्शाद है, क्या मैं तुमको ऐसी चीज़ न बताऊं, जो नफ़्ल नमाज़-रोज़ा-सद्क़ा सबसे अफ़ज़ल हो?
सहाबा ने अर्ज़ किया, ज़रूर इर्शाद फ़र्माइए। हुज़ूर सल्ल० ने इर्शाद फ़र्माया कि, लोगों में मसालहत³ , कराना क्योंकि आपस का बिगाड़, नेकियों को इस तरह साफ़ कर देता है,
जैसे कि उस्तरा, बालों को उड़ा देता है⁴ ,और भी बहुत सी नुसूस⁵ में लोगों के दर्मियान मसालहत कराने की ताकीद फ़र्मायी गयी है। इस जगह इसका ज़िक्र मक़सूद नहीं।
इस जगह इस बात का बयान करना मक़सूद है, कि अम्र बिल मअरूफ़, में यह भी दाख़िल है, कि लोगों में मसालहत की, सूरत जिस तरीक़े से पैदा हो सके, उसका भी ज़रूर एहतिमाम किया जाए।
इस जिल्द की, बाकी हदीसे जल्द ही, वेबसाइट पर अपलोड, कर दी जायेंगी, इन्शा अल्लाह
दुवा का तलब गार, आपका खादिम, मुहम्मद इलयास,
मेरे और, मेरे परिवार, के हक़ में दुआ करें